पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३६७

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पालिद्वीप इसी स्मृतिके द्वारा वर्णित धर्मका अवलंव ले अपना नहीं थे तथा वे पहिले ३५ दिनका मास मानते थे। जीवन बिताते हैं । राजा अथवा ब्राह्मणको इस धर्मनीति- दिनोंके नाम पलिनेशिय और हिंदी भाषामें मिले हुए हैं। के अनुकूल कार्य करने पर “राजर्षि" उपाधि दी जाती है। यथा--रविति सोम, अङ्ग गर, धुङ्ग, वृहस्पति, शुक्र और तथा शास्त्रलिखित आचरणके नहीं करनेसे राजाओंकी शनैश्चर ( हिंदी ) एवं पहिङ्ग, पुअन, वगि, कालिवना अभिषेकक्रिया नहीं होती। और मेनिश (पलिनेशिय )। इसके अलावा उन लोगों ___ मलत् ग्रन्थमें पञ्जीको वीरकहानीका जिक्र है। उसके के ग्रह नक्षत्र आदिके विषयका तथा इनके द्वारा होने छंद किदुङ्ग कविसे बिलकुल अलहदे हैं। गम्थुः नामक वाले मनुष्योंके शुभ अशुभ फलोंका भी ज्ञान है। उनका नाट्यशालामें इस प्रथके स्थल विशेषका अभिनय होता चन्द्रमास शुक्ल ( तङ्गगल) और कृष्णपक्ष (पुङ्गलुअङ्ग) है। किंतु यहां पर कालिदासादि विद्वानों के बनाये गये ले कर माना जाता है। नाटकों का आभास मात्र नहीं है। भारतीय नाटकके ____ उक्त ३५ दिनमें ३५ नक्षत्रोंके फलाफलको छोड़ कर आदर नहीं होनेमें दो कारण कहे जा सक्त हैं। संभव भी वे जात बालकके शुभाशुभ जाननेके लिये सप्ताहके है कि, भारतीय ब्राह्मणों के यवद्वीप आनेके बाद कालि प्रति दिन १ देवता, २ नरमूर्ति, ३ वृक्ष, ४ पक्षी, ५ भूत दासादि पण्डितों के महामूल्य नाटक बने हों, अथवा और ६ सत्वके अस्तित्वको कल्पना करते हैं तथा उनके धर्मप्रचारक ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्रसे भिन्न जान नाटकों प्रभावों के अनुसार मानव चरित्रकी कल्पना करते हैं। की आलोचना करने में ध्यान नहीं दिया हो। __ अमृत, शून्य, काल, पति, और लिन्योक दिनके ये ____धर्मशास्त्र, पौराणिक कावा और इतिहासके अति पांच लक्षण हैं। अमृत क्षणमें उत्पन्न होनेसे सौभाग्यशाली रिक्त इनके यहां काल जानने के लिये ज्योतिषशास्त्र भी शून्यमें दरिद्र, कालमें रिपुवश, पति क्षणमें मृत्यु और हैं। कालके निणय करनेमें इन लोगों के दो मत हैं।। लिन्योकमें पैदा होनेसे मनुष्य असश्चरित्र और चोर होता एक भारतीय दूसरा बालीय अथवा पलिनेशिय । है। इसके सिवाय उनका दिन आठ घटिकों में विभक्त है। भृगुगर्ग नामक पुस्तकसे मालूम पड़ता है, कि वे लोग इसीको जाननेके लिये वे जलयंत्रका व्यवहार करते हैं। शालिबाहनराज-प्रतिष्ठित शक सम्वत् (७८ ई० ) से पानोकी घड़ी अपने देशमें भी प्रसिद्ध है। प्रत्येक राज- कालका निर्णय करते हैं तथा फसङ्ग अथवा चैत्र- महलमें ऐसी एक घड़ी होती है। पानी भरने पर उसके माससे वर्ष के आरंभका समय मानते हैं। मुसलमानों- पानी फेंकनेके लिये एक मनुष्य नियुक्त रहता है। जब के प्रभावसे यवद्वीपकी काल गणनामें हेर फेर अवश्य घड़ी पूरी हो जाती है तब वह जनताको जताने के लिये हुई, पर यहांकी गणनामें चन्द्रमासको जगह सौर मासके | नगारेमें चोब देता है। अतिरिक्त और कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ। जेष्ठ पंजिकाकी गणनामें भृगुगर्गके सिवाय वे सुन्दरी क्रम और आषाढ़के अतिरिक्त महीनों के नाम संस्कृत और और सुंदरी भुज्क नामकी पुस्तककी सहायता लेते हैं। बालिवेशकी भाषामें हैं। यथा-श्रावण (कस), वाद्र वा, ज्योतिषचक्रमें राशियोंको गणना करते हैं। वश्चिक बाबत ( भादप) अथवा करो. असजि ( आश्वयज के स्थानमें मृचिक, कर्कटके स्थानमें रकत, मीनके वा भाविन ) कतिग (कार्तिक ) अथवा कपत. माग- घरमें कुंभ और मेषके घरमें मकर आदि देखी जाती है। शिर, मार्गशीर्ष (अग्रहायन) वा कालिम, कनम वा पोष्य प्राचीन प्रीक लोगोंकी तरह ये तुलाराशि नहीं मानते। (पौष ), कपित वा माग (माघ ), कलुलु वा पाल्गुन तुलाके घर में वृश्चिकका अधिकार पाया जाता है। (फाल्गुन) कसङ्ग अथवा मधुमास (चैत्र), वादस वा घेशक भारतवासियोंकी तरह इनका भी विश्वास है, कि राहु (बैसाख ) एवं जेष्ठ ( ज्येष्ठ ) और आषाढ़। प्राचीन प्राससे सूर्य और चन्द्रमाका प्रहण होता है । सूर्य- रोमक आदिके मतके अनुसार बालिद्वीपमें पहिले १० ग्रहणका नाम 'प्रह' और चन्द्रग्रहका नाम 'राहु' है। महण- मास प्रचलित थ, उनमें ज्येष्ठ और आषाढ़ के दो मास के समय के यंत्रों और चित्कार द्वारा विकट शब्द करते Tol, XV. 91