पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३३१

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कलता फूलता है। "भ्या-चिराज्य" म्पाय ही राज्य है। महाते में जो फूलकी क्यारियां है उनमें तरह सहके फूल बायसे पद-युत होने पर अधोगतिको प्राप्त होना | लगते हैं जिससे इसकी शोभा और भी खिल जाती है। महता है। राज्य छोटा हो या बड़ा, धर्म ही राज्यकी वर्ष भी पूरा नहीं हुमा है कि आपके एक पुलरखने जन्म- बड़ और जबरदस्त ढाल है। कहनेका तात्पर्य यह कि ग्रहण किया है। इस जन्मोत्सबमें भापने करीब बीस बाबू प्राणमोहन ठाकुर धर्ममूर्ति थे। सहानुभूति हजार रुपये खर्च किये थे। कहते हैं, कि जो भिखममा और उदारताने आपमें अच्छा दखल जमाया था । प्रजाकी आता, चाहे उसकी मांग कितनी ही बड़ी क्यों न हो भाईकी ओर आपका विशेष ध्यान थालडाई झगडे- महमांगी वस्त पा कर निहाल हो घर जाता था। स्टेट से आप एक पुरसा दूर रहते थे। अपने प्रपितामह भरमें जहां देखो, वहीं आनन्द, वहीं सुख, वहीं सौभाम्य वाबू मदन ठाकुरके चलाये हुए सदावत को आपने अपने सम्पद दिखाई देती थी। जीवन भर अच्छी तरह निभाया। दीन विद्यार्थियों के यहां 'देवी गङ्गावती ठाकुरानी' नामक १ वातव्य लिये पठनपाठनकी सामग्री बिना मूल्य देनेका आपने अस्पताल है जिसमें रोगी भी रखे जाते हैं। प्रबन्ध कर दिया था। पर दुःखका विषय है, कि अधिक इलाज अच्छा होता है, दूर दूर ग्रामोंके लोग इलाज दिन तक यह सुखभोग आपके भाग्यमें न बदा था। कराने यहां आते हैं। अलावा इसके तीन विशाल मन्दिर अकाल ही आप कराल कालके गालमें पतित हुए। पर हैं जिनमें राधाकृष्ण, लक्ष्मीनारायण मुरलीवाली दुतमा ही सन्तोष था आप तीन पुत्ररत्न छोड़ गये थे। मूर्ति प्रतिष्ठित हैं। प्रथम दो मन्दिर गङ्गाके किनारे भव- ज्येष्ठ पुत्र राजमोहन ठाकुरका भरी जवानीमें स्वर्ग स्थित हैं जिससे इनकी प्राकृतिक शोभा अति मनोरम वास हो गया। आप आदश मूर्ति थे। आपकी मृत्यु है। राधाकृष्णका मन्दिर गुम्बजदार है और उसमें जो पर प्रजाकी बात तो दूर रहे, विपक्षियोंने भी शोक प्रकट सीढ़ियां लगी हैं वे गङ्गाके किनारे तक कूछ गई हैं। उक्त किया था। आपके कनिष्ठ दो भ्राता, श्री नरेशमोहन मन्दिरके चारों ओर करीब बीस गुम्बज हैं जिनमें वर- ठाकुर और श्री सूर्यमोहन ठाकुर अभी नाबालिग हैं। सिंह, चन्द्र, सूर्य आदि संगमर्मरको मूर्तियां स्थापित हैं। ___ आप दोनों भाई योग्य पिताके योग्य पुत्र निकले।। राधाकृष्णकी मूर्ति अष्टधातुको बनी हुई है और क्रमशः आगे चल कर आपसे बहुत कुछ उन्नतिकी आशा की डेढ़ दो फुट ऊँची होंगी। यह अक्षय कीर्सि बाबू जाती है। संसारमें जो महान् आत्माएँ हुई हैं उनको श्रोमोहन ठाकुरकी है। स्थापनकालसे हो मुंगेर जिले- सदैव अनेक प्रकारके कष्ट सहने पड़े हैं। वास्तवमें ये के अन्तर्गत कसबा प्रामवासी स्वर्गीय मुकुन्द झा उक्त कट हो आत्माको उउन पद प्राप्त करने में सहायक होते युगल मूर्तिकी सेवा शुभषा किया करते थे। दरबारमें हैं। बाप क्रमशः ७५ वर्षकी अवस्थामें पिताहीन तो हो| उनकी अच्छी खातिर थी। ये कट्टर धार्मिक और श्री. हो सके थे परन्तु कुटिल कालने आपको मातहीन भी कर मुरलीधरजीके परम भक्त थे । सन् १३२७ साल किया। श्रीनशमोहन ठाकुरको अभी चढ़ती जवानी (१९२० ई०) भादोंको अमावसमें उनकी मृत्यु कहते है। भाप धीर, शान्त, सबस्ति और विद्याशारागी | हैं, कि जिस दिन उनकी मृत्यु हुई, उसके ठीक एक घंटा हैं। सङ्गीत विद्यामें भापका विशेष अनुराग है। व्यव | पहले उन्हें ऐसा मालूम पड़ा, मानो कोई उनके कानमें बर-शिल्पके अनेक विषयों में आपका साधारण | जोरसे कह रहा हो, 'गङ्गाके किनारे चलो'। तदनुसार . अधिकार और ध्युत्पत्ति देखी जाती है। राजनैतिक उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीनरसिंह भाको जो वहां पर विषयों में भापकी अच्छी सूझ है। कभी कभी थे, बुलाया और गङ्गाके किनारे ले जानेको कहा। अापके मनेजर भी इस विषयमें आपसे परामर्श लेते हैं। आश्चर्यका विषय है, कि ज्यों ही गङ्गाजीमें उन्हें प्रवेश बुद्धिमापकी सराहनीय है, इसमें सन्नेह नहीं। आपका | करा कर मुखमें जल दिया गया त्यों ही उनके प्राणमयेक 'कशनगढ़' नामक प्रासाद बहुत उब और मुरम्य है। उड़ गये। Vo. XV. 82