पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३६३

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पालिद्वीप ३५७ ल्यमान बनी हुई है। भाषाके विद्वान् यह भी कहते प्राकृतिक भाषा अच्छी तरह बोल सकते थे, ऐसा बहुतोंका हैं, कि चार सौ वर्ष पहिले बालि, मलय और सुन्द प्रभृति विश्वास है । यदि ईसा जन्मके ५०० वर्ष बाद भारतवासिका द्वीप अर्द्धसभ्य थे। सुतरां वहांकी प्रचलित भाषा भी इस द्वीपमें आगमन मान लिया जाय तो कवि भाषाको । उसी तरह विकृत रही होगी, इसमें आश्चर्य ही क्या ? उत्पत्तिके प्रारंभमें कोई न कोई अवश्य ही कारण होगा। सुमानासे बालि और उससे पूर्वदिक वत्ती द्वीपों की क्योंकि, भारतीय प्राकृतकी विकृतिकासमावेश उसका एकदम भाषाका निकट संबंध देख कर भाषाके पंडितों ने यह नहीं हुआ है । भारतके बहुतसे हिंदू और बौद्ध लोग अपने सिद्धान्त किया है, कि बालिद्वीपमें मलय और सुन्द धर्मके प्रचारके लिये यवद्वीपमें आये थे। घे यद्यपि पाली निवासियोंका उपनिवेश हो इस भाषा-सामञ्जस्यका कारण और प्रकृत भाषाके खूब जानकार थे तो भी उनको अपने है। जब विजयी यवनिवासियों ने आकर बालिद्वीपके धर्ममें यहांके लोगोंको दीक्षित करनेके लिये यहाँकी भाषा बहुसंख्यक लोगों को इसी एक भाषामें बोलते देखा तब सीखनी पड़ी थी । बौद्धलोगोंके साथ ब्रह्मोपासक भाषाके परिवर्तन करने में उन्होंने किसी प्रकारकी चेष्टा हिंदू भी यव, वालि आदि द्वीपोंकी भाषा सीखने में रत हुये न की। उस समय यवद्वीपनिवासी यही भाषा थे। बालिवासियोंको अपने धर्ममें दीक्षित करने तथा बोलते थे, इसलिये वह बालिद्वीपको राष्ट्र भाषा बन अपने शास्त्रों में कथित पूजाओंमें विश्वास उत्पन्न कराने गई तथा पलिनेशिय-मिश्रित भाषा ही बालिद्वीपको और भक्ति उनके हदयमें जगानेके लिये बालिभाषा- निम्न श्रेणीको भाषा हो गई। का ही उन्होंने आश्रयग्रहण किया था। क्योंकि, धे पूर्वतन यवभाषाके सहित बालिदीपको भाषाका जो जानते थे, कि दूसरे देशमें अपना धर्म फैलानेके लिये निकट सम्बन्ध है वह कवि भाषामें मिले हुए तगल और | वहांकी भाषाका सीखना नितान्त आवश्यक है। प्रम्बनन मलय शब्दके अस्तित्वसे हो जाना जाता है। क्योंकि, और बुडोबुदोरके खंडहरोंसे जाना जाता है, कि यवद्वीपमें कविभाषाको उत्पत्तिके समयमें यवभाषा परिमार्जित नहीं बौद्ध और ब्राह्मण बे-रोकटोक एक ही स्थानमें रहते थे। हुई थी। कविभाषामें जो मलय शब्दका अस्तित्व है उस उनकी पूजापद्धति भिन्न अवश्य थी परन्तु आपसके मूल- यवभाषाका पलिनेशीय भाषाके साथ संबंध मालूम पड़ता मत्रोंमें कहीं भी भेद नहीं पाया जाता था। कवि भाषा- है। किन्तु वर्तमान यवद्वीप भाषामें मलयदेशीय शब्दका में रचित प्रथों का कुछ भाग शैव ब्राह्मणों के द्वारा बनाया प्रयोग नहीं देखा जाता। बालिद्वीपमें यवनिवासियों के गया है तो दूसरा भाग बौद्धों के द्वारा । दोनों ही प्रकारके आगमन और जातिविभागके स्थापित होनेसे यहांको ग्रंथों को बालिवासी आदरको दृष्टिसे देखते हैं और उन- भाषामें भी भेद दिखाई देता है. अर्थात् कुलीन ब्राह्मण | का पाठ करते हैं। मौर क्षत्रिय परिमार्जित उत्तम भाषा तथा निकृष्ट शूद्र विदेशियों के समानभाव होनेसे ही कविभाषाकी लोग जघन्य भाषा बोलते हैं। बालिद्धीपके निकट- उत्पत्ति होती है। भारतसमागत बौद्धों ने यवद्वीप- वी स्थानों में हिन्दू सभ्यताका विस्तार है, तो भी उन निवासियों की संख्या अधिक देख कर नई भाषाका प्रचार लोगों की आदि और पैतृक भाषामें कोई विशेष भेद नहीं करने में साहस नहीं किया। बौद्धलोगों ने विज्ञान और है। कथित भाषाको छोड़ बालिद्वीपमें लिखित भाषा भी धर्म शास्त्रों के भावों को तई शनिवासियोंके सरल रूपसे है। वर्तमान प्रन्थों के अतिरिक्त प्राचीन काव्यपंथ समझाने के लिये वहांकी भाषा संस्कृतका प्रचार किया। कवितामें तथा ब्राह्मणों का धर्म शास्त्र संस्कृत भाषामें यवद्वीप निवासियों की भाषामें ऐसा अर्थबोधक कोई शम्द लिपिवद्ध होते थे। जो ब्राह्मण यवद्वीपमें आये वे अपने म रहने के कारण भारतीय धर्मोपदेष्टाने उनकी शिक्षाके धर्म शास्त्रयों को साथमें लाये थे, ऐसा सभी लिये अगणित संस्कृत शब्द भाषामें विशिष्ट किये। उसी स्वीकार करते हैं। ये लोग उच्च श्रेणीके संस्कृतविद्वान् थे; मिश्र भाषासे प्रन्थ लिखे गये और धर्म शिक्षाका कार्य किंतु प्राकृत भाषामें भी उनकी विशेष व्युत्पत्ति थी तथा वे संपन्न होने लगा। Vol. xv 90