पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४५४

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बुधकौशिक-बुधवार बुधकौशिक-रामरक्षास्नोलके प्रणेता। और रेवतीको गतिका नाम तीक्ष्ण है। मूला, पूर्वाषाढ़ा बुधगुप्त ---गुप्तवंशीय एक राजा। १६५ सम्वत् में उत्कीण और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में जो इसकी गति होती है, वह इनकी स्तम्भलिपि पाई गई है। योगान्तिक है। श्रवणा, चित्रा, धनिष्ठा और शतभिषा बुधचक (सं० क्लो० ) बुधस्य ग्रहविशेषस्य चक्र। बुध- नक्षत्रमें जो गति होती है उसे घोर तथा हस्ता, अमुराधा प्रहके अपनी राशिसे अन्यराशिमें सञ्चारके समय सत्ता- अथवा ज्येष्ठा नक्षत्रकी गतिको पाप कहते हैं। यही ईस नक्षत्रोंका शुभाशुभ शापकचक्र । प्रकार बुधको गति है। पराशरने उदयास्त दिवस छारा इसका गतिलक्षण भी निरूपित किया है। इसकी प्राकृत बुधचार (सं० पु० ) बुधस्य बुधग्रहस्य चारः संचारः । गति ४० दिन, मिश्र ३० दिन, संक्षिप्त २२ दिन, तीक्ष्ण वुधग्रहका शुभाशुभ शापक संचार । बृहत्संहितामें लिखा १८ दिन, योगान्त ६ दिन और पापगति ११ दिन है.--चन्द्रपुत्र बुध उत्पातशून्य हो कभी भी उदित नहीं होती है। होते । इनके उदयमें धान्यादि मूल्यके हास वा वृद्धिके ___जिस समय इसकी प्राकृत गति होती है, उस समय कारण अकसर जल, अग्नि अथवा तफान हुआ करता है। श्रवणा, धनिष्ठा, रोहिणी, मृगशिरा अथवा उत्तराषाढ़ा आरोग्य, वृष्टि, शस्यवृद्धि तथा मंगल होता है। संक्षिप्त तथा मिश्रगतिसे मिश्वफल होता और अन्य गतिओंसे नक्षत्रोंको मर्दित कर यदि बुध विचरण करे, तो रोगभय विपरीत फल होता है। तथा अनावृष्टि होती है। यह ग्रह आर्द्रासे लगायत मघा देवलके मतमें बुधकी गति चार प्रकार है--ऋजु, अति- पर्यन्त जिस किसी नभत्रका आश्रय करे, उसीसे शस्त्र- वक्र, वक्र और विकल। इन चार गतिके विद्यमानका पात, क्षुधा, भय, रोग, अनावृष्टि तथा संताप द्वारा प्रजा काल-३० दिन, २४ दिन, १२ दिन तथा ६ दिनमात्र है। अवपीड़ित होगी । हस्तासे ज्येष्ठा पर्यंत ६ नक्षत्रों में इसके जुगतिसे प्रजाका हित होता है, अतिवक्रगतिसे अर्थ विचरण करने पर गोपीड़ा, तैलादि रसोंकी मूल्यवृद्धि नाश, बक्रगतिसे शत्रभय तथा विकलगतिसे भय और नाना प्रकारके खाद्यद्रव्योंसे पृथिवी पूर्ण हो जाती और रोग होता है । पौष, आषाढ़, श्रावण, वैशाख है। उत्तर फाल्गुनी, कृत्तिका, उत्तर भाद्रपद तथा भरणी अथवा माघ मासमें यदि ये दीखें, तो जगत्में भय नक्षत्रमें इस ग्रहके विचरण करने पर प्राणियोंका धातुक्षय किन्तु अस्तमित हो, तो जगत्में शुभ होता है। इसका होने लगता है। यह यदि अश्विनी, शतभिषा, मूला, कार्तिक अथवा आश्विन मासमें दृष्टिगोचर होनेसे शस्त्र, तथा रेवती नक्षत्रोंको अभिमर्दित कर विचरें, तो पण्य, चोर, अग्नि, रोग तथा जलका भय होता है। बुधवारज्ञ वैद्य, नौकाजीवी, जलपदार्थ, तथा अश्वका उपाघात होता पण्डितोंका कहना है, कि इसके अस्त समयमें सव नगर है। पूर्वफल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा और पूर्व भाद्रपद इन तीन रुद्ध तथा उदयकालमें फिर वही नगर मुक्त हो जाते नक्षत्रों में किसी नक्षत्रको अभिमदित कर विचरण करने

हैं। कोई कोई कहते हैं, कि यदि पश्चिम दिशामें इनका

से क्षुधा, शस्त्र, तस्कर, रोग तथा भय.उपस्थित होता है। उदय हो, तो उन सब नगरोंमें शुभ होता है। इनका वर्ण पराशरने पहिले बुधकी सात प्रकारकी गति निर्दिष्ट सोने या सुग्गे अथवा शस्यकमणिके समान और स्निग्ध की है । यथा--१ प्राकृत, २ विमिश्र, ३ सक्षिप्त, ४ । होता है तथा स्वयं वृहत्काय होते हैं, उस समय सबोंका तीक्ष्ण, ५ योगान्त, ६ धोर, ७ पाप। मंगल अन्यथा अशुभ ही होता है। स्वाती, भरणी, रोहिणी तथा कृत्तिका नक्षत्रमें इस (वृहत्संहिता बुधाचार ७ अ.) नक्षत्रके रहनेसे प्राकृतगति होती है । मृगशिरा, आर्द्रा, रवि प्रभृति ६ प्रहोंमें नियमानुसार एक एक ग्रह मघा और अश्लेषा नक्षत्रस्थ बुधको गतिका नाम मिश्र वर्षपति होते हैं। इनमें इसके वर्षपति होने पर माया, पुष्या, पुनर्वसु, पूर्वफल्गुनी और उत्तर फल्गुनोको गतिका इन्द्रजाल, गांधर्ष, लेख्य, गणित और अखजाननेवालोंकी नाम संक्षिप्त पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद, ज्येष्ठा, अश्विनी बुद्धि होती है। राजा लोग प्रजाकी भलाई के लिये