पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४४३

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बुद्धदेव उनकी बात पर अभिनन्दन प्रकट करना: किंतु यदि सूत्र बैल विनष्ट हुए थे, यहां बहुतमे मनुष्य आ कर इकट्ठ' या विषयमें वैसा वाक्य न मिले, तो उस पर विश्वास हुए। बाद उनमेंसे एकने मुझे पूछा, 'महाशय ! यहां क्या करना उचित नहीं।" . हुआ है ?' इस पर मैं ने कहा मुझे कुछ मालूम नहीं। अनन्तर बुद्धदेव पाबा नामक स्थानमें जा कर चुन्द फिर वह बोला, 'महाशय ! देववर्षण, मेघगगन, विद्युत- नामक शिष्यके आम्रवनमें विहार करने लगे। चुन्दने स्फुरण आदिका क्या आपको कुछ भी स्वबर नहीं है ? उनके पास जा कर अभिवादनपूर्वक निवेदन किया, क्या आपने कोई शब्द न सुना ? क्या आप सोये हुए 'भगवन् ! भिक्ष संघके साथ मिल कर आप कल मेरे थे ?” मैंने कहा, 'नहीं', मैं तो जाप्रत था।' इस पर फिर यहां कृपया भोजन करेंगे।' बुद्धदेवने उनका निमंत्रण यह मनुष्य बोला, 'बई आश्यर्यकी बात है, कि आप स्वोकार कर लिया। चुन्दने घर जा कर अनेक प्रकारके जाग्रत थे : तौ भी कुछ जान न सके।' बुद्धको बात सुन खाद्य और बहुत-सा शूकरमास प्रस्तुत किया। दूसरे दिन : कर पुकस बड़े ही आश्चर्यान्वित हुए और उसी दिनसे बुद्धदेव उनके यहां गए, और बोले, 'हे चुन्द ! तुम सूअर- उन्होंने बुद्ध धर्म तथा संघका आश्रय ग्रहण किया। का मांस सिर्फ मुझे ही देना -वह भिक्षु दलमें न पर- कुछ दिन बाद पुकमने बुद्धको एक सुनहला वस्त्र सना। क्योंकि मनुष्यलोक, देवलोक और ब्रह्मलोकमें मेरे प्रदान किया जिससे आनन्दने उनका शरीर ढंक दिया। सिवा और कोई भी ऐसा नहीं है जो उस मांसको पचा अनन्तर बुद्ध भिक्ष ओंके माथ ककुत्था नदीके किनारे सके। मुझे परस देनेके बाद यदि और बच रहे तो उसे गए और वहीं स्नान कर चुन्दके आम्रवनमें ठहरे। गड़हमें फेक देना ।' चुन्दने भी वैसा ही किया। चुन्दने एक बिछावन बिछा दिया और युद्धदेवने उस पर चुन्दके यहां भोजन कर चुकने के बाद ही बुद्धदेव बैठ कर कुछ समय तक विश्राम किया । अनन्तर' उन्होंने लोहित प्रस्कन्दिका नामक व्याधि अर्थात् रक्तामाशय- एकान्तमें आनन्दसे कहा, 'हे आनन्द ! चन्दके मममें रोगसे प्रसित हुए और उसी समय वे कुशीनगरकी ओर यदि किसी प्रकारका परिताप उपस्थित हो तो तुम उसे चल दिये । रास्ते में उन्होंने आनन्दसे कहा, 'हे आनन्द ! दृर करना। उसके यहां भोजन करने ही मुझे कठिन मैं बहुत थक गया हूं। तुम एक कपड़े को चार तह करके रोग हुआ है, ऐसा सोच कर वह दुःखित न होने पाये। उस वृक्षके नीचे बिछा दो। मुझे प्यास लगी है, अतएव तुम उसे कहना, कि बुद्ध और भिक्षु संघको खिला कर थोड़ा पानी भी लाओ। अनंतर बुद्धदेवने पानी पी कर जो मद्धर्म आपने सञ्चय किया है, उससे आपको स्वग- कुछ विश्राम किया। लाभ होगा। चुन्दके लिये यह बड़े ही मौभाग्यको उसी समय पुकस नामक आलाड़कलामके कोई शिष्य- वात थी, कि बुद्धने उनके यहां भोजन किया था। जो पावाकी ओर जा रहे थे। बुद्धदेवको वहां देख कर उन्हों- खाद्य खा कर उन्होंने समृद्धि तथा परिनिर्वाण लाभ ने कहा, 'अहा ! प्रव्रज्याका क्या हो असामान्य प्रभाव किया था, वह महाफलदायक है।' है। एक समय आलाइ-कलाम किसी वृक्षके नीचे बैठ अनन्तर बुद्धदेवने कहा --दामशील व्यक्तिके पुण्य कर तपस्या कर रहे थे उसी समय ५०० गाड़ी उनके प्रवर्द्धित होता है। संयतके वैर उत्पन्न नहीं होता, शरीर पर हो कर चली गई ; किन्तु उन्होंने न तो उन्हें धार्मिक अमङ्गलका पर्जन कर सकते हैं और राग, द्वेष देखा और न उनका शब्द ही सुन पाया।' पुक्कसकी वात तथा मोहका क्षय होनेसे निर्धाणलाभ होता है। सुन कर बुद्धदेव बोले 'हे पुक्कस ! मैं एक समप आत्मा बाद बुद्धदेव हिरण्वती नदी पार कर शालयन गए । मामक स्थानके भूषागारमें तपस्या कर रहा था. उस वहां वे उत्तरकी ओर सिरहना कर एक चारपाई पर लेट समय अविरत मेघगर्जन, वृष्टिपात और विद्य त निःसरण रहे और बोले, हे आनन्द ! चार स्थान सबोंके लिये होती थी। उस दुर्घटना में भूषागारके दो किसान और श्रद्धास्पद हैं, जहां वुद्धका जन्म हुआ था, जहां उन्हें चार बैल मर गये। जिस जगह वे किसान और चारों सम्यक संबोधि लाभ हुई थी, जहां उन्होंने धर्मचक्र प्रव- Vol. xv. 110