पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४४८

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राजसी-यथाधर्ममधर्मञ्च कार्याञ्चाकार्यमेव च। । गुण सबसे पहले बुद्धितस्वरूप प्रादुर्भूत हुआ था। अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ।। बहुत निर्मल होनेके कारण इसे महतत्व कहते हैं । इसे तामसीबुद्धि---अधर्म धर्ममिति वा मन्यते तमसावता । हृदयङ्गम करनेके लिये वर्तमान प्राणिनिचयकी बुद्धिका सर्वार्थान विपरीताश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥" वीजस्थान कहां है, यह विचारना होगा। इसरो देखा (गीता १८३०-३२) जायगा, कि समस्त विशेष विशेष बुद्धिका विकाशस्थान जिसके द्वारा प्रवृत्ति, निवृत्ति, कर्त्तव्य, अकत्तव्य, भय, अन्तःकरण है । प्रत्येक अन्तःकरण हरिहरमूर्तिकी अभय, बन्धन और मोक्षादि जाना जा सके, उसे | तरह द्विमूर्ति विद्यमान है । उसको एक मूति वा परि- सात्विकी बुद्धिः जिसके द्वारा धर्म, अधर्म, कार्याकार्यादि- माणका नाम मनन और अध्यवसाय तथा द्वितोयका को भलीभांति विना जाने सुने अन्यथा ज्ञान उत्पन्न हो, नाम अभिमान वा अह है। 'मैं' में हूं' 'वस्तु' 'वस्तु है' उसे राजसी बुद्धि और जिसके द्वारा अधर्मको धम! 'मेरा' 'मुझसे करने योग्य हैं', इत्यादि प्रकारके निश्चया- और अकर्त्तव्यको कर्तव्य समझा जाय, ऐसे विपरीत : त्मक विकाशको अध्यवसाय और ज्ञानशक्ति कहते हैं। भावप्रकाशक शानको तामसी बुद्धि कहते हैं। यह ज्ञानशक्ति सहजातरूपमें जीवनके अन्तरात्मामें निर• इष्टानिष्ट विपत्ति अर्थात् निद्रावृत्ति, व्यवसाय, समा-! न्तर संलग्न रहती है । ज्ञानशक्तिको समष्टि ही महान् धिता अर्थात् चित्तस्थैर्य, संशय और प्रतिपत्ति ये पांच है। महान् और पूर्णशान दोनों एक चीज है। बुद्धिके गुण हैं। ___सांख्यमें जिसे महत्तत्त्व और बुद्धितत्त्व बतलाया है, "शुश्रूपा श्रवणञ्चैव ग्रहणं धारण तथा। वही पूर्णज्ञानशक्ति है । जो महान् पुरुष महान बुद्धितत्त्व- उहोपोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्व ज्ञानञ्च धीगुणाः ॥" (हेम) से अच्छी तरह प्रतिविम्वित होते हैं वह महापुरुष शुश्रषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, ऊह, उपोह और अर्थ- सांख्योक्त सृष्टिकर्ता और पुराणादि शास्त्र के हिरण्यगर्भ, विज्ञान ये सात बुद्धिके गुण हैं। इसकी वृत्ति पांच हैं, ब्रह्मा, कार्यब्रह्म और ईश्वर हैं। यथा-प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति । भूलोक, घ लोक, अन्तरीक्षलोक, चन्द्रलोक, सूर्यलोक, नैयायिकोंने इस बुद्धिके दो भेद बतलाये हैं। अनुभूति प्रहलोक, नक्षत्रलोक और ब्रह्मलोक आदि समस्त पदार्थ और स्मृति । इन महान् पुरुषों के अधीन हैं। यह महत्तत्वनामक "विभुबुद्धर्थादि गुणवान् बुद्धिस्तु द्विविधा मता। व्यापक बुद्धि मेरा, तुम्हारा, उसका, चन्द्रलोकस्थ मनुष्य- अभुभतिः स्मृतिश्च स्यादनुभृतिश्चतुर्विधा । का, सूर्यलोकस्थ मनुष्यका, पशु पक्षीका ज्ञान है, इत्यादि प्रत्यक्षमप्यनु मितिस्तथोपमित शब्दजे ॥” (भाषापरिच्छेद) क्रमसे उस उस देहमें परिच्छिन्न हो कर विराज करतो बुद्धि दो प्रकारको है, नित्या और अनित्या । इनमेंसे है। हम लोग जिस प्रकार हस्तपदादिविशिष्ट देहके नित्या बुद्धि परमात्माकी और वह प्रत्यक्षप्रमात्मिका है। ऊपर 'मैं' और 'मेरा' यह अभिमान निक्षेप किये हुए हैं, अनित्या बुद्धि जीवकी है। स्मृति और अनुभवके भेदसे! उसी प्रकार हिरण्यगर्भ वा-ईश्वर सम्पूर्ण बुद्धितत्त्वकी इसके दो प्रकार हैं। फिर उनके भी दो प्रकार हैं, यथार्थ अन्तःकरण समष्टिके ऊपर 'मैं' और 'मेरा आदि अभि- और अयथार्थ । अनुभवके चार भेद हैं, प्रत्यक्ष, अनुमिति, मान निक्षेप किये हुए हैं। उपमिति और शब्दज । ( न्यायद०) सांख्यके मतसे हम लोगोंके जिस प्रकार नींद टूटने पर आंख खुलते त्रिगुणात्मिका प्रकृतिको प्रथम विकार है। इसे महत्तत्त्व न खुलते सहसा अज्ञानतमका अस्त और ज्ञानका उदय भी कहते हैं। | होता है, उसी प्रकार नितान्त दुर्लक्ष्य प्रलयरूप जगत् जब ___ प्रकृतिका प्रथम विकाश बुद्धितत्त्व है। आदिसर्ग- अपनी सुषुप्तावस्थासे उठा था, उसो समय प्रकृतिगर्भसे घालमे अरूसारी और अशरोरी आत्माके सन्निधिवशतः सूक्ष्म जगत्का अभिव्याक ( अंकुरस्वरूप), तमोभा- प्रोतके मध्य पहले पहल प्रस्फुरित होती हैं। सत्त्व- कारक, सृष्टिसामर्थ्ययुक्त भगवान् स्वयम्भ हिरण्यगर्भ