पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४४०

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बुद्धदेव कुछ दिन बाद बुद्धदेवके दो शिष्य मारिपुत्र तथा मिर्फ अपने ही भोग न कर शीलवान् ब्रह्मचारियोंको भी मौदगल्यायनने निवाण लाभ किया। बाद आनन्द ही , कुछ बांट देंगे और जब तक वे अपने सदाचारकी उनके सेवक बने । आनन्द बुद्धके साथ घूम घूम कर । रक्षा कर सद्धमकी ओर दृष्टि रखेंगे, तब तक उनका क्षय धर्म प्रचार करते थे। नहीं होगा। ____किसी समय बुद्धदेवके आदेशानुसार आनन्दने अनंतर बुद्धदेव राजगृह छोड़ कर आनन्दके साथ असंख्य भिक्षकको गजगृह नगरकी उपस्थानशालामें अवलम्बिका नामक स्थानमें पहुंचे जहां बहुत-से भिक्ष बुलाया। वहां बुद्धदेवने कहा. हे भिक्षकगण ! मैं तुम इकट्ठे हुए थे। वहां उन्होंने शीलसमाधि और प्रज्ञाविषयमें लोगोंको सान अपरिहानीय धर्मका उपदेश देता है, नाना धर्मोपदेश करते हुए कहा था, कि शोलपरिशुद्ध ध्यानसे सुनो - समाधि, ममाधिपरिशुद्ध प्रज्ञा और प्रजापरिशुद्धचित्त जब तक तुम लोग कम, भस्म, निद्रा और आमोद बहुत फलदायक होता है। इन मत्रोंमें ग्त न रहोगे, तब तक तुम लोगोंकी पापेच्छा कुछ दिन बाद वे नालन्दा गण । वहां मारिपुत्र नामक प्रचलन होगो और जब तक तुम लोग पापमित्रका आश्रय शिष्यके साथ उनकी भेंट हुई नालन्दाके प्रावारिकाम्रवन न लोगे नशा हमेशा निर्वाण लाभके उपायमें लगे रहोगे • में वे विहार करते थे, कि इतने हीमें मारिपुत्रने वहां आ तब तक तुम लोगोंका अधःपतन न होगा। कर प्रणाम करते हुए कहा, 'भगवन ! आपके प्रति मेरी - भिक्षकगण ! और भो सुनो जब तक तुम लोग अटूट भक्ति है, क्योंकि इस पृथिधी पर आज तक किमी श्रद्धावान , होमान, विनयी. शास्त्रज्ञ, वीर्यशाली, स्मृति- ऐसे श्रमण वा ब्राह्मणने जन्म नहीं लिया है, जो आपकी मान और प्रज्ञावान बने रहोगे तब तक तुम लोगोंका क्षय अपेक्षा अधिकतर शानो हों।' इस पर बुद्धदेव बोले हे नहीं होगा। सारिपुर पूर्वकालमें जिन सब ज्ञानी मनुष्योंने जन्म- अन्य मान अपरिहानीय ये हैं-- जब तक तुम स्मृति, . ग्रहण किया था, तुम उनके चित्तके साथ अपने चिनकी पुण्य. वीय, प्रीतिः प्रन्धि , समाधि और उपेक्षा इन तुलना कर क्या जान सकते हो-वे कैसे शोलसम्पन्न, मान प्रकारके ज्ञानाङ्गकी भावना कगेगे, तब तक तुम्हारा धर्मपरायण तथा प्रज्ञावान थे ? और भी क्या तुम बना अधःपतन नहीं। मकते हो, कि भविष्यकाल में जो सब ज्ञानी मनुष्य आ.व. और भी सात अपरिहानीय धर्मका विषय वर्णन भूत होंगे उनका चित्त, धर्म और प्रज्ञा कैसी होगो? हे करता है: सुनो । जब तक तुम लोग अनित्य: अनात्म, सारिपुत्र ! तुमने यदि मेरे चित्तके साथ अपने चित्तकी अशुभ, आदीनव. प्रहाण, विराग और निरोध इन मान तुलना की है, तो यह बनाओ, कि मेरे शील, धर्म और प्रकारकी संज्ञाओंकी चिन्ता करोगे, तब तक तुम लोग प्रज्ञा कैमी है ? विचारोगे, कि संमारकी सभी वस्तु अनित्य और · इस पर मारिपुत्रने जवाब दिया, 'भगवन् ! मैं भूत, अलीक हैं ; सबोंका परिणाम अशुभ तथा सभी पापमय भविष्यत् और वर्तमान शानियोंके चित्तके साथमें अपने हैं। इस प्रकार चिता कर अर्जित पुण्यका संरक्षण, चित्तको तुलना करनेमें समर्थ नहीं। मैं सिर्फ प्रवर्तित अलब्ध पुण्यका लाभ, उत्पन्न पापका परित्याग और अन्य धर्मकी प्रणालीसे जानकार है। राजा बड़ी अट्टालिका पापको अनुत्पत्ति इन चार विषयोंमें तुम लोग सम्यक् । बनवा कर उसे मजबूत दोवारसे घेर देते हैं। उसमें रूपसे चेष्टावान् होगे। अनन्तर संसाराशक्तिका त्याग, सिर्फ एक हो दरवाजा रखा जाता है जिस पर एक दर- कर वासनाओंका नाश कर सकोगे। वान हमेशा खड़ा रहता और परिचित आदमीको दूसरे छः अपरिहानीय धर्म ये हैं-जब तक भिक्ष- । भीतर जाने देता है। मट्टालिकाके भीतर जानेका न तो गण कायमनोवाक्यसे ब्रह्मचारिवोंके प्रति मित्रका-सा कोई दूसरा रास्ता ही रहता और न दीवार में कोई व्यवहार करेंगे, जब तक वे भिक्षालब्ध द्रव्यसमूहका । ऐसा छेद बना होता है, जिस हो कर एक छोटी मिली