पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४११

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बीपना-पीज ४०५ सूत आदिको लपेट कर बीड़ो बनाई जाती है । ५ वह 'बीजं शुक्र' (मेधातिथि) ३ शक्तिरूप । ( मनु १०/१२) गेंडरी जिसे सिर पर रख कर घड़ा टोकरा या और कोई ४ अंकुर । ५ तत्वाधान। ( मेदनी )६ मजा । बोझ उठाते हैं। (राजनि०) ७ गणित-विशेष, बीजगणित । ८ वृक्षादिका बींधना (हिं० क्रि०) विद्ध करना, छेदना । अंकुराधार । वी ( फा० स्त्री०) बीबो द ग्वा । देवताओंके मूलमन्त्र, बोजमंत्र। तन्त्रमें प्रत्येक बीका (हिं० वि० ) वक्र, टेढ़ा। देवताके भिन्न भिन्न बोजमन्त्र लिखे हैं। बहुत ही बोकाजी--अन्तस्थ 'व'-में दखा। संक्षेपमें इस विषय पर प्रकाश डाला जाता है। बोकार्नर-वीकानेर देखो। ____ अन्नपूर्णाबीज -हों नमो भगवति महेश्वरि अन्न- बीख (हिं० पु. ) पद, कदम, डग। पूणे स्वाहा ।' निपुटा बोज ---'श्रीं ह्रीं क्लों ।' त्वरितायीज.. बोग ( हिं० पु० ) भेड़िया । 'ओं ह्रीं हुं खे च छेक्ष स्त्री हों फट ।' नित्याबोज- बोगहाटी ( हि० स्त्री०) वह लगान जो वाघेके हिसावसे ऐं क्लीं नित्यक्लिन्ने महद्रवे स्वाहा।' दुर्गाबीज - 'ओं ह्रीं लिया जाय। दु दुर्गायै नमः ।' महिप-मदिनीयोज 'ओं महिष- बीघा (हि.पु. ) स्वेत नापनेका एक वर्ग मान जो वीस मर्दिनि स्वाहा।' जयदुर्गाबीज - 'ओं दुर्गे दुर्गे रक्षणि बिस्वेका होता है : एक जरीब लंबी और एक जरीब स्वाहा ।' चौड़ी भूमि क्षेत्रफलमें एक बीघा होती है। भिन्न भिन्न शलिनोबीज -'ज्वल ज्वल शूलिनि दृष्टग्रह हुं फट् प्रान्तों में भिन्न भिन्न मानकी जरीबका प्रचार है। अतः , स्वाहा ।' वागीश्वरीबीज 'वद वद वागवादिनी प्रान्तिक बीघेका मान जिसे देहो वा देहाती बीधा कहते । म्वाहा। पारिजात सरस्वती बीज -'ओं ह्रीं इसी हैं, सब जगह समान नहीं है। पक्का बोधा जिसे सर- ओं ह्रीं सरस्वत्यै नमः । गणेशबीज · 'ग' । हेरम्बबीज... कारी बीघा भी कहते हैं, ३०२५ बर्गगजका होता है जो 'ओं गू नमः ।' हरिद्वागणेशबीज .. ग्लं'। लक्ष्मीबीज--- एक एकडका 'वां भाग होता है। अब सब जगह प्रायः इसी बीघेका प्रयोग होता है। प्रसूत्यै नमः।' मूर्यवीज 'ओं घृणि सूर्य आदित्य ।' बीच (हिं पु० ) १ किसी परिधि, सीमा या मर्यादाका . श्रीरामबीज 'रा' रामाय नमः जानकीवल्लभाय हु केन्द्र अथवा उस केन्द्रके आसपासका कोई ऐसा स्थान | स्वाहा ।' विष्णुबीज 'ओं नमो नारायणाय ।' श्रीकृष्ण- जहांसे चारों ओरकी सीमा प्रायः समान अन्तर पर हो, बीज 'गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।' वासुदेवबीज-.--'ओं- किसी पदार्थका मध्यभाग। २ दो वस्तुओं या खंडोंके नमो भगवते वासुदेवाय ।' बालगोपालबीज- 'ओं क्ली वोचका अन्तर, अवकाश। ३ अवसर, मौका। ४ भेद, कृष्णाय ।' लक्ष्मीवासुदेववीज---'ओं ह्रीं ह्री लक्ष्मीपासु- फरक । (स्त्री०) ५ लहर, तरंग। देवाय नमः।' दधिवामनबीज 'ओं नमो विष्णवे सुर- बीचोबीच (हिं. क्रि० वि०) ठीक मध्यमे, बिलकुल पतये महावलाय स्वाहा।' बीचमें । ___ हयग्रीवका बीज -'ओं उद्विरत्प्रणवोढ़ीथसर्ववागी- वि (हिं० पु.) बिच्छू देखा। - श्वरेश्वर । मर्वदेवमयाचिन्त्य सर्वबोधय बोधय ॥ बीज ( स० क्ली० ) विशेषेण कार्यरूपेण अपत्यतया च . नृसिंहवीज 'उम्र वीर महाविष्णु ज्वलन्तं सर्वतोमुखं । जायते 'उपसर्गे च संज्ञायां' इति जन इ 'अन्येषामपोति': नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युमृत्यु नमाम्यहम् ॥" उपसर्गस्य दीर्घः वा विशेषण ईजते कुक्षि गच्छति शरीरं नरहरिबीज ..'आं ह्रीं क्षौं हु फट् ।' हरिहरवोज - वा ईज-गतिकुत्सनयोः पचादद्यच् । १कारण । “बीजं : 'ओं हों हौं शङ्करनारायणाय नमः हौं ह्रीं ओं ।' वराह मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनं ।" (गीता ॥१०), बीज--'भो नमो भगवते वराहरूपाय भूभुवस्थापतये । भूपतित्वं मे देहि वदापय स्वाहा।' शिवबीज-'हौं।' Vol. xv 102