पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३७

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प्लिहन-प्लीहन् (प्लीहा) सम्पादित हुआ था। उस पुस्तकमें आप ज्योतिष, रक्तज प्लीहामें क्लान्ति, भ्रम, विदाह, विवर्णता, शरीर- जलवायुतत्त्व ( Meteorology ), पृथ्वीतत्त्व, भूगोल, ; का गुरुत्व और उदरकी रक्तवणता होती है । पैसिक उद्भिविद्या, जीवतत्त्व, कृषिविद्या, आयुर्वेद, धातुविदया। प्लीहामें ज्वर. पिपासा, दाह, मोह और दैहिक पीत- ( Mineralogy ), भास्करविदा, चित्रविदया आदि वर्णता दिखाई देती है। श्लेष्मज प्लीहामें अतिशय घेदना, विषयोंमें गभीर आलोचना कर गये हैं। पेरिपुसकी प्लीहा, स्थूलाकार, कठिन और गुरुतर होता तथा इसमें भौगोलिक वर्णनाके साथ इनका बहुत कुछ मिलता रोगीके अरुचि उत्पन्न होती है। घातज प्लीहारोगमें जुलता है। आपका जन्म २३ ई० और मृत्यु ७६ ई०में मर्वदा कोष्ठबद्धता और उदावन रोग तथा प्लीहामें हुआ था। सर्वदा वेदनाका अनुभव होता है। पीहा रोगमें ये सब प्लिहन (स० पु०) प्लेहति वृद्धि गच्छनीति पिष्ट कनिन।' लक्षण होनेसे उसे अमाध्य समझना चाहिये। पोहरोग। प्लीहन् टेखो। ___ ज्वर रोगके अधिक दिन तक शरीरमें रहनेसे, प्लीडर ( अ० पु०) १ वह जो वकालत करता हो, वकील। मलेरिया ज्वर होनेसे अथवा मलेरिया दूषित २ वह जो किसीका पक्ष ले कर वाद विवाद करता हो। स्थानमें वास करनेसे वा मधुरम्निग्धादि आहारजन्य प्लोहन्न ( स० पु० ) पीहानं हन्तीति इन टक। वक्षविशेष. रक्तके बढ़नेसे लोहाकी वृद्धि होती है : अलावा रोहडावृक्ष । संस्कृत पर्याय रोही, रोहितक, प्लीह- : इसके अतिरिक्त भोजनके बाद किसी दू तयानादिमे शत्रु, दाडिमपुष्पक, मांसदलन, यकृवैगे, चलच्छद, गमन वा व्यायामादिमें परिश्रमजनक कार्य करनेसे भी रौहितेय, रोहित, रोहीतक, रौही। प्लोहा स्वस्थानच्युत हो कर बढ़ती है। उदग्के वामपाश्व- प्लीहन् (प्लीहा) (स.पु०) प्लिहन ( श्वनुक्षनपूषनप्लीहनिति। में ऊपरकी और लोहाका स्थान है। अविकृत अवस्था ठण ११५८ ) इति कनिन् प्रत्ययेन साधुः । कुक्षि : में हाथसे उसका पता नहीं लगाया जा सकता ; किन्तु वामपालस्थित मांसखण्ड, पेटकी तिल्ली। संस्कृत : जब वह बढ़ती है, तव कुक्षिके वामपार्श्वमें हाथ द्वारा पर्याय - गुल्म, प्लिहन् । उसका पता लग जाता है। इस रोगमें हमेशा मृदुज्वर प्लीहा शरीरका एक अवयव है। यह हृदयसे अधो-: रहता है और प्रति दिन किसी न किसी समय वह ज्वर देशमें रक्त से उत्पन्न होता है। रक्तवाही सभी शिराओं . चढ़ आता है अथवा एक दिनके बाद कपकपी दे कर का प्लोहा हो मूल है । यह सभोके शरीरमें विद्य-: अधिक ज्वर प्रकाशित होता है। अलावा इसके प्लीहामें मान है। उसके बढ़नेसे रोगमें उसकी गिनती होती वेदना, ऐंठन वा ज्वाला, कोष्ठवद्धता, अल्पमूत्र वा रक्त- है। बदाकशास्त्र में इस पीहरोगके लक्षण और चिकि वर्णमूत्र, श्वास, कास, अग्निमान्य, शरीरको अवसन्नता, त्सादिका विषय इस प्रकार लिखा है-. कृशता, दुलता, पिपासा, वमन, मुग्ववैग्स्य, चक्ष, हस्तां प्लीहरोगका निदान । --विदाही द्रव्य अर्थात् कुलथी, गुलि और ओष्ठ आदि स्थानोंकी रक्तहीनता, अन्धकार- दर्शन और मूर्छा आदि लक्षण होते हैं। कलाय और सरसोंका साग तथा अभिष्यन्दी ( भैसका ___ कष्टसाध्य प्लीहाका लक्षण । प्लीहाके अधिक बढ़ जानेसे दहि आदि.) एव्य सेवन करनेसे रक्त और कफ अत्यन्त जब रोगसाध्य हो जाता है.तानासिका और दन्त दूषित हो जाता है जिससे प्लीहा धीरे धीरे बढ़ने लगती माड़ीसे रक्तस्राव अथवा रक्तवमन, रक्तभेद, उदरामय, है। प्लोहाकी व द्धि होनेसे ही जानना चाहिये, कि! दन्तमूलमें क्षत, दोनों पैर और दोनों चक्षु अथवा सर्वाङ्ग- उसे रोग हो गया है। प्लीहा उदरके वाम पायमें होती । में शोथ तथा पाण्हु और कामला आदि लक्षण दिखाई है। इस रोगमें रोगीका शरीर पाण्डु वर्ण, अवसन्न, देते हैं। ये सब लक्षण होनेसे आरोग्यकी सम्भावना अल्प ज्वर, अग्निमान्ध और बलका ह्रास होता है तथा बहुत थोडी रहती है। प्लीहा अत्यन्त वर्द्धित हो कर श्लैष्मिक और पैतिक उपद्रव भी पहुंच जाते हैं। इसके जब उदरकी वृद्धि होती है, तब उसे प्लीहोदर कहते हैं। चार भेद हैं रक्त, वात, पित्त और श्लेष्मज । यह केवल वामपार्श्वमें बढ़ता जाता है।