पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३५९

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पासिद्वीप ३५३ जदे पञ्चुतन देवतादि आकिरण ना रमयून नः कलेरण ... ...। । रण जाति 'कहुल' वा दास कह कर प्रसिद्ध । भारतवर्ष चार वर्णीको छोड और भी अनेक मिश्र मः पूटू (कन्या)---न मदे जातियोंका निवास है; किन्तु बालिके हिंदुओमें वैसी मिश्र पञ्चुत्तन वा सङ्कर जाति नहीं पायी जाती। जैसे भारतमें अनु- देवतादि ओकीरण देनपस्सर (राजवंश लोम और प्रतिलोम सङ्कर जातिको उत्पत्ति हुई है वैसे वालिद्वीपमें उनकी उत्पत्ति नहीं है। ____ भारतमें तीन जातियां द्विज कही जाती हैं। उनका नाजदे देवतादि मुचुक अनक अगुङ्गलनङ्ग यथाकालमें यज्ञोपवीत संस्कार भी होता है। पे जातियां अपनी अपनी जातिमें ही विवाहादि-सम्बन्ध करती हैं। नःजदे, देवतादि गदोंग अमक अगुग लनंग इन तीन वर्षों में उच्चवर्णका कोई मनुष्य यदि अपनेसे चारकन्या नीचवर्णकी कन्याके साथ विवाह करे, तो उस कन्याके सगुङ्ग आदि, सगुङ्गमदे, । गर्भसे पैदा हुई संतान पितृजातिको प्राप्त करनेके अधि- सगुग ओक, सगुग रक नःजदेपञ्चु नःमदे पञ्चु | कारी होती है। क्षत्रिय और वैश्योंमें ऐसे विवाह बहुत नः पुटू प्रचलित हैं। ऐसी बहुत-सी शूद्र जातिकी त्रियां देन पस्सर-राजवंश। धनियों के घरमें दासी या भोग्या कह कर रखी जाती नम्र र कलेरन हैं और उनकी सन्तान शद्र समझी जाती है। किन्तु जब इनका विवाह-सम्बन्ध होने लगता है, तो उन नामदे पञ्चु० अनक अगु'गरहि गोष्ठी अलितपञ्चु गोष्ठीन कटुट को पितजातिकी ती सोय इन्होंने नः पुटुको (कलेरण कराण (कङ्गिमन राज- सन्तान उच्चवर्णकी स्त्रीसे पैदा हुई सन्तानों से नीची विवाहा था) और कूट्टके राजा) वशके प्रतिष्ठता अवश्य गिनी जाती हैं। यदि कोई ब्राह्मण शूद्रसे विवाह देन पससरके पुलव कर ले तो उसको प्रायश्चित्त करना होगा और स्त्रीको संस्कार द्वारा शुद्ध कर घरमें ले जाना होगा। उस स्त्रीके नामदे पञ्चु देवतादि नः काशीमन् (पदोङ्गके न जम्बे साथ उसके पिताके कुलका कोई सम्बन्ध नहीं रहता। शासनकर्ता इन्होंने अगुग रकको प्रतिलोम-विवाह बिलकुल ही वर्जनीय है। यदि ऐसा विवाहा था) अनक अगुग कोई सम्बन्ध करे, तो उसको निर्वासन अथवा प्राणदण्ड अलिट जदे भोगना पड़ेगा। कोई ब्राह्मणवंश दो तीन पीढ़ी । । तक शूदों के साथ विवाहादि क्रिया करे, तो वह भी शूद्र नः जदे पुत्र नः जदे ओक मदे नप्र र कटुट नः नः कटूट जातिमें गिना जायगा। यदि कोई ब्राह्मण हीन कर्म अथवा वर्ण वा जाति-विभाग । अपने धर्मका त्याग कर दे, तो उसे शून जातिमें ही शुमार बालिखोपके रहनेवाले ज्यादा हिंदू और कहीं कहीं बौद्ध किया जायगा। भी हैं। यहां चारों वर्ण रहते हैं। ब्राह्मण, सलिय (क्षत्रिय), वेश्य (वैश्य) और यूद इन चार वर्ण वा जाति- बालिद्वीपके ब्राह्मण भगवान् द्विजेन्द्र बहु खु (नवा- को छोड़ और कोई भी तरहके मनुष्य यहां पर नहीं हूत ) पदण्डके वंशधर कहे जाते हैं। यवद्वीपके केदिरि रहते हैं। नामक स्थानमें इस ब्राह्मणका वासस्थान था। उनके ब्राह्मणोंकी इदा', क्षत्रियोंकी 'देव' और वैश्योंकी गुष्टि (गौष्ठी) पदवी है। शूद्रको कोई भी पदवी अथवा | वंशधर वहांसे मजपहित चले गये, फिर मजहपहितसे सम्मानसूचक शब्द नहीं है। इसलिये विदेशी वा साधा- बालिबीपमें भा कर पास करने लगे। Vol xv,89 क्षत्रिय ब्राझण।