पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२५६

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२५० बस्तार-पस्ती राज्य है। इस सामन्त राज्य के प्रधान नगर जगदलपुरमें आवश्यकीय द्रव्य नागपुर, सयपुर, निजामराज्य और राजप्रासाद अवस्थित है। छत्तीसगढ़से लाये जाते हैं। इसके उत्तर, पश्चिम, मध्य और दक्षिण विभाग यहांके राजा अपनेको राजपूत बतलाते हैं । मरहठाके पर्वतमालासे समाच्छादित है। पूवभागकी अधित्यका अभ्युदय तक यह राज्य बिलकुल स्वतन्त्र था। १८वीं भूमि समुद्रपृष्ठसे २ हजार फुट ऊँची है। यहां सब | शताब्दीमें नागपुर गवर्मेण्टने इस पर कर निर्धारित कर तरहका अनाज उपजता है। बेलादीला नामक पर्वत- दिया। इसी समय जयपुर राज्यके साथ मन्द्राज में लड़ाई मालाके दो सर्वोच्च शिखरके नाम नन्दिराज और पितुर छिड़ गई। कई वर्षों तक यहां अराजकता फैली रही। राणी हैं। उक्त पर्वतमालासे असंख्य नदियां निकली | भूतपूर्व राजा भैरवरावका ६२ वर्षकी उमरमें १८६१ ई०- हैं। उनमेंसे शवारी, इन्द्रवती और ताल नामक प्रधान | को देहान्त हुआ। पीछे उनके लड़के रुद्र प्रताप देव नदियां गोदावरी नदीमें मिली हैं। जमीनमें पंक पड़ सिंहासन पर बैठे। उनकी नाबालिगी तक राज्य गवर्मेण्ट- जानेसे धानकी फसल अच्छी लगती है। यहां लोहेकी | की देखरेखमें रहा। ये ही वर्तमान राजा हैं। राजाको एक खान है, पर स्थानवासी उसे काममें नहीं लाते। दत्तक लेनेका अधिकार नहीं है, एकमात्र ज्येष्ठपुल ही सिंहा सनके अधिकारी हैं। इस राज्यमें २५२५ ग्राम लगते हैं। जनसंख्या तीन | बस्तार ( फा० पु० ) एक बंधी हुई वहुत-सी वस्तुओंका लाखसे ऊपर है जिनमेंसे गोंड जातिको संख्या हो । | समूह, मुट्ठा, पुलिंदा। अधिक है। जगदलपुरमें कुछ ब्राह्मणोंक भी घर है। बस्ति (सं० पु० ) वस्ति देखा। धे लोग मांस और मछली खाते तथा गाहिरा नामक बस्तिशेख-पञ्जाबप्रदेशके जलन्धर नगरके उपकण्ठवत्ती ग्वालाजातिके हाथका पानी पीते हैं। यहां धाकर नामक | एक स्थान । १६२७ ई० में शेख दरवेश नामक किसी ब्राह्मणज एक निकृष्ट जाति है। इस जातिके लोग भी मसलमानने इस छोटे नगरको बसाया। यज्ञोपवीत पहनते हैं। बस्ती युक्तप्रदेशके गोरखपुर विभागका जिला। यह ___ दन्तेश्वरी वा मौली ( भवानी और काली ) तथा अक्षा० २६ २५ से २७३० उ० तथा देशा० ८ १३ मातादेवी यहांके अधिवासियोंके उपास्य देवता हैं। उच्च- १४ के मध्य अवस्थित है। भूपरिमाण २७९२ वंशके हिन्दु अपरापर देवदेवियोंकी भी पूजा करते हैं। वर्गमोल है। इसके उत्तरमें नेपाल राज्य, पूर्वमें गोरखपुर दन्तेश्वरी यहांके राजवशकी कुलदेवी हैं। देवीके अनुप्रहसे जिला, दक्षिणमें गोगरा और पश्चिममें गोण्डा है। इस राजवंशने हिन्दुस्तानसे बरंगुल जा कर राज्य जिलेका समग्र स्थान पर्वतमय है । तराई प्रदेशकी तरह बसाया। पीछे जब वे मुसलमानों द्वारा वहांसे भगा दिये| कहीं उच्च और कहीं निम्न जलाभूमिमें परिणत है। मध्य गये, तब देवोके साथ दन्तिवाड़में आ कर बस गये। भागमें राप्ती और कुयाना नदी बहती है जिससे जिला यहां देवीके रहने के लिये मन्दिर बनवाया गया। पहले तीन स्वतन्त्र भागों में विभक्त हो गया है। इनमेंसे उत्तर देवोकी लोलरसनाकी तृप्तिके लिये यहां नरबलि दी जाती विग पर्वतसमाकीर्ण तराई भूमि, मध्य भाग उर्वरा थो। पीछे उसे रोकनेके लिये १८४२ ई में उस मन्दिरमें और शस्यशालिनी तथा घर्घरा और कुयानाका मध्यवत्ती एक स्वतन्त्ररक्षक नियुक्त हुआ तथा इसकी जवाबदेही निम्नभाग जलशन्य है। यहां कृत्रिम उपायसे जलसिञ्चन राजाके सिर रही। वह देवीमूर्ति काले पत्थरको बनी हुई ! करके शस्यरक्षा की जाती है। राप्ती, बूड़ी राप्तो, आरा, है और उन्हें सर्वदा श्वेतवस्त्र पहनाया जाता है । जब किसी- वाणगंज, मसदो, अमो, कुयाना, कुडा, कोटनाइया और को अपना अभीष्ट जानना होता है, तब वे देवाके मस्तक घघरा ही यहांकी प्रधान नदियां हैं। एकमात्र राप्ती और पर एक फूल चढ़ाते हैं। उस फल के बायें या दाहिने गिरनेसे घर्घरामें ही वाणिज्यपोत पा जा सकते हैं । बखिरा बाव. कायका इष्टानिष्ट समझा जाता है। यहां किसी प्रकारका दमा, पाथरा चाउर और चण्डताल नामक कई एक हद पाणिज्यद्रष्य प्रस्तुत नहीं होता, सिवाय मोटे कपड़े के। हैं। उक्त जलाशयों में नाना प्रकारके पक्षी रहते हैं।