पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३३

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प्रौढ़ा-अधोरा-प्लक्ष परकीया और सामान्या ये तीन भेद इसमें लगते हैं। २ प्रौह (सं० पु. ) म अह-क, प्रदूहति वृद्धिः। प्रकर्षरूपसे वह स्त्री जिसे जवान हुए बहुत दिन हो चुके हों। ऊह, यथाविधि विवाह। प्रौढा-अधीरा ( स० स्त्री० ) वह प्रौढ़ा नायिका जो अपने प्लक (सं० पु०) प्र-कै-क, रस्य ल। स्त्रियोंका अधोऽङ्ग- नायकमें विलाससूचक चिह्न देखने पर प्रत्यक्ष कोप करे, भेद, स्त्रियों का कमरके नीचेका भाग। अधीरा नायिकाका लक्षणसम्पन्न प्रौढ़ा। प्लक्ष (सं० पु० ) प्लक्षाते भक्षाते विहगादिभिरिति प्लक्ष- प्रौढाधीरा (म० स्त्रो० ) वह प्रौढ़ा नायिका जो नायकमें कर्मणि घम् । १ वृक्षविशेष, पाकर नामका वृक्ष । इसे विलाससूचक चिह्न देखने पर प्रत्यक्ष कोप न करके तैलङ्गम गङ्गरजुवि और तामिलमें पोरिशरावो कहते हैं। व्य ग्यसे कोप प्रकट करे, ताना मार कर क्रोध प्रकर घृहत् प्लसका संस्कृत पर्याय ---जटी, पकेटो, पर्कटि, लक्षा, करनेवाली प्रौढ़ा। प्लीक्षा, जटि, कपोतन, क्षीरो, सुपार्श्व, कमण्डलु, शृङ्गी, अवरोहशाखी, गर्दभाण्ड, कपीतक, दृढ़प्ररोह, लवक, प्रौढाधीराधीरा (सं० स्त्री०) यह प्रौढ़ा जिसमें धीराधीराके गुण हों, वह नायिका जो अपने नायकमें पर-स्त्रीगमन- प्लवङ्ग, महावल । छोटे प्लक्षका पर्याय-सूक्ष्म, सुशीत, के चिह्न देखने पर कुछ प्रत्यक्ष और कुछ व्यंग्यपूर्वक : शीतवीर्यक, पुण्ड, महावरोह, ह्रस्वपर्ण, पिम्बरि, भिदुर, कोप प्रकट करे। मङ्गलच्छाय। गुण--कटु, कषाय, शिशिर, रक्तदोष, मूर्छा, भ्रम और प्रलापनाशक तथा भावप्रकाशके मतसे प्रौढ़ि (स० स्त्री० ) प्र-वह-क्तिन्, सम्प्रसारणं प्रादृहेति योनिदोष, दाह, पित्त, कफ, शोध और रक्तपित्तनाशक । वृद्धिः। १ सामर्थ्य, शक्ति । पर्याय- उत्साह, प्रगल्भता, २ अश्वत्थवृक्ष, पीपल । ३ सात कल्पित द्वीपोंमेंसे एक अभियोग, उद्योग, उद्यम, कियदेतिका, अध्यवसाय, ऊर्ज। द्वीपका नाम। भागवतमें लिखा है, कि यह जम्बूद्वीपके २ धृष्टता, ढिठाई। ३ प्रौढ़ता । ४ वादविवाद । चारों ओर है और दो लाख योजन विस्तृत है। यहां एक प्रौढोक्ति (स० स्त्री० ) १ अलङ्कारविशेष । इसमें जिसके प्रकाण्ड प्लक्षका वृक्ष है। यह वृक्ष जम्बूद्वीपमें जो जामून उत्कर्षका जो हेतु नहीं है, वह हेतु कल्पित किया जाता . का वृक्ष है उसीके समान उन्नत और विस्तृत है। इसी है। २ गूढरचना, किसी बातको खूब बढ़ा कर कहना। प्लक्षवृक्षसे इस छोपका नामकरण हुआ है। यह वृक्ष हिर- प्रोण ( सत्रि०)प्र-उण-अपनयने अच। निपुण । २. ण्यमय है और इस पर सप्तजिह्वअग्नि स्वयं अवस्थित है। प्रकर्षरूपसे अपसारक। प्रियव्रतके पुत्र इध्मजित इस द्वीपके अधिपति माने जाते प्रौष्ठ (सं० पु० ) प्रकृष्ट ओष्ठोऽस्य वा बाहु० वृद्धिः। हैं। इस छोपको सात वर्षों में विभक्त कर सात वर्षों के मत्स्यभेद, सौरी मछली। नाम पर जिनके माम थे, उन्हें घे सात वर्ष समर्पण कर प्रौष्ठपद ( स० पु० ) प्रौष्ठो गौस्तस्यैव पादा यासामिति आप तपस्यामें लग गये। उक्त सात वर्षों के नाम ये हैं-- प्रोपदा मानविशेषाः, तद्युक्ता पौर्णमासी, प्रोष्ठपद शिव, वयस, सुभद, शान्त, क्षेम, अमृत और अभय । उक्त ( नक्षण युका कालः । पा ४।२।३) इति अण ङोप। , सात वर्षों में मणिकूट, वजकूट, इन्दुसीम, ज्योति'मान, सोऽस्मिन् पौर्णमासीति । पा४।२।२१ ) इति अण् । १ भाद्र । सुवर्ण, हिरण्यष्ठीव और मेघमाल नामके सात पर्वत और मास । इस मासमें जो पकाहार रहते हैं, वे समस्त ऐश्वर्य : अरुणा, मूमला, आङ्गिरसी, सावित्री, सुप्रभाता, ऋत- लाभ करते हैं। २ कुवेरके निधिरक्षकोंमेंसे एकका नाम। म्भरा और सत्यम्भरा नामकी सात नदियां हैं। इन सब (त्रि०) ३ प्रोष्ठपदामें अर्थात् उत्तरभादपद तथा पूर्वभाद- ! नदियोंका जल स्पर्श करनेसे रजातमोगुण-रहित हो कर पद नक्षत्रमें जात । यथाक्रम ब्राह्मणादि चार बों के हंस, पतङ्ग, ऊर्धायन और प्रौष्ठपदिक (सं० पु० ) भादपद, भादों। सत्याङ्गनामक चार व्यक्ति हजार वर्षकी परमायुलाभ प्रौष्ठपदी (सं० स्त्री० ) भादमासकी पूर्णिमा । करते हैं। ये लोग आत्मविद्यालाम करके देवताके सद्रश प्रौधिक ( सं० लि. ) उत्तम भोपयुक्त । हो अवस्थान करते हैं। (भाग० ५।२० म०)