पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३७९

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विष। मालक-पालेघर ३७३ बालू पाये जाते हैं जिनसे सुन्दर सुन्दर चिज बनते हैं। (लो०) १० वितुम्बक नामक वृक्षकी छाल । २दक्षिण भारत और लंकाके जलाशयोंमें मिलनेवाली बालेयशाक (स.पु. ) भागों, वरंगी। एक प्रकारकी मछली। बालेष्ट ( स० पु० ) १ बदर, बेर। (नि.) २ बालकके बालूक (सं० पु०) बलते प्राणान् हन्ति या, बल-बधे अभिलषित। ऊक । विषभेद, एक प्रकारका विष । बालेश्वर-१ उड़ीसाविभागके अन्तर्गत एक जिला । पालघर ( हिं० पु०) बङ्गालके बालूचर नामक स्थानका यह अक्षा० २००४ मे २१५७ उ० तथा देशा० ८६ गांजा जो बहुत अच्छा समझा जाता है। अब यह गांजा २६ से ८७°३१ पू०के मध्य अवस्थित है। भूपरिमाण और स्थानों में भी होने लगा है। २०८५ वर्गमील है। इसके उत्तर में मेदिनीपुर और मयूर बालूचरा (हिं० पु०) वह भूमि जिस पर बहुत उथला या भञ्जराज्य, पूर्वमें बङ्गोपसागर, दक्षिणमें वैतरणी नदी छिछला पानी भरा हो, चर। और पश्चिममें केउझर, नोलगिरि और मयूरभञ्जका बालूदानी (हिं० स्त्री० : एक प्रकारको झझरीदार डिबिया | सामन्तराज्य है। सम्भवतः बालेश्वर शिवलिङ्गाके नाम जिसमें लोग बालू रखते हैं। इस बालूसे स्याही सुखाई से इसका नामकरण हुआ है। जाती है। साधारणतः बही खाता लिखनेवाले लोग, णत: बही खाता लिखनेवाले लोग इस जिलेका पूर्वाश जिस प्रकार बालकामय पलि जो सोक्त का व्यवहार नहीं करते, इसी बालदानीसे समावृत है, पश्चिमांश भी उसी प्रकार पर्वत और वन- तुरन्सके लिखे हए लेखों पर बाल छिड़कते हैं और समाकीर्ण है। इस अंशमें विस्तृत शालवन देखा फिर उस बालको उसी डिबियाकी भांझरी पर उलट कर जाता है। समुद्रशेपकूलवत्तीं स्थान लवणमय है। यहां उसे डिबियामें भर लेते हैं। प्राचीनकालमें इसी प्रकार एक प्रकारका देशीय लवण तैयार होता है। बीच बीच- लेखोंकी स्याही सुखाई जाती थी। में धानको खेती तो होतो है, पर सारे जिलेमें कहीं भी बालबुर्द ( हिं० वि० ) १ बाल द्वारा नष्ट किया हुआ। विस्तृत धान्यक्षेत्र नयनगोचर नहीं होता। पर्वतभागसे (पु.) २ वह भूमि जिसकी उर्वरा शक्ति बाल पड़नेके ! अनेक छोटी छोटी नदियां निकल कर वनकी शोभा बढ़ाती कारण नष्ट हो गई हो। है। अलावा इसके सुवर्णरेखा, पांचपाड़ा, बुद्धवलङ्ग, बालूसाही ( हिं० स्त्री०) एक प्रकारको मिठाई। इसकी' कांसबांस और वैतरणी नदी तथा जमीरा, बांस, भैरंगी, प्रस्तुत प्रणाली--पहले मैदेकी छोटो टिकिया बना लेते , धामड़ा, शालनदी और मताई शाखा ही प्रधान है। उक्त हैं। पीछे उनको धोमें तल कर दो तारके शीरेमें डुबा नदियों में भी वाणिज्यको उपयोगी नहीं है। समय समय कर निकाल लेते हैं। यह खानेमें बालू-सी खसखसो बाढ़ और अनावृष्टिसे यहांके शस्यादिकी विशेष क्षति होती है। हुआ करती है। बालेन्दु (स• पु०) नवोदित चन्द्र । इस जिलेमें समुद्र के किनारे सुवर्ण रेखा, मोराटा, पालेय (सं० पु.) बलये उपकरणाय साधुः। बलि- छानुआ, वाणेश्वर, लैछनपुर, चूड़ामन और धामड़ा आदि (विरुपधिवलेर्दम् । पा ५॥११३) इति ढम् । २ रासभ, कई एक बन्दर हैं। सुवर्ण रेखा नदोके मुहाने पर जो गदहा। २ दैत्यविशेष। ३जनमेजय-वंशोन्जय सुतपा पुर्तगीजोंकी पिप्पली-कोठी थी, उसे तहसनहस करके राजाने एक प्रपौत्रका नाम। इनके पिताका नाम बलि १६३४ ई०में अंगरेज बणिकोंने इसी सुवर्णरेखामें मा कर था। (हरिवंश ३०३०-३३) ४ अङ्गारवल्लरी । ५ चाणक्य- कोठी खोली थी। नदीके मुख पर चर पर जानेसे सूतक। ६ तण्डुल, मवल। (त्रि०) बालाय हितः; सुवर्णरेखाकी वाणिज्योन्नति जब घट गई, तब १८०६ साल-दम् । मुटु, कोमल। ८ बालहित, जो बालकों- ईमें चूड़ामन वाणिज्यकेन्द्र बनाया गया। समुद्रक के लिये लाभदायक हो। ६ जो बलि देनेके योग्य हो, किनारे हो कर नहर काटी जानेसे नदियोंका मुंह बंद हो रलिज्ञान करने लायक। | गया जिससे मुहाने परके बन्दरों में स्थानीय बाणिज्यकी Vol. xv_94