पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४२८

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बुद्धदेव उनसे कहा "हे प्रजागण ! तुम लोग शिष्टता मत छोड़ो। पर रहता और बड़े यलसे अपने बचोका पालन-पोषण इस इमलीके पेड़को ग्रामवासियोंने बड़ी मेहनतसे लगाया करता था। एक दिन तीव्र तूफानसे यह पेड़ उखड़ कर है और वे हमेशा इसकी चौकसीमें लगे रहते हैं, ताकि नदीमें गिर पड़ा जिससे उस परके सभी बच्चे डूब गए। यह पेड़ शीघ्र वरवाद न हो जाय। उस समय गौतमने प्रतिज्ञा की, "समुद्र सुम्हा कर बन्दरोंने उनकी बात पर कुछ भी उत्तर न दिया। बच्चोंका उद्धार करूंगा।' बाद वे अपनी पूंछ नदीमें दुबा अन्तमें रातको लगभग ५०० वन्दर मिल कर चुपचाप डुबा कर किनारे पर झाड़ने लगे। सात दिन तक वे इसी इमली खानेको चले। उन्होंने सोंचा, कि उन्हें कोई देखन प्रकार करते रहे। तब देवराजने आ कर उनसे पूछा, सकेगा, किन्तु वे इमली खाने समय अपने आपको "हे साधु ऊदविलाव ! तुम्हें जरा भी समझ नहीं, इस बिलकुल भूल गए. और अपनी बोली में अपने अपने प्रकार पूंछ बुबो कर पानी छिड़कनेसे कितने दिनों में तुम मनका आनन्द प्रकाश करने लगे। बाद गांववाले समुद्र सुखा सकोगे ? समुद्र ८४ हजार योजन गहरा बन्दरोंकी आवाज सुन कर एक एक लाठी ले उस पेड़के है। तुम जैसे लाखों प्राणीकी ऐसी चेष्टा करने पर नीचे आये। उन लोगोंने बिचारा, "हम लोग सुबह भी समुद्र नहीं सूख सकता।" तक यहां ठहरेंगे और बन्दरोंको पेड़ परसे उतरते ही इतने पर ऊदबिलावरूपी गौतमने देवराजसे कहा, 'हे मारेंगे। धीरे धीरे यह खबर । कटराज गौतमको मिली। वीरपुरुष! यदि सभी मनुष्य आप-जैसे साहसी होते, तो उन्होंने कहा, 'मेरे मना करने पर भी वन्दर इमली खानेका आपका कहना सार्थक होता। आपमें कहां तक विक्रम लालच न छोड़ सके। उन सबोंके जीवन अभी बड़े है, वह आपके वचनसे ही मालूम पड़ता है। जो कुछ सङ्कट में पड़े हैं; जो हो प्रजाको रक्षा करना राजाका हो, आप सरोखे भीरु, कापुरुष तथा निर्वोधके साथ परम कर्तव्य है। अतएव मुझे किसी उपायका अव. बातचीत करनेसे कोई फल नहीं। आपका जहां जी लम्वन कर उनकी रक्षा अवश्य करनी चाहिए। चाहे, चले जाय, मेरे कार्य में बाधा न डाले। मैंने बाद गौतमने गांवमें जा कर देखा, कि बच्चे, बूढ़े, जो आरम्भ किया है, उसे बिना समाप्त किये न स्त्री सबके सब सोये हुए थे और गांवके वयस्क मनुष्य छोडगा।" देवराज उस ऊदविलायका अदम्य उत्साह लाठी ले कर इमलोके पेड़के नीचे खड़े थे। गांवमें देख कर चकित हो रहे। बाद देवताओं की सहायतासे बिलकुल सन्नाटा छा रहा था, सिर्फ एक घरमें एक बूढ़ी उसने सभी बच्चोंको समुद्रसे बाहर निकाला। गौतमने औरत खाँसती थी। उसे नींद नहीं आती, वह कभी इस जन्ममें वीर्यपारमिता दिखलाई थी। उठती, कभी बैठती और कभी बिछावन पर लेट जाती सिंहजन्म-सत्यपारमिता। थी। अब गौतमने उसी बूढ़ीके घर आग लगा दी एक समय गौतम सिंहकुलमें जन्म ले कर किसी घर जलने लगा और बूढ़ी चिल्लातो हुई घरके बाहर आई। पहाड़ पर रहते थे। उसके समीप ही कीचड़से भरी भाग बुझानेका कोई उपाय उसे दोख न पड़ा। बाद जो हुई एक झील थी जहां हरिण आदि अन्तु चरा करते सब मनुष्य इमलीके पेड़के नीचे खड़े थे, उन्होंने बूढ़ीकी थे। एक दिन सिंहरूपी गौतमने भूखसे व्याकुल हो कर आवाज सुन अपनी अपनी लाठी फेक दी और एक हरिणका पीछा किया ; किन्तु उक्त झीलके कीचड़में सब गांव जा कर आग बुझाने में लग गए। सुअवसर वे फंस गए। उससे निकलनेका कोई उपाय न देख पा कर बन्दर अपने घर चले आये । इसी जन्ममें गौतमने उन्होंने एक गीदड़से कहा, 'हे भद्र ! मैं बड़ी तकलीफमें प्रज्ञा-पारमिता सम्पन्न की थी। | आ गिरा हूं। मेरे दोनों पैर कीचड में इस प्रकार ऊदाबलाव-जन्म-वीर्यपार मिता। फंस गये हैं, कि उन्हें बाहर निकालनेकी मुझमें सामर्थ्य किसी समय गौतमने ऊदबिलावरूपमें जन्म लिया नहीं। हे भाई ! तुम कृपा कर इससे निकाल दो।' था। यह ऊदबिलाव किसी नदीके किनारे एक पेड़, गोदड़ बोला, 'आप बलवान् तथा विक्रमशाली जन्तु हैं।