पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३४०

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३३४ काकोल्यादि गणके योगसे पक्व घृतका सेवन, कुलथी, | प्रयोग करना चाहिये। कुक्कुटी, मर्कटी, शिम्बी, अनंता शंखचूर्ण और सगधादिका प्रदेह करना चाहिये । गृध्र आदि द्रव्य शरीरमें धारण करना चाहिये। कच्चे तथा उल्लू, आदिके पुरीष और जौ आदिके धूपका शाम सबेर पक्के मांसका या शोणितको चतुष्पथमें निवेदन कर प्रयोग करनेसे ग्रहप्रकोप शान्त होता है। घरमें बच्चेको सर्वगंधादि जलमें स्नान करा यह स्तुति- ____खोल, दूध, शालिअन्न, दही आदिसे गोपालके घरमें | मंत्र पढ़े- निवेदनपूर्वक पूजा करे और नदीसङ्गम पर धाली और "कराला पिङ्गला मुण्डा कषायाम्बरवासिनी। बालकको स्नान करा कर इस प्रहको इस प्रकार स्तुति देवी बालमिमं प्रीता सन्धत्वचपूतना ॥" करे। शीतपूतनाप्रहकी चिकित्सा-कपित्थ, सुवहा, "नानावनधरा देवी चित्रमाल्यानुलेपना। विम्बीफल, बिम्ब, प्रचीबल, नंदी, भल्लातकोंका सेक, छाग चलत्कुण्डलिनी श्यामा रेवती ते प्रसीदतु ॥ मूत्र, गोमूत्र, मोथा, देवदारु, कुष्ठ और सवंगधों इन लम्बाकराला विनता तथैव बहुपुत्रिका। सबसे तैलको पका कर उससे अभ्यंग करना चाहिये। रेवती सततं माता सा ते देवी प्रसीद तु॥" इसके सिवाय रोहिणी, धूना, स्खदिर तथा पलाश और पूतनाप्रहकी चिकित्सा-कपोतका, अरलुक, वरुण, | अर्जुनत्वक इन सबके काथसे भी दूधके साथ तैलको परिभद्रक, काष्ठमल्लिका आदि काथका परिषेचन, वच, | गरम कर अभ्यंजन करना चाहिये। गृध्र और उल्लूका हरीतकी, गोलोम, हरिताल, मनःशिला, कुष्ठ आदिसे पुरीष, अजगधा, सर्पनिर्मोक, निम्बपत्र और यष्टिमधु पक्व तैलमईन, तुगाक्षीर, मधुरक, कुष्ठ, तालिश, आदि धूमपानके लिये प्रयोज्य हैं। लम्बा, गुजा और खदिर, चंदन आदिसे पाक किया हुआ घृत, वच, कुष्ठ, काकादनी अङ्गमें धारण करना विधेय है। मूद्रके साथ हिंगु, गिरिकदम्ब, इलायचो और हरेनु आदिका धुवां देना अन्न पाक कर उससे नदीके किनारे शीतपूतनाको चाहिये। गंधनाकुली, कुंभिका, कर्कटकी हड्डी और घृत- तर्पण करना चाहिये। मद्य और रुधिरका देवीको का धूप प्रयोग करना चाहिये। काकादनी, चित्रफला, उपाहर दे जलाशयके किनारे बालकको यह मंत्र पढ़ षिभ्वी और गुजा आदि शरीर में धारण करना चाहिये। स्नान करावे। मत्स्य, अन्न, फशर और मांस इन सबको शराबेमें ___ मंत्र-"मुद्रौदनाशनादेवी सुराशोणितपायिनी। रख आच्छादन शून्य घरमें निवेदन कर यथाविधान पूजा जलाशयालया देवी पातु त्वां शीतपूतना । करनी आवश्यक है। पश्चात् उच्छिष्ट जलसे वालकको मुखमण्डिकाकी चिकित्सा-कपित्थ, विल्य, तर्कारी, स्नान कराना चाहिये। स्नान के बाद स्तुतिमंत्र-- वांसी, श्वेत एरण्डपत्न, कुवेराक्षी आदि द्रव्योंके काथका "मलिनाम्बरसंवृता मलिना कक्षमूद्ध जा। सेक, भृङ्गराज, अजगधा, हरिगधा आदिके रसमें बच शून्यागाराश्रिता देवी दारकं पातु पूतना॥ डाल तैल पका कर अभ्यंजन करे। सौंफ, दुग्ध, तुगाक्षीर, दुर्दर्शना सुर्दुगंधा करालमेघकालिका । मङ्गना, मधुर और स्वल्पपंचमूल आदि द्रष्योंसे तैयार भिन्नागाराश्रया देवी दारुक पातु पूतना ॥" किपे हुपे घृतका पान करना चाहिये। वच, धूना, कुष्ठ मंधपूतमा-प्रहकी चिकित्सा-तिक्त वृक्षोंके पत्तोंका और घीका धूप लेना चाहिये । चास, चोरल्ली और काथसेक, सुरा, कांजी, कुष्ठ, हरिताल, मनःशिला और सर्प आदिको जिह्वा अङ्गमें धारण करना, वर्णक, चूर्णक, धूना द्रव्योंसे पकाया हुभा तैलका अभ्यङ्ग, पिप्पली- माल्य, अजन, पारव, मनाशिला, पे सब और पायस मूल, मधुरवर्ग, मधू, शालपानि और वृहती इन सब तथा पुरोडास, गोष्ठमें बलिप्रदान मंत्रपूत जलसे शिशुको द्रव्योंसे पकाये हुये घृतका पान, अङ्गों में सब प्रकारका स्नान करा यह प्रदेह और चक्षों में शीतल प्रदेह ही विधेय है। मुर्गे का ' "अलंकृता लपवती सुभगा कामरूपिणी । पुरोष, केश, चर्म, सर्पनिमोक, और जीर्णवस्त्रोंका धूम्रो गोष्ठ मध्यालयरता पातु त्यो मुखमण्डिका ॥