पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३८७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


बाहुकुन्थ-बाहुदा ३२ बाहुकुन्थ (सं०३०) बाहुरिव कुन्धति आचरतीति बाहु एक दिन महर्षि लिखित बड़े भाई शङ्कके आश्रम में गये। कुन्थ पचायच् । पक्ष, पंख । तपोधन शङ्ख उस समय आश्रममें नहीं थे। बड़े भाईको 'बाहुकुलेयक ( स० त्रि.) बहुकुले जातः ( अपूर्वपदादन्य आश्रममें न देख लिखित वृक्षसे सभी सुपक्क फल तोड़ कर तरस्यां यत् ढको। पा ४।१।१४० ) इति ढकन् । बहु खाने लगे। इसी समय शङ्क भी पहुंचे और छोटे भाईको कुलजात। फल स्वाते देख बोले,' तुम्हें ये सब फल कहां मिले ?' काहुलद (सं० वि०) बाहु द्वारा खण्डकारी। 'आपके इस सामनेवाले वृक्षसे। लिखितने जवाब दिया। बाहुगुण्य ( स० क्लो०) १ बहुगुणशालिता । २ बाहुल्य । इस पर शंख बहुत बिगड़े और लिखितसे बोले, 'तूने मेरो बाहुच्युत् (सं० वि०) बाहुता। अनुपस्थितिमें फल तोड़ कर चोरका काम किया है। बाहुच्युत (सं० वि०) बाहु द्वारा प्रच्युत । इसलिये राजाके निकट आत्मदोष बतला कर समुचित बाहुज (स० पु. ) ब्रह्मणो बाहुभ्यां जायते यः, बाहु-जन दण्डका भोग करो। लिखित बड़े भाईके आदेशानुसार ड। क्षत्रिय, जिनकी उत्पत्ति ब्रह्माके हाथसे मानी उसी समय सुदम्न राजाके निकट चल दिये। वहां जा जाती है। कर उन्होंने राजासे कहा, 'महाराज ! मैंने अपने बड़े "ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् बाहराजन्यः स्मृतः । भाईकी अनुपस्थितिमें उनके वृक्षसे फल तोड़ पर खाया ऊरस्तदस्य यद्व भ्यः पद्भ्यां शूद्रोऽभ्यजायत ।" (श्रुति) है, सो मैंने एक चोरका काम किया । अतः आप मुझे इस. २ कीर, सुग्गा। ३ स्वयं जाततिल, वह तिल जो का उपयुक्त दण्ड दीजिए।' सुदनने कहा, “राजा जिस आपे आप उगा हो। ४ बाहुजात, वह जो दाहसे उत्पन्न | प्रकार अपराधीको दण्ड देते हैं, उसी प्रकार उसका दोष हुआ हो। भी माफ कर सकते हैं। आप व्रतपरायण और सच- बाहुजन्य ( स० वि०) वाहुज, बांहसे उत्पन्न । रित्र हैं, अतएव मैंने आपका दोप माफ कर दिया।" बाहुजूत (सं० लि०) बाहु द्वारा शत्रुप्रेरक । सुदनके इस वचन पर लिखित सन्तुष्ट न हुए, बार बाहुज्या (सं० स्त्री०) मुजज्या ( ord of an are, Sinct बार दण्डके लिये प्रार्थना करने लगे। इस पर सुदम्नने बाहुता (स अध्य०) बाहुमूलमें। लिखितको दोनों वाहुको छेद कर समुचित दण्डप्रदान बाहुनाण (सं० क्ली० ) बै-भावे-ल्युट्, बाह्नोस्त्राणं यस्मात् । किया। लिखित इस प्रकार दण्डित हो बड़े भाई शङ्क- अस्त्राघात निवारणार्थ लोहादि, चमड़े या लोहे आदि के समीप गये और उनसे बोले, 'राजाने मुझे यही दण्ड का वह दस्ताना जो युद्धमें हाथोंको रक्षाके लिये पहना दिया है, अब आप मुझे क्षमा करें।' शने कहा, 'मैं जाता है। इसका पर्याय बाहुल है। तुम पर कुद्ध नहीं हूं, धर्मका अतिक्रम करते देख मैंने बाहुदन्तक (सं० पु.) बहवश्चत्वारो दन्ताऽस्य कप, तुम्हें पापका प्रायश्चित्त कराया : अभी तुम इस नदीमें ऐरावत: उपचारात् इन्द्रः, तेन प्रोक्तमण । पुरन्दरप्रोक्त ! स्नान कर देवता और पितरोंका तर्पण करो।' लिखित- पश्चसहस्रात्मक नीतिशास्त्रभेद। ने उनके आदेशानुसार नदीमें स्नान किया और तर्पण बाहुदन्तिन् (संपु०) बहवो दन्ता यस्य, स बहुदान करनेके लिये वे ज्यो' ही आगे बढ़े त्यों ही उनके दोनों ऐरावतः स एव बाहदन्तः, स्वार्थे अण, बाहुदन्तोऽस्या- हाथ फिर निकल आये। इस नदीमें स्नान कर शके स्तीति पनि । इन्द्र। तपाप्रभावसे लिखितके हाथ फिर निकल आये थे इसी, पाहुदन्तेय (स.पु०) बहुदन्तश्चतुहन्त ऐरावतस्तम इति कारण इसका बाहुदा नाम पड़ा। ततो । इन्द्र ____ अनन्तर लिखितने आश्चर्यान्वित हो बड़े भाईसे बाहुदा (सं० स्त्री०) एक नदी । महाभारतमें इसकी नाम- जा कर कहा, 'आपके तपःप्रभावसे मैंने पुनः हाथ पा नितिके विषयमें यों लिखा है,-बाहुदा नदीके पास लिये, परन्तु राजाके समीप न भेज कर आपने स्वयं ही शङ्क और लिखित नामके दो भाई अलग अलग रहते थे। मुझे पवित्र क्यों नहीं किया ? इस पर शडने कहा, 'तुमने Vol. xv. 96