पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४९५

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बेडौल-बेतमङ्गला बेडौल (हिं० वि०) १ जिसका डौल या रूप अच्छा न विशेष ध्यान न हो, सीधासादा व्यवहार करनेवाला। २ हो, भहा । २ जो अपने स्थान पर उपयुक्त न जान पड़े, जो अपने हृदयकी वात माफ साफ कह दे। ( क्रि० वि०) बढेगा। ३ बिना किसी प्रकारके तकल्लुफके । ४ निस्संकोच बेढंग (हि.वि.) बेढंगा देखा । बेधड़क । बेढंगा (हिं० वि०) जिसका ढंग ठीक न हो, बुरे ढंग. बेतकल्लुफी ( फा० स्त्री० ) मरलता, सादगी। बाला। २ कुरूप, भद्दा । ३ जो ठीक तरहगे लगाया, ' वैतकसीर (फा० वि०) निरपराध, बेगुनाह । रखा या मजाया न गया हो। वेतङ्गा-बङ्गालके फरिदपुर जिलान्तर्गत एक ग्राम । यह बेढंगापन (हिं० पु.) बेढगे हानेका भाव । अक्षा० २३. उ० तथा देशा० ८६ ५७ पू० चन्दना नदीके बेढ़ (हिं. पु० ) १ नाश, बरबादो । २ वोया हुआ वह किनारे अवस्थित है। यहां चावल और उरदका विस्तृत बोज जिसमें अंकुर निकल आया हो । कारवार है। वेढ़ई ( हि० स्त्रो० ) वह रोटी या पूगे जिसमें दाल, पोठी येतना ( हि० कि० ) प्रतीत होना, जान पड़ना। आदि कोई चीज भरी हो, कचौड़ी। वंतवाद -बम्बईके खान्देश जिलान्तर्गत सिन्दखेत तालुक- बेढ़न ( हिं० पु० ) वह जिससे कोई चीज घेरो हुई हो। का एक शहर । यह अक्षा० २११३ उ० तथा देशा० बेढ़ना हिं० क्रि०) १ वृक्षों या खेतों आदिको, उनको रक्षा- ७४ १४ पूके मध्य विस्तृत है । जनसंख्या प्रायः के लिये चारों ओरसे टट्टी बांध कर अथवा और किसी ४०१४ है। शहरमें १८६४ ई०को म्युनिस्पलिटी स्था- प्रकार धेरना। २ चौपायोंको घेर कर हांक ले जाना। पित हुई है। यहां एक स्कूल है। बेहव ( हिं० वि० ) १ जिसका ढव या ढंग अच्छा न हो। बतबोलू मन्द्राज प्रदेशके कृष्णा जिलान्तर्गत एक प्राचीन २ जो देखने में ठीक न जान पड़े, भद्दा । ( क्रि० वि०) नगर। यह नन्दिग्राम तालुक सदरसे १५ मोल उत्तर- ३ अनुचित या अनुपयुक्त रूपसे, बुरी तरहसे। पश्चिममें अवस्थित है। इस नगरके निकटवती शैल बेढ़ा (हिं. पु० ) १ घरके आस पास वह छोटा-सा पर जो सुवृहत् ध्वंसावशेष पड़ा है, उसको गठनप्रणालो घेरा हुआ स्थान जिसमें तरकारियां आदि बोई जाती हों। की पर्यालोचना करनेसे वह बौद्धस्तूप सरीखा प्रतीत २एक प्रकारका गहना जो हाथमें पहना जाता है। होता है। उसका व्यास प्रायः ६६ फुट है और चारों बेढ़ाना (हिं० क्रि० ) १ घेग्नेका काम दूसरेसे कराना, ओर भास्करशिल्प मर्मरपत्थर विमण्डित है। उसके घिरवाना। २ ओढ़ाना। चारों बगल प्राचीन समाधियोंके ऊपर बहुसंख्यक प्रस्तर बेणीफूल ( हिं० पु. ) एक प्रकारका गहना जो सिर पर निर्मित चक्र दृष्टिगोचर होते हैं। एक चक्रके नीचे एक पहना जाता है। इसका आकार फूल-सा होता है। इसे घाड़ को कुछ हड़ियां पाई गई हैं जिन्हें देख कर अनुमान सीसफूल भो कहते हैं। किया जाता है, कि समाधिके पहले घोड़े को दो वण्ड बतंचेरुबू-मन्द्राजप्रदेशके कल जिलान्तर्गत नन्द्याल करके गाड़ा गया था। क्योंकि घोड़े के मस्तककी हड्डी तालुकका एक गण्डग्राम। मानचित्रमें यह वैभुमचेल दूसरी जगह रखी हुई है और उम गढेके चारों कोने में नामसे लिखा गया है। यहांके आञ्जनेय मन्दिरमें १४७० चार बड़े बड़े पात्र रखे हुए हैं। घोड़े की वह हड्डी शक और १४६७ ई०में उत्कीर्ण दो शिलाफलक देखे अभो आक्सफोर्ड नगरीके Ashmolcan Muscuni गृहमें जाते हैं। वे दोनों फलक विजयनगर-राज सदाशिवके सुरक्षित है। राज्यकालमें किसी राजवंशीयसे दिये गये थे। एतद्भिन्न बेतमङ्गला --दाक्षिणात्यके महिसुरराज्यके कोलरजिलान्तर्गत प्रामके अन्यान्य स्थानों में और भी कितनो शिलालिपियां । एक तालुक । भूपरिमाण २६८ वर्गमील है । पालर नदी इस देखी जाती हैं। उपविभागके मध्य हो कर बहती है। इस उपविभागके बेतकल्लुफ (हिं० वि० ) १ जिसे ऊपरी शिष्टाचारका पश्चिम स्वर्णमयीभूमि और माकु पम् प्रामके निकट सोमेकी Vol. xv. 123