पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३६४

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३५९ बाविस सब शब्द संस्कृत धातुओं के हैं, तोभी प्रकृति से अलग हो गया। जयपके राज्यकालमें और भी प्रत्यय आदिका व्यवहार इनमें हुआ है। क्योंकि, संस्कृत | अनेकों प्रयोकी रचना हुई थी। व्याकरणको नहीं जाननेवाले यवनिवामियों के लिये ये ३-मजपहितके राज्यकालमें रचित प्रथावलीमें शब्द पढ़ने में अत्यंत कठिन होते। यव और बालि- संस्कृत के साथ प्राग्यभाषा भी मिली हुई देखी जाती है। द्वीपकी भाषामें जिन संस्कृत शब्दोंका प्रयोग है, वह भार ४–परवती समयमें पुरोहित और क्षलियों द्वारा तीय व्याकरणसिद्ध शब्दों में बहुत अपभ्रंश है। अनेक | रचित प्रथ। जगह 'व' स्थानमें ओ अथवा ओ स्थानमें व, य स्थानमें | भाषाके वेत्ताओं ने पालि साहित्यके इस प्रकार प, उस्थानमें ऊ,ई स्थानमें ए, र स्थानमें द्वित्वर,प्र उपसर्ग- श्रेणीका विभाग किया है-म वालिभाषामें लिखे टीका- स्थान पर तथा शब्दके आदिस्थ आकारका लोप आदि सहित संस्कृत प्रन्थ । वेद, ब्रह्माण्डपुराण, तुतुरसमूह पान्तर देखा जाता है। जैसे अनुग्रह स्थानमें नुग्रहका (तंत्र), श्य कविप्रथावली । यथा-(क) पवित्र पौराणिक प्रयोग देखने में आता है, वैसे कविभाषा गठित होने पर भी प्रथ- रामायण, उत्तरकाण्ड और पर्वसमूह। (ख) पालिधीपके पवित्र वेद और पुराणादि संस्कृत भाषामें निम्न कवितायें-विवाह, बारतयुद, आदि। ३८ वष लिये गये हैं तथा एकमाल पुरोहित लोग ही इन प्रन्थों को। और बालिद्वीपकी भाषाकी मिश्र रचना। कितने हो स्थानीय कितुङ्ग मालामें लिखे हुये मिश्रन थ, कितने ही धर्म और पुराणी कथायें जनसाधारणमें विज्ञप्तिके ग्रंथ साहित्यमें रचित ऐतिहासिक उपाख्या, यथा- लिये कविभाषामें लिखी गई हैं। संस्कृत भाषामें । केनह ङ्गोक, रङ्ग लवे, उशन, पमेन्वङ्ग आदि । मार मूर्धा होनेसे थे पविल थ समझे जाते हैं। इसके अलावा पुरोहितोंके द्वारा रक्षित व्यवहार बालिबासी उनका आदर सत्कार विशेष रीतिसे करते शास्त्र और श्रीयश्चन नामक सङ्गीत शास्त्र ग्रंथ संस्कृत हैं। कविमाषा और श्लोक लिखमेकी भाषा बिलकुल मिश्र तीव्र भाषामें लिखे हुये हैं। भिन्न भिन्न हैं। बालिखोपके धर्मविषयक गुह्यमब कोई शिलालेख वा ताम्रपत्र न मिलनेसे प्राचीन अक्षर मौर वेदमन भारतीय श्लोकोंकी भाषामें लिखे गये माला निरुपित नहीं की जा सकती। हैं। यह मालावृत श्लोकभाषा यहां 'संकेत' (संस्कृत) बालिद्वीपमें १ रेगवेद (ऋग्वेद), २ यजुरबेद (यजुर्वेद), नामले प्रसिद्ध है। प्रत्येक इसका पाठी नहीं हो सकता। ३ सामवेद और ४ अत्तववेद ( अथर्वेद ) नामके चारों मतएव इसका 'रहस्य' नाम भी रखा गया है। घेदीका प्रचलन देखा जाता है। भगवान् प्यास (भार- कषिभाषाका गठन भिन्न भिन्न समयों में हुआ। तीय व्यास) उक्त वेदचतुष्टयके संग्रहकर्ता माने जाते है। पण्डितलोग पूजा, अप आदि कर्म, बेदर्मल, स्तुति, गाल, १-माय लङ्गगियरके राज्यकालमें विमाषामें देवताभोंकी भारति आदि धार्मिक काम करते हैं। यहां जोधरचित हुष, शैवप्राह्मणों के मससे वही भाषा सबसे ग्रामों के अतिरिक्त मन्य किसी जातिको बेद पढ़ाया पुरानी मौर सुन्दर है। उक्त राजा जयवयके पूर्वपुरुष अधिकार नहीं है। परिडत लोग अपेक्षाहत सुकुमार- कोपिरिम राज्य करते थे। इन्हींके समय बालिछीपमें मति प्राह्मणबालकोंकी ही मंसादिकी शिक्षा शिवपूजाका खूब प्रचार हुआ था। चारों वेदोंकी अक्षरलिपि वहांकी भाषा संस्कृतम्लोका- २-राजा जवषयके राज्यकालमें 'बारतयुद्ध' (भारत- कारमें लिखी हुई है । उक्त चारों वेदक मयं नानक युख)। इसको रचनाप्रणाली 'विवाह' या और दूसरे लिये कविभाषामें टिप्पणो उल्लिखित हैं। पुरोहित बौद्ध प्रयों के अलावा उज्वल है और आम तौरसे आदर- लोग मूल श्लोकोंका मर्थ स्मरण रखनेके लिपे क्स णीय है। शालिवासियोंके मतसे जगवय भारतवर्ष में टोकाका पाठ समय समय पर करते रहते हैं। राज्य करते थे। महाभारतीय युद्ध के बाद यद्वीप भारत- इन समस्त शास्त्रीले प्राचीनकाल मालिनी