पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३७१

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बालिद्वीप ३६५ प्राप्ति होती है। किन्तु यदि इस आत्मोत्सर्गके समय सृष्टितत्त्व। पुरोहित उपस्थित न हों या शास्त्रविहितकर्म द्वारा स्वर्ग- बालियो हिंदलोग सृष्टितत्त्वके विषयमें ब्राह्मण पुराण गमनका पथ परिष्कार न किया गया हो, तो उनको का मत स्वीकार नहीं करते । वे अण्डसे जगत्की उत्पत्ति कभो भी स्वर्गलाभ न होगा। वे मेढ़क और सर्प हो मानते हैं । पहिले सनन्द और सनत्कुमारादि चार जन कर पृथ्वो पर बहुत काल तक विचरण करेंगे। स्वर्ग- ही पैदा हुये थे। बादमें ब्रह्माने क्रमसे स्वर्ग, नद, नदी, पहुंचने पर भी यम उनके पुण्यपापका यथोचित रीतिसे पर्वत और उद्भिज आदि तथा मरीचि, भृगु अङ्गिरा विचार करते हैं। इसी विश्वासके वशीभूत हो वे शव प्रभृति देव, ऋषि गणकी सृष्टि की। का कभी कभी दो माससे २० वर्ष तक दाह नहीं करते। सर्वलोक पितामह ब्रह्मा हो परमेश्वर शिवके स्रष्टा दूसरे लोकपालोंमेंसे किसोकी पूजा नहीं की जाती। हैं। फिर शिव ही ब्रह्माके पितामह माने जाते हैं तथा अनिल और वायुसे सम्पूर्ण जोवोंकी रक्षा होती है, अतएव उनके भव, मर्व आदि नाम भी उल्लिखित हैं। शारी- उनका भी वे यथासाध्य आदर सत्कार करते हैं। रिक उपादान भेद उनके ये हैं --१ आदित्यशरीर, २ अप पदण्ड और वैद्य लोग समय समयमें पवित्र वायु या शरीर, ३ वायुशरीर, ४ अग्निशरीर, ५ आकाश, ६ महा. फुत्कार द्वारा रोगोंकी चिकित्सा करते हैं। अनशन- पण्डित, ७ चन्द्र और ८ अवतारगुरु आदि । यही व्रतमें वायुमानका वे सेवन करते हैं। कारण है, कि वे अष्टतनु नामसे भी प्रसिद्ध हैं । ब्रह्माने ___कार्तिकेय और गणेशजीकी पूजा कहीं भी देख नहीं अपने कल्प और धर्म नामक दो पुत्रोंकी मृष्टिके बाद पड़ती। प्रत्येक प्रवेशद्वार में एक विघ्नविनाशन गण यथाक्रम देव, असुर, पित, मानव, यक्ष, पिशाच, उरग, पतिजोको मूर्ति प्रतिष्ठित हैं या कहीं कहीं उनका चित्र गंधर्व, गण, किन्नर, राक्षस और सबके अन्तमें पशु मात्र ही लगा हुआ है। गणपतिजीके हस्तिमुण्ड होनेके आदिकी सृष्टि की। पीछे उन्होंने ब्राह्मण आदि चार कारण बालिवासियोंकी धारणा है, कि यह पशु मनुष्यके वोंको रचा। अनन्तर म्वायंभवानि मन. शतरूपा. मङ्गलप्रद नहीं है। बोलेलेङ्गराज हाथीकी पीठ पर बैठ बारह यम, लक्ष्मी, नील लोहित ( शिब )से सहा रुद्, कर घूमते हैं । उनको देख सबके सब समझते हैं कि अग्नि और मेघोंकी उत्पत्तिकथा तथा धर्म और अहिंसा, वे या तो राज्यसे भष्ट या पाप पङ्कमें मग्न हो गये हैं। श्री और विष्णु, सरस्वती और पूर्णमासके विवाहादि व्याघ्रसे तो वे महा घृणा करते हैं। यदि राज्यमें प्रसंग लिग्वे हैं। स्वायम्भुव आदि मन्वन्तरमें और भी व्याघ्रका उत्पात हो जाय, तो सब लोग विश्वास करने एकादश रुद, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु, दश विश्वदेव, लग जाते हैं, कि शीघ्र हो राज्यमें उपद्रव होगा या द्वादश भार्गव आदि विद्यमान थे। उसका उपदव होना ही राज्यके अधःपतनका कारण बालिबासी भी पृथ्वीको सात द्वोगा मानते हैं। है। किन्तु गैंडाको देखने पर, चाहे इस जन्ममें हो या उनके ब्रह्माण्ड पुराणमें भो पृथिवीका वर्ष बिभाग तथा पर जम्ममें, वह अवश्य ही सम्मानको प्राप्त करेगा, ऐसी अग्निधादि स्वायंभुव मनुके पौत्रोंकी शासनकथा कही उन लोगोंकी धारणा है। किसी किसी महायशमें घे गई है। कृत, बेता, द्वापर और कलि आदि चार युग गैंडाकी बलि देते हैं। इसका रक्त, मांस, चवीं उन ही वे लोग स्वीकार करते हैं। क्रमः क्रमसे मनुष्यकी लोगोंके वावहारमें आती है। बहुतसे मनुष्य काम संख्या घटती है। यह भो वे लोग मानते हैं। देवकी भी पूजा करते हैं। इनके प्राचीन कायोंमें वासुकी, ___ शास्त्रोंमें ब्राह्मणसम्तानके आचरणीय अनुष्ठानादिका अनंत, तक्षक नागकी कथा, जनमेजयका सर्प यज्ञ, भग विषय इस तरह लिपिवद्ध है,---१ वाल अवस्थामें ब्रह्म- वान् वशिष्ठका राक्षस-यज्ञ और किन्नर, किंपुरुष, उरग, चयं पूर्वक गुरुके घर पर विद्याध्ययन, र विद्यावंधनमें दैत्य, दानव, गंधर्व, पिशाच आदि पुराणोल्लिखित आवद्ध हो गृहस्थ धर्मका प्रतिपालन, ३ वैखानस (वान- कथाएं पायी जाती हैं। प्रस्थ ) अवलम्बन, ४ अन्तवें छह शव ओंको जीत कर Vol. xv. 92