पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४२५

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४१६ बुद्धदेव 'अभाव पदार्थसे भाव पदार्थकी उत्पत्ति होती है। वीताविद्या विमायो जगति स भगवान् वीतरागो मुनीन्द्रः । इस प्रकार खण्डन कर व्यासने वेदोंका प्रामाण्य संस्था ___ का सेव्यो बुद्धिमद्भिर्यदतर्वदत में भ्रातरस्तेपुरकत्ये ॥" पन किया है । इसके बाद भगवान् बुद्ध दैत्योंको विमूढ . ब्रह्मा अविद्या द्वारा अभिभूत थे : विष्णु महामायाके करनेमें प्रवृत्त हुए । बुद्धदेव रुद्ररूपी महादेवसे बोले, (१) आलिङ्गनमें विमुग्ध थे और शङ्कग्ने आसक्तिवशतः 'हे महावाहो रुद्र ! हे महाभुज ! आप मोहशास्त्रोंकी पार्वतीको अपने शरीरमें धारण किया था। किन्तु मुनि रचना कर अतथ्य और वितथ्यको दिखाइये तथा कई पुङ्गव बुद्ध अविद्या, माया तथा आसक्ति इन सबों से एक कल्पित शास्त्रोंकी सृष्टि कर ऐसा उपाय कीजिये बिलकुल अलग थे। जिससे सभी मनुष्य मेरे प्रति विमुख हो जायं।' बुद्धदेव.. विदेह नामक कविने समन्तकटवन्नना नामक पालि के कथनानुसार महादेव प्रभृतिने भी अपने अपने अंशोंमें ग्रन्थमें लिखा है, -- अवतार लिया और वैदिक धर्ममें प्रवेश कर मनुष्यों को "सततवितनकिनि ध्वस्तकन्दप्पदप्पं । विश्वास दिलानेके लिये वेदों को यथार्थ व्याख्या की। विभाहतविधानं सचमोकककेतुम् । अनन्तर उन्होंने अस्ति और नास्तिके सिवा अविद्या अमितमतिमनग्धं सस्तिदं मेरुमार । नामक पदार्थको जगत्प्रवाहका कारण बतलाया और मुगतमहमुधार रूपसार नमामि ॥" उस अविद्याकी निवृत्तिसे ही निर्वाण लाभ होता है, ऐसा : काश्मीरके प्रसिद्ध बौद्ध कवि क्षेमेन्द्रने अवदानकल्प- बतला कर कितने ही जातिभष्ट सन्यासियों और लतामें बुद्धजन्म नामक परिच्छेदके प्रारम्भमें लिखा है। पाषण्डोंकी सृष्टि की। यह देख कर व्यास उन पर बड़े "हमति सकललोकानोकसाय भानः हो प्रसन्न हुए। परमममृतवृष्ट यै पूर्णतामति चन्द्रः। बौद्धमत । दयनि जगति पूज्यं जन्मगृहानि कश्चित् उधर बौद्धग्रन्थकारोंने बुद्धदेवकी भूरि भूरि प्रशंसा : बिपुनकुशनसेतुः सत्त्वसन्तागााय ॥" की है। अमरसिंहने अपने अमरकोषके प्रथम अध्यायमें अवदानकल्पलतामें महाकाश्यपावदान नामक ६३वें ब्रह्मा, विष्णु प्रभृति देवताओंके नामके पहले बुद्धका पल्लवके प्रारम्भमें क्षेमेन्द्रने लिखा है,---- नामकोत्तन किया है:-- "शत्रु वायुवरुणादयः पुराः विक्रिया मुनिवराच यत्कृते। "सर्वज्ञः सुगतो बुद्धो धर्मराजस्तथागतः । यान्ति तत् मुरमुग्वं तृणायते यग्य कम्य न मायाम्पदम् ॥" समन्तभद्रा भगवान मारजित् लोकजित् जिनः ।। बुद्धचरितकागके प्रारम्भमै अश्वघोपने बुद्धको नमस्कार पडभिज्ञो दशवलाऽद्वयवादी विनायकः । करते हुए लिखा है :--- मुनीन्द्रः श्रीघनः शास्ता मुनिः शाक्यमुनिस्तु यः ॥ "श्रियं पराध्या विदधत् विधातृजित नमा निरस्यन्नभिभूतभानु स शाक्यसिंहः सर्वार्थसिद्धः शौद्धादनिश्च सः । गौतमश्रार्कबन्धुश्र मायादं वोसुतश्च सः॥ सूदन्निदाघं जितचारुचन्द्रमा सम्बद्ध्यन न हन्तनापमा ॥" बङ्गदेशीय प्राचीन बौद्ध कवि रामचन्द्रने कविभारतो ___एशिया महादेशके प्रायः सभी प्रदेशोंमें बुद्धदेवका भक्तिशतक प्रन्थमें लिखा है,- जीवनचरित पाया जाता है । ललित विम्तरसूत्र, बुद्ध- "ब्रह्माऽविद्याभिभूतोदुरधिगममहामायायालिङ्गितोऽसौ। चरितकाव्य, लङ्कावतारसूत्र, अवदानकल्पलता आदि विष्णुरागातिरेकात् निजवपुषि धृता पार्बती शङ्करेण ॥ संस्कृत प्रन्थ, महावंश, महापरिनिर्वाणसूल, महायग्ग, जातक प्रभृति पालिग्रन्थ, कोपान-भि चि-चि इत्यादि (१)"त्वञ्च रुद्र महावाहो मोहशास्त्राणि कारय । चोनग्रन्थ ; शाकजित्सुरोकु आदि जापानी, मललंगरबत्तु अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज ॥ प्रभृति ब्रह्मदेशीय प्रन्थ ; गच्छका रोल्प (कैङ् गुरुके सूत्र- सागमैः कल्पितैस्त्वच जनान् मद्विमुखान कुरु ॥" पिटकका ख अध्याय) नामक तिब्बतीय प्रन्थ इत्यादि बौद्ध