पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४०७

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विल्बवन- पिल्लव इसके अनन्तर उन्होंने उस रमणोले दो सूई ले पण्ड, पतिर ; गोंड-मइका, महका ; मलयालम् - कुव- कर अपनो आखें फोड़ डालीं और वे कृष्ण लप्पजम् ; कनाड़ी -विलपत्री वा बेलपत्री : ब्राय . प्रेमके अनुरागमें अन्धेकी तरह धीरे धीरे वृन्दावनकी भोक्षित्, उधिन्वन्; सिंगापुर बेल्ली। भारतमें प्रायः भोर चल दिये । राधाकृष्णके प्रेममें मतवाले वन उन्होंने मर्वत्र ही यह वृक्ष होता है। हिमालय पर्वतके वन- जिस अमृतगीतसे त्रिभुवनको पुलकित कर दिया था, वही विभाग, भौर दक्षिण भारत नशा ब्राह्मदेशमें बेलके पेड़ गीत श्रीकृष्णकर्णामृत नामसे प्रसिद्ध है। प्रवाद है, कि स्वभावतः उत्पन्न होते हैं। गोपवेशमें श्रीकृष्ण उमको खिलाते थे। एक दिन उन्होंने इस वृक्षकी छाल अलग कर लेनेग्मे उसमेंसे एक प्रकार गोपबालकवेशी श्रीकृष्णके हाथको जोरमे दवा लिया।' का गोंद-सा निकलता है। फलके अन्दर श्रेणीवन बीज लकने, हाथमें व्यथा होती है ऐमा कह कर अपना हाथ होते हैं। प्रत्येक येलमें बोओंके रहने के लिए. १० मेले कर उनसे छुड़ा लिया। इस पर चिल्वमङ्गलने कहा था नक गहर होते हैं। इनकोषों में वोज गोदके साथ लिपटे "हस्तमुत्तिभ्य याताऽमि बलात्कृगा किमतम। हा तिने हैं। यह गॉन पाम्बाद होन और ख्याति जोडनेक हृदयाद् यदि निर्गिस पौरुपं गगायामि ते ॥ काममें याता है। बेलके गोद में थमा मिला कर उसमे (श्रीकृष्णावामन ६६)। कांचके वासम आदि ओर जा सकते हैं। भक्तप्रेममे राधाकृष्ण बिल्वमङ्गलको अव बहुत दिन कच्चे बेल के छिलकेसे एक प्रकारका जगद रंग निक- तक कैश न दे सके। उन्होंने निज पदाहस्तके द्वारा उन लता है जो हरौके साथ मिलानेमे केलिका नामक बन्न के शान-चक्ष खोल दिये। अब अन्धके नयन खुल गये, रंगनेके काममें भाता है। उन्होंने विभङ्गभङ्गिम मुग्लोवतन श्याममूर्तिके दर्शन बिल्ववृक्षमें भेषज गुण भी बहुत है। कच्चे और पक्के किये ; पाममें प्रेममयी गधा ऐसा युगल रूप देग्व कर फल, जह, पने. छिलका आदि सबमें अलग भलग गुण वे प्रेमावेशमें ढल गये। (भनमाल ) पाये जाते हैं। बिल्यमङ्गलठाकुरका दूसरा नाम लीलाशुक था। श्री- १ कन्चा फम्म कच्चे फलोको खण्ण त्रएट कर लोग कृष्णप्रेममें मन्यासो वन उन्होंने तत्वज्ञान लाभ किया मुखा लिया करते हैं, जो बेलगरीके नामसे बाजार में था। कृष्णकर्णामृत, कृष्णबालचरित, कृष्णारिककौमुदी, विकता है। इसमें धारकता गुण है। लड़कोंको गोविन्दस्तोल, बालकृष्णक्रीडाकाव्य, बिल्वमङ्गलस्तोत्र अजीर्ण रोग होने पर इसका काढ़ा बना कर दिया और गोविंददामोदग्स्तव नामक प्रथ उनके बनाये हम जाता है। यह पाकाशयके लिए अत्यंत उपयोगी है मिलते हैं। और महज ही परिपाक होता है। कभी कभी संग्रहणी बिल्ववन । सं०को बिल्यम्य वनं। बेलका जंगल। गेगमें भी इसका पथ्य दिया जाता है। भामाशय बिल्ववन दाक्षिणात्यके मदुरा नगरके निकटवत्तीं एक (पेचिम) आदि श्रीदरिक रोगों में कच्चा खेल भून कर गुड़ तीर्थ । यह बेगवतो नदीके किनारे अवस्थित है। स्कन्द.. या चीनीके माथ खानेमे उपकार होता है। पुराणान्तर्गत बिल्वारण्य माहात्म्य और शिवपुगणके २ पक्का फल सुमिष्ट, सुगन्धियुक्त भौर शीतल होता है। बिल्ववन माहात्म्यमें इसका विस्तृत विवरण लिग्वा है। गरमियोंमें इमली या दहीके माथ इसका मठा सरबत बना बिल्ववृक्ष ( सं० पु० ) बेलका पेड़ । ( Nishe mittis) कर पीनेसे बड़ा स्वादिष्ट मालूम पड़ता है और पेट ठंढा विभिन्न भाषाओं में इसके नाम-हिन्दी--बेल, शीफल, रहता है। यह सरबत हय, बलकारक और मारक होता श्रीफल संस्कृत---विल्य,श्रीफल, माला बिल्वफल, बिल्व. है। सुबहमें बरफके साथ सरबत पीनेमे उदरामय रोग मराठी--बेल : गुजरातो-बिल ; बगला---बेल, बिल्व; जाता रहता है। पका बेल थोड़ी-सी चीनी मिला कर आसामी---बेल ; सिन्ध-बिल, कटोरी ; अरबी सफर- खानेसे पेट बंध जाता है। दीर्घाजीणं वा आमाशयजनित जले, हिन्दि, सूल; कोल---लोहगसो ; मघ- औरतपंग ; : दौर्बल्यमें यूरोपीय लोग बेलमार्माले? (Bel-naruna. तामिल---बिल्वफलम् । तैलङ्ग---मरेदु, मालुरम, बिल्व- de) बनाकर सुबहके बख्त उसका सेवन करते हैं। • . Vol xv. 101