पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३७७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३७१ लियाघाटा-पाली प्रायः१५२७८ है। कहते हैं, कि रामायण-रचयिताके आदि | वालिश (सं० क्ली०) बालाः सन्ति यस्य इति बाली मस्तक- कवि वाल्मीकि मुनिके नाम पर इस स्थानका नामकरण स्तन शेते यत्र आधारे । १ उपाधान, तकिया। हुभा है, पर उसका कोई इतिहास नहीं मिलता। प्राचीन | २ शिशु, बालक । ३ मूर्ख, अबोध व्यक्ति। (वि०) ४ मगरका परित्याग कर १८७३-७५ ई०में नया शहर अवोध, अहान । बसाया गया। यहां प्रतिवर्ष कार्तिकी पूर्णिमामें गङ्गा- बालिश ! फा० स्त्री० ) तकिया। सङ्गम पर दद्रि नामका एक मेला लगता है। इस मेलेमें | बालिश्त (फा० पु.) एक प्रकारको माप। यह प्रायः ४ लाखसे अधिक मनुष्य जमा होते हैं। मेलेमें मवेशी बारह अंगुलसे कुछ ऊपर और लगभग आध फुटके होती अधिक संख्या में बिकने आते हैं। इष्ट इण्डिया रेलवेके | है, बीता। बुमरांव स्टेशनमें उतर कर यहां आना पड़ता है। इस बालिश्य (सं० पु०) मूर्खता, अज्ञानता, नासमझी। शहरमें सरकारी दफ्तर, अस्पताल और बहुतसे स्कूल वालिस-टेन (अं० स्त्री० ) वह रेलगाड़ी जिस पर सड़क बनानेके सामान लाद कर भेजे जाते हैं। बालियाघाटा--१बङ्गालकी राजधानी कलकत्ता महानगरीसे बालिसना--बड़ौदा राज्यके खाड़ी बिभागन्तर्गत एक पूर्व उपकण्ठवत्ती एक प्रसिद्ध प्राम। यह अक्षा० २०० नगर। ३३ ४५“उ० तथा देशा०८८ २७ पू०के मध्य अवस्थित बालिहन्ता (सं० पु०) बालेबोलिनो वा बानरा राजस्य है। यहां बाबरगजके चावल और सुन्दरबनके काष्ठको हन्ता । १ रामचन्द्र। यानि देखो । २ उदेशके अन्तर्गत माढत है। पूर्वबंगीय रेलपथको दक्षिण शाखाके विस्तृत प्रामविशेष । तथा बालियाघाटा खालके रहनेसे बाणिज्यकी विशेष बालिही-मध्यप्रदेशके जब्बलपुर जिलान्तर्गत एक अति सुविधा हो गई है। अलावा इसके यहां चूनेका कारबार प्राचीन नगर । यह अक्षा० २३ ४७ 8',” उ० तथा होता है। देशा० ८०१६ पू०के मध्य अवस्थित है। पहले इस २ कलकत्सेके श्यामबाजारसे जो नई खाल काटी गई स्थानका नाम 'बाबासत्' वा पापावत था। यहां बालि. है, उसीको बेलेघाटा या बालियाघाटा खाल कहते हैं। राजके परास्त होनेसे इसका बालिहरी नाम पड़ा। पहले यह कलकत्तके दक्षिण बादाभूमि पार कर लवणहद में मिलती यह नगरी प्रायः १२कोस विस्तृत थी और यहां सैकड़ों है। आज भी इस खालसे ढाका, यशोर आदि स्थानों में । देवालय शोभा दे रहे थे। उस समय झुके झुच जैनतीर्थ- ना जाती आती हैं। यात्री आया करते थे। १७८१ ई०में यह स्थान मराठोंके बालियातोटक-मल्लभूमिके अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम । हाथ लगा। १७९६ ई०में यह नागपुरराजके हाथ सौंपा यह देवीवासुलीसे ४ कोस उत्तरमें अवस्थित है। यहां गया। १८१७ ई०में भोंसलेने यह स्थान वृटिश गव- राजा गोपालसिंहके मन्त्री राजिवका वासभवन विद्य- में एटको दे दिया। सिपाहीविद्रोहके समय रघुनाथ- मान है। सिंह बुन्देला यहां के दुर्ग पर अधिकार कर बैठे, पर अङ्ग- पालियासाहेबगंज-भागलपुर जिलान्तर्गत एक प्रसिद्ध रेजोंने शीघ्र ही उसे मार भगाया और दुर्गको पुनः अपने ग्राम । कब्जे में कर लिया। वर्तमान नगरके चारों ओर थाम्र. पालिरहन-मन्द्राज प्रदेशके कोयम्बतुर जिलेको एक गिरि वन और नतोन्तत गिरिराजिवेष्टित, नयनमनोहर सुबहत माला। यह महिसुरसे हुस्सनूर-सङ्कट तक विस्तृत है । इस सरोवर, सुनिर्मित तड़ाग और प्राचीन जैन तथा हिन्द- पर्वतकी एक शाखा जो उत्तर दक्षिणको चली गई है उसके कीर्तिका ध्वंसावशेष नाना स्थानों में नजर आता है। पूर्वाशका सर्वोष शृङ्ग ५३०० फुट ऊँचा है। इसका बाली ( हिं० स्त्री० ) १ कानमें पहननेका एक प्रसिद्ध आभू. उपत्यकादेश बनसमाच्छन्न और हस्तिसङ्कल है। गुण्डल षण। यह सोने या चाँदीके पतले तारका गोलाकार और होन्नुलोले नदो इस पर्वतसे निकली है। बना होता है। इसमें शोभाके लिये मोती आदि भी