पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३७५

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गालिद्वीप सांप तैयार करते हैं जिसे थे लोग नागवन्ध कहते। गोष्ठीके ) राजाओंमें सहमरण प्रथा प्रचलित है। दीमे है। पंडित इस कृत्रिम सांपको मार कर मृत देहके सहमरण नहीं है। क्योंकि, ये स्वभाषसे ही दरिद है। साथ जला देते हैं। निर्धन अवस्थामें ऐसी ठाटबाटके साथ अंत्येष्टि क्रिया शषके दाहस्थानमें पहुंचने पर पहले उसे अरथी पर- और बेला उत्सवका बारना उनके लिये नितान्त असंभव से नीचे उतारते हैं। बादमें कपडा एक कर उसे सिंह है। इनको निम्नश्रेणीका समझ पुरोहित इनके ऊपर या गोमूर्ति के बक्समें रख देते हैं। इस समय उप-। धर्मप्रभावका विस्तार करना नहीं चाहते तथा ये लोग स्थित लोग उसके वस्त्रोंको लूट लेते हैं और कुछ घरको भी पुरोहितों को काफी दक्षिणा नहीं देते हैं। यहां पर लौटा ले जाते हैं। पीछे उपस्थित पण्डित एक घंटा कुछ | ब्राह्मणों में भी कभी कभी सहमरण देखा जाता है, स्वामीके मंत्र पढ़ कर और शवका पवित्र देहसे सिंचन कर चले वियोगसे दु:खित ब्राह्मणरमणी स्वामीके विच्छेदको नहीं जाते हैं। पुरोहितका कार्य जब पूर्ण हो जाता है तब सहनेके कारण स्वामीके साथ चितामें प्राण ताग कर यालिदल बक्सके नीचे चिता बना उसमें आग लगा देते देती हैं वे ही यथार्थमें मतीकी योग्य हैं; किन्तु यश चाहने हैं। देहके जल जाने पर उपस्थित आत्मीय लोग वालो ललनाओंमें भी कोई कोई पतिभक्तिको वशवर्तिनी अस्थियोंको निकाल उनको अच्छी तरह उपकरणोंसे बन सती नामके सार्थक गनती हैं । यदि ब्राह्मण रमणी सजा समुद्र में फेक देते हैं। इस समय पदण्डों को सहमृता नहीं भी हो तो कोई दोष नहीं गिना जाता। मलपाठ करना पड़ता है। इन कार्योंके लिये उनको | लेकिन क्षत्रियरमणी और वैश्यस्त्रियों में यदि कोई स्त्री ५०० रु० और तरह तरहके वस्त्र, पकवान मिलते अनुमृता न हो तो बड़ी निदा होती है। हैं। इस प्रधान अन्त्येष्टि क्रियाके बाद एक वर्ष तक यहाँकी स्त्रियों का सहमरण दो प्रकारसे होता है। प्रत्येक पक्षमें इसी तरह समारोहसे दाह स्थानमें जाना जो स्वामीको चिता पर मंचके ऊपरसे कूद कर आत्मा. पड़ता है। इस प्रकार कई बार शत्रके बदलेमें अरथोके विसर्जन करती हैं ये स्त्री 'सतियां हैं। विवाहिता या ऊपर पुष्पस्तूप सजा कर श्मशान ले जाते और उसे क्षण रक्षिता स्त्री अपनी इच्छाके अनुसार अग्निकुण्डमें कूवती भंगुरकी तरह प्रति बार समुद्र में फेंक देते हैं। इस प्रकार | हैं। दूसरे पक्षमें स्त्रियों को स्वामीसे भिन्न वितामें अग्नि एक वर्षके भीतर मृत आत्माके लिये बहुत उपहार दिया जला कर जीवन तपागमा पड़ता है। कभी कभी पटराणी- जाता है, जो मासिक श्राद्धके समान होता है। दाहकर्मके को बेला प्रथाके अनुसार प्राण विसर्जन करते देखा गया एक वर्ष बाद जब वार्षिक श्राद्ध हो जाता है तब वे। है। पहले इस प्रकार सहमरणके लिये क्रोत दासियोंको मृतात्याका स्वर्गलाभ मानते है। जबर्दस्ती भग्निमें झोंक दिया जाता था। राजा सहधर्मिणी- यहां भी सहमरणप्रथा प्रचलित थी। बहु विवाह को छोड़ जो त्रियां रखते हैं वे शूवाणी होने पर भी प्रचलित रहनेके कारण एकसे अधिक स्त्रीग्रहण करते खरीदी जातो हैं । सती या बेला होना इनकी इच्छाके ऊपर थे। राजा नफ़र शक्तिका ५ सौ रमणिका पाणिग्रहण निर्भर है, किन्तु क्रोतदासीकी हत्या अवैध नरवलिमाल उसका अन्यतम दृष्टान्त है। एक स्वामीको मृत्यु होने है। जिस समय पे सहमरणकी इच्छा प्रकट करती हैं, पर उसके पीछे बहुत खियोंको अग्निज्वालामें देहत्याग तभीसे लोग उनका पितृ लोगोंकी तरह सम्मान करते करना पड़ता था। महाभारतादि पवित्र शास्त्रप्रन्थ हैं। उसी समय मनुष्य उनको प्रोतिके लिये तरह वर्णित सतोके चरितसे यहांको त्रियां इतनी उसे जित | तरहके बढ़िया भोजन उसके सामने ला कर रख देते हैं। होती है, कि वे सुयशलाभकी प्रत्याशासे सहजमें स्वामोके रमणियों के अन्तःकरणमें धर्मभाव उद्दीपित करनेके पोछे मरनेको तैयार हो जाती हैं। एक पतिके पीछे लिये और स्वर्गधामकी चिरशान्ति सुखकी कथाओं को गत नियोंका भात्मोसर्ग सचमुच विस्मयकर है। समझानेके लिये एक विदुषी पंण्डित स्त्री सदा उसके पालिचीपमै एकमाल क्षनिय तथा वैश्य (देव और साथ घूमती रहती है। कभी कभी उसको धोखा Vol xV,93