पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४३८

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५३२ बुद्धदेव गमनेच्छु बोधिमन्यसे बातें करने लगा। दोनों में पहले अदुःखादुःख ध्यानमें विहार करने लगे। चित्तको सत् वागयुद्ध हुआ। अनतर मारने अपने पुत्र, कनया और : तथा असत् वत्तियां ही मङ्गलदायक हैं, ऐसा सोच कर असंख्य सेनाओंके माथ विविध उपायसे बोधिसत्त्व. उन्होंने सवितकंध्यानमें परमानन्द लाभ किया था। फिर पर आक्रमण कर दिया, किंतु वे टममे मम न हुए। चित्तको सत् तथा असत्वृत्तियोंका परस्पर विरोध __ मार सम्मुम्ब संग्राममें पगजित हो कर अत्यत : मिट जानेसे ही उन्हें अवितर्क समाधिलाभ हुआ। जब विषण्ण चित्नसे अपना घर लौटा। बादमें रति, तृष्णा' प्रोति और अप्रीति इन दोनोंके प्रति उनकी उपेक्षा उत्पन्न और भारति नाक तीन कन्याओंने मारको सांत्वना । हुई, नव निष्प्रीतिक ध्यान प्राप्त हुआ। सुख और दुःख दे कर कहा, 'हे पिता! आप चिंता न करें; हम लोग सम्पूर्णरूपसे तिरोहित होनेसे उनका चित्त धीरे धीरे कौशलपूर्वक बोधिसत्वको आपके अधीन कर देंगी।' सुनिमल हो गया और तभी उन्होंने अदुःखासुख ध्यान अनतर वे युवतोका रूप धारण कर उनके निकट गई। लाभ किया। इन्दवदना तथा मोहरूप अलङारसे विभषिता रति ___अनन्तर रात्रिके प्रथम याममें बोधिसत्त्वके दिव्य संसारके नाना प्रकारके सुखकी कथा सुना कर बोधि- , चक्षु उत्पन्न हुए। उन्होंने तत्त्वज्ञानका साक्षात्कार प्राप्त मत्त्वको रिझाने लगी। वह बोली, हे बोधिसत्त्व ! तुम किया। रात्रिके मध्यम याममें उन्हें पूर्वतन विषयोंकी साम्राज्य सुखका परित्याग कर क्यों दीन भावसे ममय याद आई और अन्तमें वे संसारके दुःखका कारण दृढ़ने बिताते हो? सम्पत्ति त्याग करनेमे ही मुक्ति मिलती लगे। तदन्तर वाह्य और आभ्यन्तर जगत्के क्रिया- है, यह तुमने किससे सुना है ? तुम मेरे आश्रयमें आओ: प्रवाहके मध्य किस प्रकार अविच्छिन्न कार्यकारण भाव पर हां, यदि तुम विपथगामी न हो तव । निद्राग्रसित विद्यमान है इसका निर्णय करनेमें वे प्रवृत्त हुए । उक्त भाव- मनुष्य जिस प्रकार किमाकी भी बात नहीं सुनता, ध्यान के अबण्डा नियमके वशाभूत हो कर इस अनादिसंसार- मग्न वोधिमत्त्व उमी प्रकार रतिकी वात सुन न सके। को वाह्य वस्तु उत्पत्ति, स्थिति और विनाशको प्राप्त होती रतिका कहना खतम होते ही तृष्णा और आरति आ . है। आध्यात्मिक संसारमें भी कुशल और अकुशल कर बोधिसत्त्वको नाना प्रलोभन दिखाने तथा वृद्धाका . चैनसिक वृत्तियोंने अविद्याकी वशवत्तों हो कर उत्पत्ति रूप धारण कर नाना उपदेश वाक्य कहने लगी। तथा निरोध लाभ किया है । संसारमें किस प्रकार दुःख- एक बार रति, तृष्णा और आरतिने उनके समीप जा! की उत्पत्ति होती है इसका निर्णय करते हुए वोधिसत्त्वने हाथ जोड़ कर कहा था, भगवन । हम लोग आपको कहा, कि अविद्यासे संस्कार, संस्कारसे विज्ञान, विज्ञान- शरणमें आई हैं। आप हमें प्रवज्याधम प्रदान करें। से नामरूप, नामरूपसे पड़ायतन. पड़ायतनसे स्पर्श, आपको कथा सुन हम सब गाहस्थ्य धमका परित्या स्पर्शसे वेदना, वेदनासे तृष्णा, तृष्णासे उपादान. उपा- कर सुवर्णपुरसे यहां आई हैं। हम कन्दर्षको लडको . दानसे भव, भवसे जाति और जातिसे जरामरण, शोक तथा हमारे पांच सौ भाई हैं। वे मव भी सद्धर्म ग्रहण ' परिदेव, दुःख, दौर्मनस्य, उपायास इत्यादिको उत्पत्ति होती है। केरनेको उत्सुक हैं। आपने वैराग्यका अवलम्बन किया : अविद्या अथवा अज्ञान ही दुःखका कारण है। बाद है: अतएव नप सब आज ही विधवा हो जावेगी। बोधिसत्त्व रात्रिके शेष याममें यह सोचने लगे, कि किस निलंज मारनं भी अन्तमें यथासाध्य चेष्टा की, पर । - प्रकार अविद्याको निवृत्ति हो जाय, ताकि सभी मनुष्य उसकी एक भी न चली। बोधिसत्त्व कन्दको जीत कर कर दुःखसे चिरमुक्ति लाभ कर सकें। अनन्तर उन्होंने दुःख- महाप्रीत्याहारस्थूह नामक समाधिमें लग गए। निवृत्तिका एक उपाय ढूढ़ निकाला। ____ बोधिसत्त्वने इस प्रकार मार सेनाको हरा कर परम बोधिसत्त्वने जिस मुहूर्तमें संसारके दुःखसमूहको शान्ति प्राप्त की। उनका चित्त सुप्रसन्न हुआ। वे पहले उत्पत्ति तथा निरोधका कारण बतलाया था, उसी मुहूर्त- सुवितर्क, दूसरे अवितर्क, तीसरे निष्पीतिक और चौथे से वे 'बुद्ध' नामसे प्रसिद्ध हुए।