पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४८७

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बेमावरू-बेकस बेभावरू ( फा० वि०) जिसकी कोई प्रतिष्ठा न हो, . राजवंशके परस्पर विरोधकालमें इस दुर्गकी प्रथम बेइजत। । प्रतिष्ठा हुई थी, ऐसा अनुमान किया जाता है। पीछे बेबी (फा० स्त्री०) निस्तेजता, मलिनता। वह सस्कृत हो इस प्रकार सुदृढ़ दुर्गमें रूपान्तरित हो बेभारा.( हिं० पु) एकमें मिला हुआ जौ और चना। गया है । पाश्नात्य भौगोलिक • Bitr: ( ने इस स्थान- बेओनी (हिं० स्त्री०) जुलाहोंका एक औजार। यह की समृद्धिका उल्लेग्न किया है। उनके विवरणमें यह प्रायः कंधोके आकारका होता है और तानेके सूतके वीच- नगर (otta kothlathi नामने वर्णित है। में रहता है। बेकली (हि.स्त्री०) बेकल होनेका भाव, घबराहट । २ बोईसाफी (फा स्त्री० ) अन्याय, साफका अभाव। स्त्रियोका एक रोग। इसमें उनका गर्भाशय अपने स्थान- बेइजत ( फा० वि० ) १ अप्रतिष्ठित, जिसको कोई : से कुछ हट जाता है। इसमें रोगीको बहुत अधिक प्रतिष्ठा न हो। २ जिसका अपमान किया गया हो,' पोड़ा होती है। अपमानित।

बेकस ( फा० वि०) १ निगश्रय, निःसहाय। २ दीन,

बेइजतो ( फा० स्त्रो० ) १ अप्रतिष्ठा ! २ अपमान। गरीव । ३ मातृ-पितृहोन, विना मा वापका । बेइलि ( हिं० पु० ) बेला देखो । बेकस - पाश्चात्य जगत्को प्राचीन जातियों द्वारा पूजित बेइल्म ( फा० पु०) जो कोई विद्या न जानता हो, जो कुछ : देवमूर्ति। प्राचीन ग्रीक लोगों के मध्य यह देवमूर्ति पढ़ा लिखा न हो। • जिउसके पुत्र देवनिम्मम, लाटिन जातिमें बेकस धेमान ( फा० वि० ) , जिसका ईमान ठोक न हो, जिसे : ( I'aceltic ) और मित्रवासियों में ओमिरिस नामसे धर्मका विचार न हो। २ जो अन्याय कपट या और किसी प्रसिद्ध है। पाश्चात्य जगत में बेकसके सम्बन्धमें जो प्रकारका अनाचार करता हो । किंवदन्ती प्रचलित हैं उसकी पर्याोनना करनेसे बेईमानी ( फा० स्त्री० ) बेईमान होनेका भाव। ऐमा प्रतीत होता है मानो उस समय बहुत बेकम विद्य- बेउन ( फा० वि०) जो आज्ञापालन अथवा और कोई मान थीं । दिवोदोरम और सिमिरो इस प्रकारको अनेक काम करने में कभी किसी प्रकारशी आपत्ति न करे। बेकसोंका उल्लेख कर गये हैं पर जिम वेकसका उल्लेख बेकदर (फा० वि० ) जिसकी कोई कदर या प्रतिष्ठा न हो, यहां किया जाता है उसने कादमसगज-ननया सिमिलीके बेइजत । गर्भ और जुपिटर गृहम्पनिक औरममे जन्मग्रहण किया बेकदरी ( फा० स्त्री० ) बेकदर होनेका भाव, बेइजती । है। मिमगेय किंवदन्तीका अनुसरण करनेसे जाना बेकनाट (सं० पु० ) कुषीदजीवी. सूदखोर । जाता है, कि युवगज येम एक दिन युवावस्थामें बेकग ( हिपु० ) पशुओंका खुरपका नामक रोग, नाक्षम द्रोपमें गाढ़ी निद्रानं सो रहे थे, इसी समय कुछ खुरहा। नाविक आ कर उन्हें चुगले गये। इस पर युवक बेकरार (फा० वि० ) व्याकुल, विकल । बड़े बिगड़े और उन्होंने नाविक-वलको श्राप दिया बेकरारी : फा० स्त्री० ) व्याकुलता, बेचैनी। जिससे वे सबके सब मछली हो गये। इसी जगहसे बेकल ---मन्द्राज प्रदेशके दक्षिण कनाड़ा जिलान्तर्गत एक बेकसको ऐशीभक्तिका परिचय पाया जाता है। उन्होंने प्राचीन नगर। यह अक्षा० १२.२४ उ० तथा देशा० अपने पुण्यबल और पिताको सम्मतिसे माता सिमिलीको ७५३ पू०के मध्य अवस्थित है। यहां एक सुवृहत दुर्ग नरकसे उद्धार कर स्वगंधाम भेज दिया। इस समयसे सुरक्षित अवस्थामें विद्यमान है। दुर्गका पर्यवेक्षण करने- वे साइवने नामसे मशहर हुए । अनन्तर येकसने पूर्वको से उसमें वर्तमान युरोपीय स्थापत्य-विज्ञानके अनेक चढ़ाई करके वहांके अधिवासियोंको द्राक्षाकर्षण और निदर्शन पाये जाते हैं। समुद्रगर्भमें जो एक शैल है। मधु आहरणकी शिक्षा दी थी। इस कारण वे मद्यपायो उसीके ऊपर यह दुर्ग स्थापित है । इफ्केरी और चेराक्कल कातिके देवतारूपमें पूजित हुए। बेकसके उत्सव अगिंज, Vol. xv. 121