पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४९२

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बैङ्गी-बेचराजा करके मेसन और अपरापर प्रत्नतत्त्वविदोंने यह मे प्रथम को पददलित कर डाला और बिडबल्ली ग्राममें चालुक्य- वर्षमें १८६५ नाघ्र और कुछ रौप्य मुद्रा तथा अंगूठी, : सेना परास्त हुई। चालुक्यराज ३य विजयादित्यने तायोज, कवच और अन्यान्य स्मृति निदर्शन पाये थे। गोविन्दके लिये मान्यखेरपुरीम जो दुर्गप्राचीरकी नीवं दूसरे वर्ष १६००, तीसरे वर्ष २५०० और बांथे वर्ष. डाली थी, उसे अमोघवर्ष ने ६४० ई में शेष कर डाला। १३४७४ और मवन अन्तमें अर्थात् १८३७ ई० को उन्हें एक दूसरी शिलालिपिके प्रमाणसे मालूम होता है. कि ६० हजार ग्रोक और रोमन, प्रीक वाहि , वाह्निक, हिन्दू पूर्वचालुक्यराज गुणक विजयादित्य ३य (८४४-८८८)-ने मारद, हिन्दु शक. शासनीय हिन्दू और हिन्द मुसलमानी रट्ट और गङ्गगजाओंको परास्त तथा राष्ट्रकूटराज श्य मुद्रा हाथ लगी थो । अध्यापक विलसनने अपने inianit कृष्णको परास्त करके मालखेड नगरको दग्ध कर डाला। Atitigun नामक ग्रन्थमें उन मध मुद्राओंसे अफगा- गजा २य कृष्ण यह अपमान बहुत दिन तक वहन कर न निस्तान, मध्यर्णशया और भारतका ऐतिहासिक सम्बन्ध सके। उन्होंने बोराजको लूट कर बदला चुका ही निरूपण किया है। स्थानीय प्रवाद है, कि इस नगरमें लिया। किन्तु पीछे चालुक्यराज १म भीमने निज यवनराजाओंकी राजधानी थो। कालचकसं यहां ऐसी : भुजबल मे पितृराज्यका उद्धार किया ! भयानक महामारी फैली, कि हजारों मनुष्य उसके १०१२ ई०में चोलराज राजराज देवने बेङ्गीदेशको शिकार बन गये और आग्विर यह नगर जनशून्य हो जोत कर वहां पञ्चवमहाराय नामक एक महादण्ड ध्वंसमें परिणत हो गया है। अभी हिन्दुओंने इसका नायक नियुक्त किया था। बलराम नाम गया है। अनन्तर कल्याण पश्चिम चालुक्य ६ठे विक्रमा- बेडो- दाक्षिणात्यका एक प्राचीन जनपद। पहले यह दित्यने इस नगर पर अधिकार जमाया ( १०७६११२६ करमण्डल उपकूल पर अवस्थित था। इसके पश्चिम ई० ।। इसी समय बेङ्गाराज राजीव वा कुलोत्तङ्ग चोड़- पूर्घघाट पर्वतमाला, उत्तर गोदावरी और दक्षिण में कृष्णा- देवने काञ्चीपुर गज्य पर चढ़ाई कर दी। राजा विक्रमा- नदी है। गोदावरी जिलेके इल्लार तालुककै बेगी वा ! दित्यके भाई २य सामेश्वरने गजेन्द्र चौड़फी सहायता पेड़वेगो ग्राभका ध्वंसावशेष ही प्राचीन घेङ्गी राजधानी की। इस संवादम विचलित हो गजा विक्रमादित्य दल- की नष्टकोनि समझा जाता है। बेगी देखा। वल के साथ आगे बढे । युद्ध में विक्रमादित्यकी ही जीत चालुपयराज श्य पुलकेशीके भाई कुजविणुवर्द्धनने हुई । राजीव जान ले कर भागे और सोमेश्वर बन्दी हुए । ६१७ ई में यहां पूर्व चालुकागजवंशकी प्रतिष्ठा की थी। बेङ्गोपुर बेङ्गानगर। तदनन्तर ७३३मे ७४७६०के मध्य पलव सेनापति उभय बेङ्गार. दाक्षिणात्यका पव. जनपक्ष। प.वराजाओंकी चन्द्रने अश्वमेधयक्षकारी नियाद-सरदार पृथ्वीव्याघ्रको दशनपुर प्रशस्तिमें इसका उल्लेख है । सम्भवतः बेङ्गी- परास्त कर उस बेङ्गीगज्यसे मार भगाया और पूर्व राज्य बेङ्गोराष्ट्र नामसे प्रसिद्ध था। चालुक्यराज ३य विष्णुवद्ध ननं गजा नन्दिवर्माको बेचक ( हि० पु० ) विक्री करनेवाला, बेचनेवाला । वश्यता स्वीकार की। इसके बाद ७६Eसे ८४३ ई० तक बेचना (हि० क्रि०) विक्रय करना, मूल्य ले कर कोई पदार्थ बेङ्गी-सिंहासन पर चालुक्यराज नरेन्द्र मृगराज श्य देना । विजयादित्य अधिष्ठित रहे । राष्ट्रकूटपति ३यवचराजी-बम्बई प्रदेशके बड़ौदा राज्यके पत्तन उप- गोविन्द इन्हें परास्त करके अपने राजाके समीप : विभागके अन्तर्गत एक प्रसिद्ध देवमन्दिर और तत्संलग्न लाये। उक्त बेङ्गाराज नोकरकी तरह गोविन्दके ! एक गण्डग्राम । यह अहमदाबाद जिलेके विरमगांव- निकट रहने लगे। पीछे उन्होंने मालखेड़ दुर्गप्राचोर से २५ मोलकी दूरी पर अवस्थित है। यहां प्रति वर्ष बनानेमें राजा गोविन्दको स्वासी मदद पहुंचाई थी। आश्विन माममें एक मेला लगता है । जिसमें २०-२५ ६३३ में राष्ट्रकूटराज १म अमोघवर्षने पुनः बेङ्गीराज्य- : हजार यात्रियोंका समागम होता है।