पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४२

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प्लीहाश-प्नुष जाता रहता है । यह औषध प्लीहारिरस नामसे की एक चालका नाम जिसे पोई कहते हैं। २ तिर्यक प्रसिद्ध है। गति, टेढ़ी चाल । (पु० ) प्लुतं प्लुतवद् गति रस्या- इसके अलावा प्लीहारिरम एक और प्रकारका भी स्तीति प्लुत-अच् । ३त्रिमानवणे, स्वरका एक भेद जो है जिसकी प्रस्तुत प्रणाली यों है -लौह ४ तोला, मृग- दीर्घ से भी बड़ा और तीन मात्राका होता है। चर्मभन्म ८ तोला, मीठा नीबूका मूल ८ तोला इन सब “एक मात्रो भवे घस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते। । द्रष्योंको एकत्र कर ६ रत्ती भरकी गोली बनाये। इसके वित्रस्त प्लुतो शेयो व्यञ्जनञ्चाद्ध मात्रकम् ॥" सेवनसे प्लोहा, यकृत और गुल्म अति शीघ्र प्रशमित | (प्राचीनका०) होते हैं। (रसेन्द्र सारसं० ) जिसको मात्रा एक है, वह ह्रस्व, जिसकी दो, वह प्लीहाशत्रु ( म० पु० । प्लीहायाः शत्रः । प्लीहशत्रु, दीर्घ और जिसकी मात्रा तीन है, वही प्लुत कहलाता प्लोहघ्नवृक्ष। है। पाणिनिमें, किस स्थान पर कौन शब्द प्लुन होगा पोहाशार्दूलरम ( स० पु० ) पीहायाः शार्दू लइव और कहां नहीं होगा, इसका विशेष विवरण लिखा है। रसः । पीहारोगनाशक औपधविशेष । प्रस्तुत । मुग्धबोधटीकामें दुर्गादासने लिखा है, कि दूराहान, प्रणालो-- पारद, गन्धक और त्रिकटु प्रत्येक बराबर गान और रोदन इन सब स्थानोंमें प्लुतस्वर होगा । ४ बरावर भाग मिला कर जितना हो उतनी ही ताम्र- वह लाल जो तीन मात्राओंका हो। (त्रि०) ५ कम्प- भस्म, मनःशिला, कौड़ी, नूतिया, हींगा, लोहा, गतियुक्त, जो कांपता हुआ चले । ६ प्लावित १७ तारा- बोर। ८ जिसमें तीन मात्राएं हों। जयन्ती, रहेणा, यवक्षार, सोहागा, सैन्धव लवण, विट् . बार लवण, चिता और जयपाल । प्रत्येक पारेके समान, प्लुतगति (स'० स्त्री० ) प्लुता गतिः कर्मधा० । १ प्लुत- इन सब दव्योंको एकत्र कर निसोथ, निते. अदरक और : गमन । (त्रि० ) २ शशक, खरहा । प्लुता गतिर्यस्य । २ प्लुतगमनयुक्त, जो कृद कृद कर चलता है। धतूरेके रसमें भावना दे । पीछे रत्ती भरकी गोली बनावे। प्लुतार्क - एक ग्रीक-जीवनी लेखक और नीतिशास्त्रज्ञ । इसका अनुपान मधु और पीपल है। रोगभेद बलाबलके ५० ईमें वियोंसियाके अन्तर्गत धिरेनिया ग्राममें इनका अनुसार सेवन करनेसे पीहा, अग्रमास, यकृत् , गुल्म, जन्म हुआ था। इन्होंने डेल्फांके आमेनियस-प्रति- आमाशय, उदरी, शोथ, विधि, अग्निमान्द्य और ज्वर ष्ठित विश्वविद्यालयमें दर्शनशास्त्र पढ़ा था। इसके बादसे आदि रोग थोड़े ही दिनोंके अन्दर जाने रहते हैं। ये रोम महानगरीमें रहने लगे थे। यहां प्रोकके सम्बन्धमें (रसेन्द्रसारस. प्लीहारोगा०) कई वार वक्त ताए ही धोरे धारे लूकन, यङ्गर, पिनि पाहोदर ( स० क्ली० । उदररोगभेद, तिल्ली । जो विदाही और मार्शन आदिके साथ इनको मित्रता हो गई। वृद्धा- और अभिष्यन्दजनक द्रव्य बहुत खाते हैं उनका रक्त और वस्थामें ये अपनी जन्मभूमि लौटे। इनके बनाये हुए श्लेषमा कुपित हो कर प्लीहाको वृद्धि करती है, इसोका ग्रन्थों में विद्वज्जीवनी ( Lives of illustrious men) नाम पोहोदर है । यह पीहा वाम पार्श्वमें बढ़ती है । इस- और नीति ग्रन्थ सर्वोत्कृष्ट है। उनका ग्रन्थ पढ़नेसे में रोगो अत्यन्त शीर्ण हो जाता है । (सुश्रुत नि० ७ अ०) प्राचीनकालमें यूरोपमें नरवलि-प्रथा प्रचलित थी, इसके उदर रोग और प्लीहन् २.४द देखो।। । अनेक प्रमाण मिलते हैं। १२० ई०में इनकी जीवन लीला पोहोदरिन् ( सं० त्रि. ) पोहोदर अस्त्यर्थे इनि। प्लीहो- समाप्त हुई। दर रोगग्रस्त, जिसे पीहारोग हुआ हो। प्लुति ( स० स्त्री, ) प्लू-भावे-क्तिन् । १ प्लवन, उछल प्लुक्षि ( स० पु० ) पाण्यात दहताात प्लुप दाह ( 'लाष कूदको चाल। २पोई । ३ वह वर्ण जो तीन मात्राओंसे कुपिशुषिः कृसि । ३ण ३११५५ ) इति कसि । १ अग्नि, बाला गया हो। आग। २ स्नेह, प्रेम। ३ गृहदाह, घर जलाना। नुप ( स० पु० ) १ दाह, जलना। २ पूर्ति । ३ स्नेह, प्लुत ( स० क्ली. ) प्लु-क्त : १ अश्वगतिविशेष, घोड़. प्रेम ।