पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४०

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प्लोहन (प्लीहा) प्लीहामें हर ममय आम्बेलाई आवद्ध रहती है और इसीसे इस समय प्लीहा वृहदाकार और वजनमें प्रायः साह उसके चारों तरफ हिमरेजिक इनफार्क दिखाई देती है। पौंड तक भारी होती है। कभी कभी अप्रपाश्व में छुनेसे खात इनफार्क की आकृति कील-मी होती और उसका मध्य सा मालूम होता है। प्लीहा प्रदेश लौष्द्राकार और बोच स्थान कृष्णवर्ण और पार्श्व देशमें रक्ताधिका रहता है। बोचमें निकटवत्ती पैशिक विधानके साथ संयुक्त है। आम्बेलाईके विषाक्त होनेसे प्रदाह उत्पन्न होता है। कभी रक्त तरल और श्वेतरक्तकणिकायुक्त तथा रक्तमें जलका वह आम्बेलाई चूर्णापकृष्टतामें परिणत होती है। इस भाग बढ़ता है। प्रकार शोपित वा अपकृष्टतामें परिणत नहीं होनेसे उसकी ___रोगी धोरे धीरे शीर्ण हो जाता है। मुखमण्डल, उत्तेजनासे स्फोटक उत्पन्न हुआ करता है। निकटवत्तों ओष्ट और कम्झनटाइभा रक्तशून्य ; चर्म शुष्क और उत्तप्त, पेरिटोनियममें प्रदाहका लक्षण दिखाई देता है। मले. नाड़ी द्रत और दुर्बल ; मूत्र स्वल्प और लोहिताभ, क्षुधा- रिया और शैत्यजनित प्रदाहमें प्लीहा वृहत् और कृष्ण मान्य, कोष्ठवद्ध, प्लीहास्थानमें भार और वेदनादिलक्षण वर्ण तथा स्पर्शमें कोमल मालूम होती है। रक्ताधिकासे उपस्थित होते हैं । पीड़ाके तरुण होनेसे ज्वरका विराम प्रदाहको पृथक करना बहुत मुश्किल है । स्फोटक रहनेसे नहीं देखा जाता। रोग कठिन होनेसे रोगीका वर्ण प्रदाह हुआ है, ऐसा मालूम होता है। मृत्तिकावत् नासिका और दन्तमाड़ीसे रक्तस्राव, चमड़े के __अम्बलाई द्वारा स्थानिक प्रदाह उपस्थित होनेसे नीचे सूक्ष्मरक्त चिह्नविगलित मुखोप ( Canerum Oris) सामान्य घेदनाका अनुभव होता है। स्फोटक होनेसे अक्षिपल्लव और पदकी स्फीतता तथा समय समय पर अत्यन्त वेदना, शीन, कम्पज्वर, वमन और दुर्बलता तथा सार्वाङ्गिक शोथ दृष्टिगोचर होता है। विवर्द्धित प्लीहा- स्फाटकके अभ्यन्तरमें विदीर्ण होनेसे मूछो और हिमाङ्ग में चाप द्वारा श्वास, कृच्छ, काशि, फुसफुसका रक्ता- आदि लक्षण उत्पन्न देखे जाते हैं। स्फोटक बाहरकी धिक्य और वमन उपस्थित हो सकता है। ओर भी प्रकाशित हो सकता है ; किन्तु उस समय उसमें प्लोहाके घृहत् होनेसे उदरके वामपार्श्वस्य दक्षिण फुकच्चेसन मालूम होता है। ' दिसे ले कर नाभि तकका स्थान ऊँचा दिखाई देता ___ म्फोटक होने से पहले पम्पिरेटर द्वारा पीप निकाल देता है; छूनेसे एक अप्रधार पतला और खातयुक्त अवुद- ले। कुनाइन, सुरा और वलकारक आहार खानेको दे। सा वांध होता है। कभी कभो उसमें लकचुयेसन स्फोटकमें रोगका भावी फल अशभ जानना चाहिये, भी पाया जाता है । प्रातिघातिक शब्द मलगर्भ ( Duil), ऐसी अवस्थामें रोगका आरोग्य होना बहुत कठिन है। उसके नाचे नाभि तथा ऊपर ५म पशु का पर्यन्त फैल ___ लीडाकी विवृद्धि (IlyTrertrophy of the spleen)| सकता है। पाश्व परिवर्तनमें प्लीहा अपने स्थानसे कुछ लहिक कोपसमूह रक्तस्रोत द्वारा अपमारित न हो कर हर जाता और दीर्घ श्वासमें नीचेको ओर चला जाता यदि प्लीहामें अवरुद्ध रहे, तो प्लीहाको वृद्धि होती है। है। प्लीहास्थानमें कभी कभी एक ममरध्वनि सुनाई इस पोड़ामें विविध स्थान और यन्त्रका लिम्फाटिक सिष्टम देती है जिसे स्प्लीनिक मर्मर' ( Splecuic murmur ) बढ़ता जाता है तथा इससे श्वेतरक्तकणिका द्विगुण परि-। कहते हैं। माणमें उत्पन्न होती है । वे नियमितरूपसे लोहितकणिका- नासिका और दन्तमाड़ोसे रक्तस्राध, पाण्डु रोग, में परिवर्तित नहीं हो सकती। इनके द्वारा रक्ताल्पताके । उदरामय, आमाशय, शोथ और कैनक्रमोरिस आदि सभी लक्षण उपस्थित होते हैं। ! इसके उपसर्ग हैं। रोग आराम नहीं होनेसे दुर्बलता, लोहामें वहुकालव्यापी वा बार बार रक्ताधिका शोथ, आमाशय, रक्तस्राव और कभी कभी अचैतन्य हो (Congestion ) मलेरिया पूर्ण स्थानमें वास, पुनः पुनः कर मृत्यु हो जाती है। सविराम ज्वर और यकृद्धमनीक रक्तस्रोतमें रक्ताधिका निम्नलिखित कुछ पोड़ाके साथ इसका भ्रम हो ही प्लीहा-विवृद्धिका प्रधानतम कारण है। - सकता है;-पाकाशयके कार्डियेक छिद्रमें कर्कटरोग,