पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३७३

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चानिद्वीप क्षत्रिय ब्रह्मबंधको धारण नहीं कर सकते । युद्धयात्राके है। कुछ लोग बांसकी फट्टियोका रट्टर बना उस पर शयक नमय पदंडके आदेशसे क्षत्रिय, वैश्य और शूद सभी सुला देते और ऊपरसे एक अच्छा कपड़ा ढक देते हैं। ब्रह्मबध डाल सकते हैं । उस समय यही उनका सम्पात् फिर गान करते करते ये शबदेहको साधि स्थान पर वा कवन स्वरूप हो जाता है। देवता शौर पितरों को ले जाते और टट्टर समेत शवको गाड़ देते हैं। सामर्थ्य- नृप्ति के लिये ये लोग पशु बलि देते हैं। उस समय उनको के अनुसार उसी समय कनके भीतर मृतकको भविष्यमें एक महाभोज देना पड़ता है। दुर्गा, काल, भूतोंका उल्लेख . खानेके लिये कुछ रुपये रखने पड़ते हैं। पश्चात् उस कनके पहिले हो किया जा चुका है। राजाकी विजयमें, अभि- ऊपर एक बांसके दण्डसे तख्ता तैयार कर भूतोंकी तृप्तिके षेकमें, मातारोग फैलनेके समय, भयकाल ओर पंचबलि लिये उस पर खानेकी चीजें रखते हैं। ऐसी क्रियाहीन क्रम नामको पूजाके समय महाभोजको आयोजनाको अवस्थासे जो मरते हैं उसे कभी भी स्वर्गकी प्राप्ति नहीं जाती है। राजा या राजपुरुष इस उत्सवका अनुष्ठान , होतो। इनका कहना है, कि वालिद्वीपमें जितने वर्षों के करते हैं। 'ओङ्ग शब्द ही त्रिशक्तिका वीज है । भारत- कुत्ते दिखाई इने व पूर्व जन्ममें शूद्रको छोड़ और कोई वर्षौ जिस प्रकार आ उ म (ओम् ) त्रिशक्तिका आधार भी नहीं था। इनमें यह विधि है, कि यदि एक घंशमें दो कल्पित हुआ है, उसी प्रकार बालिद्रोप-वासियोंने उस | तीन पीढ़ी के बाद काई धनवान पैदा हो, तो वह कमेंसे वर्णसङ्घको अङ्ग उङ्ग और मङ्ग अर्थात् सदाशिव, परम अपने पूर्वजोंकी अस्थि निकलवा कर उसकी अंत्येष्टि शिव, महाशिव वा ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरका त्रित्व किया कर सकता है । अतएव बहुत पुरुषोंके आत्मीय प्रतिपन्न किया है। ब्रहाा और ब्रह्माके साहचर्यसे शिव- स्वजनोंकी अस्थिका समाधिसे निकलवा कर धनवान् का महत्व वा महाशक्ति उत्पन्न हुई है। पुरुष उनका अपने अपने वकसमें रखते और उनकी मुक्ति ____ यद्यपि अन्त्येष्टि क्रिया सामाजिक आचारके अन्दर कामनासे अन्त्येष्टि क्रिया करते हैं। महामारी या सका. गिनो जाती है तो भी उनके यहां धर्मसंगत क्रिया कलाप मक रागसे मरने पर राजा और प्रजा एक ही साथ गार्ड का बाहुल्य देखा जाता है। यहां तक, कि वे उसीको जाने हैं। उस समय किमीको पृथ्वी पर रग्ब कर जलामे- एक धर्मका प्रधान अंग मानते हैं। इन लोगों का का नियम नहीं है । क्योंकि, उसमें जानना होगा, कि विश्वास है, कि देहके जलाने मात्रसे हो उसको स्वर्ग कुग्रहोंका प्राव निश्चय हो बढ़ गया है। अन्त्येष्टि आदि नहीं मिलता । स्वर्गलोकसे विष्णु और वहांसे शिवलोक किसी कार्यके द्वारा देवकोप-प्रशमन वा उससे प्रेतात्मा- में सायुज्य मुक्ति पानेके लिये तथा स्वर्गगमन पथ परि को मुक्ति नहीं हो सकती। इस समय गलुगुन उत्सव कार करनेके लिये वे माना तरहके क्रियानुष्ठान करते हैं। भो नहीं हो सकता। ये आत्माको देहान्तर प्राप्ति स्वीकार करते हैं। यह पहले ही कहा जा चुका है, कि ये लोग शषका इन लोगों का विश्वास-दाहके पूर्व और बाद मृतककी। दाह या दफन न करके उससे बहुत काल तक अपने घर स्वर्गकामनाके लिये जो उपहार दिया जाता है उससे वह होमें रखते हैं । शूरको घरमें मृत देह रखनेसे मासाधिक प्रेतात्मा निर्विकार हो पितृरूपसे देवलोकमें अवस्थान अशौच, ब्राह्मणका आठ दिन और क्षत्रिय तथा वैश्यको कर सकती हैं। उनके पुत्र और बंधुबांधव पितृ पुरुषोंको भी करीब करीब उतने ही दिन अशीच होता है । मृत्युके अवस्थान्तर या भिन्न योनि प्राप्त न हो, इस आशासे दिन वा एक मास या एक सप्ताहमें मृतककी अंत्येष्टि ऐसी पूजा और उपहारादि देने के लिये बाध्य होते हैं । क्रिया करनी ही होगी, ऐसा कोई नियम नहीं है। मृतकी मोक्ष कामनासे शास्त्र विहित दाह करनेमें अवश्य ! अत्येष्टि किया प.रमेके पहिले कुछ उपक्रिया करनी ही प्रचुर धनको जरूरत है। इस कारण बहुतसे निर्धान पड़ती हैं । मृत्युक बाद शवदेहको स्नान करा स्वजन लोग ऐसा क्रियानुष्ठान महीं कर सकते । असमर्थोके । बंधु लोग चंदन, कस्तूरी, इलायची आदि सुगंधि लेपनके लिये शव देहका दाहम करने पर उसे गाड़ देनेका नियम द्वारा शव शरीरको रक्षा करते हैं। रामाको मृत्यु होने