पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२९२

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सद बाइसवा पाउस पाईसा (हिं० वि० ) जो क्रममें बाईसके स्थान पर हो,। प्रणाली किसीके भी सामने प्रकट नहीं करते। इनका गिनने में बाईसके स्थान पर पडनेवाला। विश्वास है, कि किसीके सामने अपना साम्प्रदायिक मत बाईसी (हिं० स्त्री०) १ वाईस बस्तुओंका समूह । २ बाईस या भजन प्रणाली प्रकट करनेसे पाप लगता है। ये लोग पद्योंका समूह। कहते हैं, कि परमदेवता श्री राधाकृष्ण युगल रूपमे मानव पाउ (हिं० पु० ) पवन, हवा । दृदयमें विराजित हैं। सुतरां नरदेह त्याग करके उनकी बाउर ( हिं० वि० ) १ बावला, पागल । २ भोला भाला, तलाशमें दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं। सोधा सादा। ३ मूर्ख, अज्ञान । २ मूक, गूंगा। ____ अलिख ब्रह्माण्डके निखिल पदार्थमान ही मनुष्य शरीर बाउरी ( हि० स्त्री० ) १ एक प्रकारको घास । २ वावली में विद्यमान हैं। इस कारण उनका मत देहतत्त्व नामसे देखो। भी प्रसिद्ध है। जो भाण्डमें है, वह ब्रह्माण्ड में है।' बाउरी - पश्चिम वङ्गवासी निकृष्ट जाति । कृषिकाय, मृत् इस वातकी सार्थकता-सम्पादन करनेके लिये वे व्याख्या पावनिर्माण और पालकी वहन इनका प्रधान व्यवसाय देते हैं, कि चन्द्र, सूर्य, अग्नि, ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर है । आकृतिगत सद्शता देख कर मानवतत्त्वविद्ने तथा गोलोक, वैकुण्ठ और वृन्दावन, ये सभी देहके मध्य इन्हें पार्वतीय जातिमें शामिल किया है। पर्समान हैं। . इनके मध्य नौ विभिन्न थाक हैं। यथा-१ मल्ल- मानव देहमें विराजमान परमदेषताके प्रति प्रेमा भूमिया, २ शिकारिया और गोवरिया, ३ पञ्चकोटी, ४ नुष्ठान इस सम्प्रदायका मुख्य साधन है। प्रकृति पुरुषके माला वा मूलो, ५धूलिया वा धूलो, ६ मालुआ या मलुआ, परस्पर प्रेमसे ही वह प्रेम पर्याप्त होता है। अतएव ७ झाटिया वा झेटिया, ८ कारियो, पाथुरिया। भिन्न प्रकृति-साधन ही इन लोगोंकी साधनाका प्रधान अङ्ग है। स्थानोंमें बास वा जातोय व्यवसायके कारण इन लोगों- ये लोग एक एक प्रकृति ले कर बास करते हैं और उसी के मध्य वर्तमानकालमें बहुत कुछ स्वतन्त्रता आ गई प्रकृतिकी साधनामें आजीवन प्रवृत्त रहते हैं । वह साधन- है। किन्तु विवाहके सम्बन्धमें कोई गोलमाल नहीं है। पद्धति अति गुह्य व्यवहार है। दूसरेके जाननेका उपाय ममेरा और चचेरा सम्बन्ध बाद दे कर ये सगोलमें भी नहीं है, जाननेसे भी वह लेखनीय नहीं है। कामरिषु विवाह करते हैं। अलावा इसके एक वशके मध्य घरकी उपभोगके प्रकरण-विशेष द्वारा कालका शान्ति-साधन सात पीढ़ी और कन्याकी तीन पीढ़ी छोड़ कर भी पूर्णक चरममें परम पवित्र प्रेममात्र अवलम्बन करना विवाह चलता है। बहुविवाह उसी हालतमें होता है। इस साधनका उद्देश्य है। इनका मत है, कि जब वह जब वह अपनेको उनके भरणपोषणमें समर्थ देखता है। प्रेम परिपक्व हो जाता है, तब स्त्री पुरुष दोनों ही नितान्त विवाहके कोई मन्ख तन्त्र नहीं है। वरकर्ता कन्याकर्ता- आत्म-विस्मृत और वाह्यहान शून्य हो कर अपनी लीला को सवा रुपये और उपस्थित व्यक्तियोंको एक भोज में से केवल राधाकृष्ण-लीलाका अनुभव कर सकते हैं। सकनेसे ही विवाह कार्य सिद्ध होता है। विधवाविवाह ___ उस प्रकृति साधनके अन्तर्गत 'चारिचन्द्रभेद' नामक भी प्रचलित है। किन्तु अधिकांश जगह विधवा अपने एक क्रिया है। मनुष्य उस क्रियाको अतिमात वीमत्स देवरसे ही कर लेती है। काली, विश्वकर्मा इनके उपास्य व्यापार समझ सकते हैं पर बाउल-सम्प्रदायी उस परम देवता हैं। मरने पर शवदेह जलाई जाती है। किन्तु | पवित पुरुषार्थको साधन मानती हैं। उनका कहना है, बांकुड़ा जिले में मृतको औंधे मुंह करके गाड़ देते है। कि मनुष्य उक्त चार चन्द्र (अर्थात देहसे निर्गत शोणित, बाउल--वैष्णव सम्प्रदायविशेष। श्री चैतन्य महाप्रभुको शुक्र, मल और मूत्र ये चार पदार्थ )को पिताके औरस हो ये लोग अपने सम्प्रदायके प्रवर्तक बतलाते हैं। किन्तु और माताके गर्भसे प्राप्त करते हैं। अतएव उन चारों यथार्थमे कौन व्यक्ति इस साम्प्रदायिक मतकी सृष्टि कर पदार्थका परित्याग न करके पुनः शरीरके मध्य ग्रहण गये हैं, ठीक ठोक मालूम नहीं। ये लोग अपनी साधन करना कर्त्तव्य है। घृणाप्रवृत्ति पराभवके लिये इनके