पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३६०

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३५४ बहुतों का विश्वास है, कि पहिले पे ब्राह्मण भारतसे ब्रामणों में जो सम्पूर्ण शास्त्रों का रहस्य जानते हैं यद्वीप गये थे। भगवान् द्विजेन्दु उनमें श्रेष्ठ अथवा और समस्त ब्राह्मणोचित कार्यों में पारदर्शिता प्राप्त करते नेता थे। विजेन्द्र के बहुत सी स्त्रियां थीं। उनमें से पांच हैं घे गुरुके द्वारा दण्ड पा कर 'पंण्डितदव्य' या 'पदण्ड' स्त्रियों के गर्भसे उत्पन्न सन्तान पांच विभागों में बट कर उपाधि पाते हैं। गुरुके चरणों में अपने मस्तकको रख वालिद्वीपमें बास करने लगी। इन पांच शास्त्राओं के अविरत गुरुके पादोदकका पान, हर तरहसे गुरुकी आहा. नाम-.-१ कमेमु, २ गेलगेल, ३ नुभावा, ४ मास और ५ | तत्पर रहने आदि कठोर कार्य में उत्तीर्ण होने पर भी इस कायशन्य। उपाधिकी प्राप्ति होती है। जो ब्राह्मण-छाल गुरु-गृहमें ___गियान्यरप्रदेशके कमेनु नामक स्थानमें जिनका वास बास कर इस उपाधिको प्राप्त करनेकी कोशिश करते हैं है वे लोग कमेमु-ब्राह्मण हैं। ये ब्राह्मण-त्रियोंसे पैदा हुए राजा :नको यथेष्ट उत्साह दान आदिसे संतुष्ट करते हैं। गेलगेल नामक स्थानमें जिन ब्राह्मणों का वास था वे रहते हैं। गेलगेल ब्राह्मण कहे जाने लगे। घे विजेन्द्रकी क्षत्रियपत्नियों “पदण्ड" उपाधिके पानेवाले ही राजाके दण्डा- मे उत्पन्न हुये थे। द्विजेन्द्र के औरस और क्षत्रिय-बाल धिकारी और धर्माधिकारी होते हैं। समस्त अधर्म- विधवासे नुआवा-ब्राह्मणों की उत्पत्ति है। इसी तरह चारियों को दण्ड देते हैं। इन्हीं पदण्डों में कोई वैश्य कन्यासे मासब्राह्मणों की और शूद स्त्रीसे कायशून्य पुरोहित होते हैं। इदा या साधारण ब्राह्मणों में जो नामके ब्राह्मण पैदा हुये हैं। विद्या, बुद्धि और सरलतामें पदण्ड हो सकते हैं उन्हीं- जहां क्षत्रियोंका राज्य है वहां गेलगेल ब्राह्मणों को को राजा अपना पुरोहित बनाते हैं। प्रधानता और जहां वैश्यों की प्रधानता है वहां मास- कुलपुरोहित हो राजगुरु होते हैं। राजा उनका ब्राह्मण सचराचर दान पूजा किया करते हैं। मिन्न | शिष्य होता है और उनकी हर तरहसे सेवा किया करता वर्णकी संतानके सम्मानमें जरूर फर्क है। किन्तु उस है। वह समस्त राजनैतिक वा धर्मनैतिक कार्याम पुरोहित विषयमें जनताका कुछ भी ध्यान नहीं है । इन पांच से परामर्श लेना उचित समझता है। राज्य वा समस्त श्रेणीमें जो सच्चरित्र, साधुप्रकृति, धर्मशील, विद्वान्, राजपरिवारको मङ्गल कामनाके लिये पुरोहित सदा ही शास्त्रज्ञ हैं वे पूज्य और प्रधान गिने जाते हैं। यागयक्ष, शांतिपाठ, घेदपाठ आदि शुभकार्य में निरत वालिद्वीपमें ब्राह्मणोंकी ही संख्या ज्यादा है। सभी ग्राह्मण राजा और क्षत्रियों के अधीन हैं। क्या तो युद्ध बालिद्वीपमें भिन्न भिन्न श्रेणियों में एक एक पुरोहित क्या दृत-कार्य सब समयमें ब्राह्मणोंको राजाकी माझा हैं। केवल राजपुरोहित हो गुरु कहा जाता है और सब माननी पड़ती है । रजाकी आज्ञा उलखुन करनेसे ब्राह्मणों | उसको पूजते हैं। समस्त सामन्त भी पदण्डों में एकको को भी देशसे निकाल दिया जाता है। तो भी ब्राह्मण पुरोहित बनाते हैं और उसको गुरु कह कर पुकारते हैं। राजाओं की अपेक्षा उच्चपदस्थ और सम्मानित है। वे वर्तमान समयमै बालिद्वीपमें सात पुरोहित वा राजगुरु राजकन्याके साथ विवाह कर सकते हैं, किन्तु राजा हैं-कोङ्गकोङ्गमें दो, गियान्यरमें एक, बदोंग या बन्दन- ब्राह्मण-कन्याका विवाह अपने साथ नहीं कर सकते। पुरमें दो, तवानानमें एक एवं मैंगुइमें एक ऐसे सात बालिपमें ब्राह्मणोंकी ज्यादा संख्या है इसी लिये पुरोहित या राजगुरु यहां पर हैं। बालिके निवासी और जातियों का उतमा प्रभाव नहीं है। बहुत-सी इनको देवों की तरह पूजते या सत्कार करते हैं। गुरु जातियां उसी कारणसे दरिद हीन हो गयी है और जब राजपथसे वाहिर निकलते हैं तब हजारों मनुष्य आजीविकाके लिये अपने हाथसे कृषिकर्म करती है। उनको साष्टाङ्ग नमस्कार करते देखे जाते हैं और बहुतसे यहां तक कि मछली पकड़ने और शारीरिक परिभम लोग उनके पादोदक केनेके लिये अत्यन्त व्यस्त रहते द्वारा धन कमानेमें वे कुछ भी कसर नहीं रखते हैं।