पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४४४

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बुद्धदेव र्तित किया था और जहां उनका परिनिर्वाण हुआ था। जा कर पूछा, 'हे गौतम ! पूरण-काश्यप, मस्करी गोशाल, __ उसी समय आनन्दने पूछा, 'भगवन् ! स्त्रीजातिके अजित केशकम्बलो, ककुदकात्यायन, सञ्जयपुत्र वैरति प्रति कैमा व्यवहार करना होगा?' इस पर बुद्धदेवने तथा निन्य ज्ञातिपुत्र आदि जो सब धर्मोपदेशक तीर्थ- उत्तर दिया, 'अदर्शन अर्थात् उनकी भेट न करना।' फिर कर विद्यमान हैं, उनके उपदेश श्रेयस्कर है या नहीं आनन्दने पूछा, 'हे भगवन् ! यदि उनसे भेट हो जाय, और ये सब शास्त्रोंसे अभिश है अथवा नहीं?' तो क्या करना चाहिये ?' बुद्ध वाले, 'हे आनन्द ! अना- इस पर बुद्धदेवने उत्तर दिया, हे समुद्र ! इन सब लाप अर्थात् उनके साथ बातचीत न करनी चाहिये ।' तीर्थङ्करकी अभिज्ञाता कैसी है उसका विचार करनेसे 'भगवन् ! यदि वे बोलचाल करें, तो क्या करना उचित . कोई फल नहीं मिलता ? मैं आपको जिस धर्मका उप- है ?' 'हे आनन्द ! उपस्थापन अर्थात् उनकी देवताकी देश देता हूं, उसे ध्यान दे कर सुनिये। जिस धर्ममें तरह पूजा और उपासना करोगे।' सम्यक दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक, सम्यक् भनम्तर आमन्दने बुद्धदेवसे कहा, 'हे भगवन् ! कुशी- कर्मान्त, सम्यगाजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् नगर एक जङ्गलपूर्ण छोटा नगर है, आप वहां परिनिवृत स्मृति और सम्यक् समाधि इन आठ आर्यमार्गीका उप- न होंगे। चम्पा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत कौशम्बी, देश नहीं है, ऐसे धर्मावलम्बियोंमें किसी प्रकारका श्रमण वाराणसी आदि अनेक महानगर हैं : वहांके ब्राह्मण उत्पन्न नहीं हो सकता। किंतु जिस धर्ममें उक्त आठ भौर क्षत्रिय आपके प्रति भक्तिसम्पन्न हैं। वे आपके आयमार्गका उपदेश है उसमें श्रमण भी मौजूद है । श्रमण शरीरकी पूजा भी करेंगे। इस पर बुद्धदेवने उत्तर भिन्न दूसरे व्यक्तिका वाक्य शून्य अर्थात् निरर्थक है। दिया, "हे आनन्द ! तुम ऐसा न कहो। प्राचीनकालमें हे सुभद्र ! मैंने अपने उनतीसवें वर्षसे ही प्रव्रज्याको ग्रहण महासुदर्शन नामक एक धार्मिक और चतुरन्तविजयी किया है और धर्म के अन्वेषणमें इक्यावन वर्षे तक प्रज्ञा राजाने जन्म ग्रहण किया था। कुशीनगर या कुशवतीमें तथा समाधिका अनुष्ठान किया है । जो मेरे आचरित उनकी राजधानी थी। यह नगर धन और जनसे भरा न्याय और धर्मानुवत्ती नहीं हैं उनमें श्रमण भी नहीं है।' हुआ था। यह पूर्व-पश्चिम बारह योजन लम्बा और अनन्तर सुभद्रने बुद्धके समीप प्रज्या ग्रहण की और उत्तर-दक्षिण सात योजन चौड़ा है। हे आनद ! तुम वाद ब्रह्मचर्यका सम्यक् अनुष्ठान कर अहंत पद प्राप्त यहांके मलोंसे कहो, कि आज रात्रिके शेष याममें बुद्ध किया। ये ही बुद्धके अन्तिम शिष्य थे। यहीं पर परिनिर्वाणलाभ करेंगे।' बाद कुशीनगरके अनन्तर बुद्धने आनन्दसे कहा, 'हे आनन्द ! मेरे मरनेके मल्लोंने वहां आ कर बुद्धदेवकी बन्दना और पूजा की। बाद मेरा प्रवर्तित धर्म ही तुम लोगोका परिचालक इतनेमें सुभद्र नामक परिव्राजक वहां पधारे। उसी दिन रात्रिके शेष याममें गौतमबुद्ध परिनिर्वाण लाभ होगा। तदन्तर वयोज्येष्ठ भिक्षु गण नव्य भिक्षु ओंका नाम वा गोत्रोच्चारण करें। हे बन्धो ! इसी भावसे करेंगे, ऐसा जान कर वे बोले, 'मैंने सुना है, कि संसार- सम्बोधन करेंगे। फिर नवीन भिक्ष गण प्राचीनको मान- में शायद ही बौद्धोंको गति मिलेगी। गौतमबुद्ध आज इस लोकको छोड़ जायगे। मैं उनका उपदेश सुन कर नीय या पूजनीय समझ कर उनको अभ्यर्थना करेंगे।' धर्मविषयक कई एक सन्देह दूर करूंगा।' अनन्तर वाद भिक्ष ओंको बुद्धने कहा,---हे भिक्ष गण! यदि सुभद्र बुद्धके समीप जानेको उद्यत हुए । इस पर आनन्द तुम लोगोंमेंसे किसीको मेरे प्रवत्तित धर्म में कोई सन्दोह में कहा, 'महाशय ! भगवान् क्लान्त हो गये हैं, आप या मतभेद रहे, तो हमसे पूछ कर दूर कर लो। कुछ देर उन्हें अभी विरक्त न करें।' इतनी बाने सुन कर बुद्ध- बाद आनन्द बोले,--भगवन् ! आपके प्रवर्तित धर्म के देवने आनन्दसे कहा, 'हे आनन्द ! सुभद्रको मत रोको किसी विषय पर हम लोगों से किसीको भी मत उन्हें मेरे पास भाने दो।' बाद सुभद्रने उनके समीप नहीं है।