पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४५३

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१४७ संभोग करता है तथा सब समय आमोद प्रमोदरत प्रत्यधिदेवता विष्णु, धनिष्ठा नक्षत्रयुक्त द्वादशीमें रहता है, नित्यधनागम और समस्त कामनाये सिद्ध उत्पन्न, प्रामचारी, ५भप्रह, नीलवर्ण, सुवर्णद्रष्यस्वामी, होती हैं। अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा आदिका फल बत्तुलाकृति, शिशु, इष्टकगृहसंचारी, वातपित्तकफात्मक, विचार कर स्थिर करना होता है। ग्रहोंके अवस्थान- स्त्रीग्रह, प्रातःकालमें प्रथल, पक्षिस्वामी, सकल रसप्रिय भेदसे स्थूलफलको पृथकता होती है। है। (गृहयज्ञतत्त्व ) विंशोत्तरीय मतमें भी बुधकी दशा १७ वर्ष है।६ मतान्तरमें - सोम (चन्द्र) बुधका पिता और रोहिणो १८, २७ नक्षत्रमें जन्म होने पर बुधकी दशा होती है। : माता है। पुराणमें लिखा है--किसी समय चंद्र वृह- इस मतसे प्रत्यन्तर्दशा स्थिर कर फलका निर्णय किया स्पति पत्नी तारादेवीको हर कर ले गये। इस कारण जाता है । बुधको पोड़ा-घूण रोग, क्षिमता, शिरःपीड़ा, एक माया युद्ध हुआ। चंद्रके पक्षसे दैत्य दानव तथा रोग, अस्फुटवाक्य, स्मृति और वाकशक्तिहीनता, बहस्पतिके पक्षसे इन्द्रादि देव लडे। पृथ्वीकी प्रार्थना. वाकरोग, अजीर्ण, सदी और जिह्वारोग बुधके विरुद्ध से ब्रह्माने मध्यस्थ हो बुधसे तारादेवोके प्रत्यपर्णके लिये होनेसे होता है। । अनुरोध किया। इस समय तारादेवी गर्भवती थी। यह गोचरमें निम्नलिखितके अनुसार शुभाशुभ जाना' पुत्र किसका होगा, इसे जानने के लिये ब्रह्माने तारासे जाता है। बुध जन्ममें स्थित हो; तो बधन, द्वितीयमें पूछा । तारादेवीने उसको चन्द्रका पुत्र बतलाया। फिर धनलाभ, तृतीयमें वध और शत्रु भय, चतुर्थमें अर्थलाभ, किसीका मत है, कि बुधने वैवस्वत मनुकन्या इलादेवीके पंचममें असुख, षष्ठमें स्थानलाभ, सप्तममें बहु प्रकार साथ विवाह किया था। इलादेवीके गर्भसे पुरूरवाका शरीरपोड़ा, अष्टममें धनलाभ, नवममें पीड़ा, दशममें। जन्म हुआ । बुधने ऋग्वेदके मंत्र प्रकाशित किये थे। ये सुख, एकादशमें अर्थलाभ और द्वादशमें वित्तनाश होता सौम्य, रौहिणेय, प्रहसन, रोधन, तुङ्ग और श्यामाग है। प्रहके विरुद्ध होने पर-उसका दान, जप, होम, आदि नामोंसे ये प्रसिद्ध हैं। मंत्र और कवच धारण करना उचित है। ___ यह ग्रह (Acircury) सूर्यके अति सन्निकटमें अवस्थित बुधका दान-नील वस्त्र, स्वर्ण, कांसा, उरद, पीला है। इसका कक्षपथ पृथ्विी कक्षके मध्यभागमें सन्नि- फूल, अंगुर, हाथी दांत ये सब दक्षिणाके साथ दान वेशित होनेके कारण प्रति संध्यामें यह मानवको दृष्टि- करनेसे शुभ होता है। गोचर होता है। पृथ्वीकी अपेक्षा इसका आयतन छोटा ___ ये मौलसरी पुष्प द्वारा पूजित होनेसे प्रसन्न होते है। व्यास प्रायः ३१४० मील है । सूर्यको तुलनामें हैं। इनका होम करने में अपामार्गका समिध करना होता इसका परिमाण नियुतके दो अंशमात्र है। पृथ्यीकी है। इनकी दक्षिणा सोना है। मूलिकाधारणमें बरगद अपेक्षा इसका उत्ताप और आलोक ७ गुणा अधिक है। वृक्षको जड़ धारण करनी चाहिये। रत्नधारणके स्वीय कक्षपक्षमें भ्रमण करते करते यह ग्रह कभी कभी स्थानमें पद्मरागमणि धारण करना विधेय है। इनका सूर्यगोलोकक मध्यभागमें आ जाता है। इस समय सूर्य- स्तोत्र- बक्षमें एक गोलाकार दाग देखा जाता है जिसे अंग. "प्रियङ्ग कलिकाभ्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधं । रेजोमें Transit ol mercury कहते हैं। १८६१, १८६८ सौम्यं सर्वगुणोपेतं नमामि शशिनः मुतम् ॥" १८७८, १८८१, १८६१ और १८६४ ई०में पृथ्वी-वासियोंने (नवग्रहस्तोत्र ) सूर्यवक्ष पर इस प्रकार गोल बिंदु देखा था। प्रहयशतत्त्वमें लिखा है-बुध मगधदेशोद्भव, अनि २ सूर्यवंशीय राजविशेष । ३ कल्पयुक्तिके प्रणेता 'शजात, बागलदीर्घ, पीतवर्ण, वैश्यजाति, चतुर्भुज, एक कवि । ४ धेगवान् राजाका पुत्र । (भाग० ६।२।३०) वामोद्ध क्रममें चक्र, घर, खड्ग, और गदाधारी, सूर्यास्य, ५ मगधके एक राजा। ये ३६०० कलिसंवतमें विद्यमान सिंहवाहन और पीतवस्त्र, इसके अधिदेवता नारायण, | थे। (कुमारिकाखण्ड ) बुधगुप्त देखो।