पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३५१

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पालि ३४५ विलम्ब हो जानेसे सुप्रीबने निश्चय कर लिया, कि वालि रज नामके राजा राज्य करते थे। उनके चन्द्रमालिनी की मृत्यु हो गई। वह द्वार पर एक बड़ा भारी पत्थर नामको रानी महामनोश अपनी सुंदरतासे चन्द्रमाको भी रख कर किष्किन्धा लौटा और वहां जा कर बालिका : लजित करनेवाली थी। उन दोनोंका काल सुखसे मृत्यु-संवाद प्रचारित किया। बालिको मृत्यु हुई जान व्यतीत होता था। एक दिन रानी चन्द्रमालिनीने रात्रि- कर मंत्रियोंने सुप्रीवको राजा बना दिया। पश्चात् के समय शुभ स्वप्न देखे। उन स्वप्नोंके फलके अनु- सुग्रीव उनसे मिल कर सुखसे राज्य करने लगे। इस सार रानीने गर्भ धारण किया । नवें मास रानीने तरह कुछ दिन बाद बालि उन दैत्योंको मार कर उस शुभनक्षत्रमें सघ लक्षणयुक्त पुत्र प्रसव किया। वह गुफाके द्वार पर आया, तो देखा कि वहां पत्थर रखा बालक क्रमसे बड़ा हुआ। अवस्थाके अनुसार यथा- हुआ है। बालिने उस पत्थरको पैरोंकी ठोकरसे तोड़ विधि उसके यज्ञोपवीतादि संस्कार भी हुये। उसने डाला और अपने भवनमें पहुंचा । सुग्रीवको राज्य और बाल-अवस्थाका उलङ्घन कर यौवन अवस्थामें पदार्पण पनीका भोग करते देख बालि मारे क्रोधके अधीर हो उठे किया। उसके परिक्रमकी गुणगाथा समस्त संसारमें और सुग्रीवको मारनेके लिए उद्यत हुए। सुप्रीवने भाग ध्याप्त हो गई । उसके समान बलवान् तथा धैर्यवान उस कर मतङ्गका आश्रय लिया। बालि अपनी पत्नी तारा समय कोई भी न था, अतएव सब लोग 'बाली' कह और भ्रातृ-वधू रुमाको ले कर सुखसे रहने लगे। कर उसका सम्मान करने लगे। किसी समय रावण बालिको पराजित करने के अभि- एक दिन राजा सूर्यरथको संसारसे वैराग्य हो गया। प्रायसे किष्किन्धा पहुंचा उस समय बालि दक्षिणसागर- ये द्वादश भावनाओंका चितवन करने लगे। यद्यपि में सन्ध्या कर रहा था। रावणके वहां पहुंचने पर, वे संसारसे पहिले हीसे उदासीन थे; पर अब उनका बालिने अपनी बगलमें दवा और भी तीन सागरोंमें भ्रमण मन संसारमें जरा भी न लगा। उन्होंने अपने प्रिय पुन करके सन्ध्या समाप्त की। इस पर रावणके विशेषरूप बालिको राजा सौंपा और आप तपोवनमें जा दिगम्बरी से पराजय स्वीकार करने पर बालिने उसे छोड़ दिया। दीक्षासे भूषित हुये। उधर सुग्रीव बालि द्वारा निकाले जानेके कारण मतङ्गा महापराक्रमी वालि किष्किन्धा नगरीके सिंहासन पर श्रममें ही दिन बिता रहा था। रावणके द्वारा सीता बैठ न्यायके अनुसार प्रजाका पालन करने लगे। वे धर्मा- हरी जाने पर जब राम और लक्ष्मण सीताकी खोजमें त्माओंके शिरोमणि थे। प्रतिदिन ढाईद्वीपमें विद्यमान निकले, तो मतङ्गाश्रमवासी सुग्रीवसे उसकी मित्रता जिनचैत्यालयोंका दर्शन कर आते थे। इनके छोटे हो गई। सुप्रीवकी सहायता करनेको उन्होंने बचन भाईका नाम सुग्रीव था । दिया और तदनुसार रामने बालिका बध किया। बालिके | राक्षसवशीय दशाननका प्रबल प्रतापीरूपी सूर्ण उस मारे जाने पर सुग्रीव फिर किष्किन्धाका राजा हुआ और समय मध्याह्नमें तप्तायमान हो रहा था। वह लड्डाका बालिका पुत्र अङ्गदको युवराज-पद मिला। लङ्काधिपति | राज करता था तथा अपने पराक्रमसे तीन खण्डों- रावणके साथ युद्ध करते समय इसी बालि पुत्र अङ्गद को जीता था। भूमि गोचरी और विद्याधर समस्त तथा सुप्रीवने सेनापति हो कर कई लाख बानर-बाहिनी राजा उसके चरणोंकी सेवा किया करते थे। जब बालि द्वारा श्रीरामचन्द्रकी सहायता की थी। राज्यसिंहासन पर बैठे, तब उन्होंने रावणकी आशा (रामा० कि० उ०कापड) मानना अस्वीकार किया। रावणने उसको अपनी आक्षा- वानरवंशी राजा बालिके विषयमें जैन-पद्मपुराणमें से विमुख हो जान शीघ्र ही उसके पास एक दूत भेजा। इस प्रकार लिखा है- दूत बडे अभिमानसे बालिके दरवारमें जा रावण- विद्याधर क्षेत्रमें एक किष्किधा नामकी नगरी है। की प्रशंसा कर कहने लगा, 'हे बालि! तुम्हारे पिताको उस नगरीमें सर्व लक्षणयुक्त सूर्य के समान प्रतापी सूय- दशाननने इस किष्किन्धापुरीका राज्य दिया था ।जब तक Vol. xv. 87