पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३२९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३२३ वारादरी-चारारी कारादरी (हि.स्त्री०) बाहदरी देखा। | पड़ते हैं। जिनसे प्राचीन कालके ऋषि-आश्रमोंका बारानी (फा० वि० ) १ बरसाती। (स्त्री०) २ यह स्मरण हो आता है, लेकिन अधिकतर यह मनोहर छषि भूमि जिसमें केवल बरसातके पानीसे फसल उत्पन्न | थोड़े ही दिन तक रहती है। वर्षाऋतुके बाद दृश्य बिल. होती है और सी चनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती है।३ कुल बदल जाता है, सारी भूमि नग्न, भूरे रंगकी और यह कपड़ा जो पानीसे बचनेके लिये बरसातमें पहना सूखी बनी रहती है। यहां पर गङ्गाके अतिरिक्त सदैव वा बोढ़ा जाता है । यह ऊनको जमा कर या सूती बहनेवाली नदियोंका अभाव है और न एक तालाब कपड़े पर मोम आदि लपेट कर बनाया जाता है। ४ वह ही है। अधिवासी कलके पानोसे ही अपना कुल काम फसल जो बरसातके पानीसे बिना सिंचाई किये उत्पन्न चलाते हैं। मकई, मूग, उड़द, सरसों, गेहूं, चना, जौ होती हो। आदि फसल प्रायः उसी जमीन पर लगती है जो पुण्य बारापोल-दाक्षिणात्यमें प्रवाहित एक नदी। यह मन्द्राज सलिला भागीरथीके अपनी पूर्व गतिका परित्याग करने प्रदेशके कुगराज्य और मलवार जिलेमें प्रवाहित हो कर से निकल आई है। अधिवासियों से बहुत थोड़े कृषि भरवसागरमें गिरी है । कुर्ग राज्यके ब्रह्मगिरि नामक द्वारा जाविका चलाते हैं, अधिकांशका गुजारा नौकरी पर्वतके जिस स्थानसे यह नदी निकली है यह लक्ष्मण-पर ही निर्भर करता है। तीर्थ और पापनाशी नामसे प्रसिद्ध है। कुर्ग सीमान्त- यहांके जमींदार कुलीन वंशोद्भव मैथिल ब्राह्मण हैं। में इस नदीके २ सौ फुट ऊंचा एक प्रपात है। वनभाग बास-भवन भी इसी कसमें हैं। 'ठाकुर' इनकी उपाधि और पर्वतकन्दरादिके मध्य हो कर बहने के कारण तीर है। टेटका प्राचीन इतिहास हमें विस्तृन भावमें भूमिका दृश्य अतीव मनोहर है। कोन्ननूर जानेके रास्ते मालूम नहीं, जहां तक विश्वस्त सूत्रसे पता लगा है, वह पर इस नदीके ऊपर एक सुन्दर पुल है। यों हैं,-स्वगीय बाबू मदनमोहन ठाकुर इसके स्थाप- बारामती-बम्बई प्रदेशके पूना जिलेके भीमथड़ी तालुक- यिता थे। कहते हैं, कि पहले इनकी अवस्था उतनी अच्छी का एक शहर। यह अक्षा. १८६ उ० तथा देशा ७४ - न थी। १९वीं शताब्दीके मध्य वे बनेली राज स्वर्गीय बेदा- ३४ पू० पूना शहरसे ५० मील पूर्वमें अवस्थित है । जन- नन्दसिंह बहादुरके यहां नौकरी करते थे। उक्त महाशय संख्या ६ हजारसे ऊपर है। म्युनिस्पलिटी १८६५ ई०में की इन पर बड़ी कृपा रहती थी। अवस्था किसीकी सदा स्थापित हुई है। शहरमें सब-जजकी अदालत और दो एक-सी नहीं रहती । जो आज राजतख्त पर हैं, उन्हें कल भरेजी स्कूल हैं। राहके भिखारी और राहके भिखारीको विपुल सम्पत्ति बारामीटर ( अं० पु० ) बैरोमीटर रेखो। के अधिकारी देखते हैं। घेदानन्द बहादुरके यहां रह कर बारारी-भागलपुर शहरसे ४ मील उत्तर-पूर्व में अवस्थित बाबू मदन ठाकुरका अदृष्टाकाश परिष्कृत हो गया, भाग्य- एक कसवा। यह अक्षा० २५.१६ उ० तथा देशा० लक्ष्मो सानुकूल हुई। धीरे धीरे वे अतुल वैभवके अधि- ८७२ पू०के मध्य गङ्गाके दाहिने किनारे अवस्थित है। कारी हो गये जिसका उपभोग आज भी उनके वंशधर- जनसंख्या ५ हजारके करीब है जिनमेंसे हिन्दूको संख्या गण करते आ रहे हैं। आप साठे मिजाजके थे, देशी फैशन ज्यादा है। यहां केवल एक पक्की सड़क है जो भागल की पोशाक धारण करते थे। केवल उत्सवादि तथा अन्य पुर शहर तक चली गई है। बी. एन. उबलू रेलवेका यहां राजकीय अवसरों पर राजेसी ठाठ पसन्द फरमाते थे। एक स्टेशन भी है। यह स्थान आम्र-काननसे आच्छादित अन्त समयमें आप बृजमोहन ठाकुर, जगमोहन ठाकुर है। वर्षातुर्मे यहाँका दृश्य बहुत ही रमणीय और | और कृष्णमोहन ठाकुर तीन पुनरत्न छोड़ इहधामका मेलोंको सुखद प्रतीत होता है। जिधर दृष्टि दौड़ाई जाय, | परित्याग कर सुरधामको सिधारे। ये तीनों भाई भी उपर ही सज मखमली फर्श विछा मालूम होता है। योग्य पिताके योग्य पुत्र थे। प्रायः सभी कामों में अपने कोई स्थान ऐसे हैं जो बड़े शान्त और सुरम्य दिखाई। पूज्यपाद पिताका अनुसरण करते थे।