पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४९७

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बे-तारका तार ४६१ भेजनेके लिये दीर्घ और स्थूल स्फुलिङ्ग उत्पादनकारी हैं,---इसके ठोक मध्यभागमें कुछ नरम लाहेके तार बहुत यन्त्रको आवश्यकता है । स्फुलिङ्ग जितना हो दीर्घ होगा, मजबूतोसे बडलमें बधे रहते हैं। इस लोहेके तारका इथरमें उतने ही जोरसे आघात करेगा और इथरतरंग यह गुण है, कि जब इसके चारों ओर ताडित् प्रवाहित उतनी हो अधिक दूर जायगी। फिर स्फुलिङ्ग जितना होती है, तब इससे चुम्वकशक्ति निकलती है। फिर स्थल होगा, इथरसे उतने ही अधिक परिमाणमें तरङ्ग ताड़ितप्रवाहके बंद होते हो चुम्बकशक्ति गायब हो जाती निकलेगी। दूर स्थानमें संवाद भेजनेके लिये दोनों ही है। ताड़ितप्रवाहको उत्पन्न करनेके लिये इस बंडलके चीजोंको जरूरत है-इथर तरङ्गका अधिक दूर जाना और ऊपर रेशम-मंडित तावेके तार जड़े रहते हैं। इस तारके तरङ्गका परिमाण भी अधिक होना। अतएव इनडाक- दोनों छोरको वैटरीके साथ संयुक्त कर देनेसे इसमें सन कायेल खरीदनेके पहले यह देखना होगा, कि इससे ताड़ित प्रवाहित होती है । इस तारका नाम है प्राइमरी दोनों उद्देश्य सिद्ध होंगे या नहीं। , कायेल ( Irinary Coil )। पहले ही कहा जा चुका है, कि यन्त्रसे जितना ही इस प्राइमरी कायेलके ऊपर बहुत बारीक और लंबे लम्बा ताड़ित स्फुलिङ्ग निकलेगा, उतनी हो अधिक दृर रेशम-मण्डित तांब के तार जड़े होते हैं जिसे सेकण्डरी तक संवादादि भेजे जायंगे। साधारणतः एक इश्च । (Sterliary onl ) कहते हैं। जिससे प्राइमरी और ताड़ित् स्फुलिङ्ग द्वारा एक मील तक संवाद भेजा जा सेकेण्डरी कायेलकी ताड़ित एक दूसरेमें न जा सके इस- सकता है। इस अनुपातसे २० मीलके लिये २० इञ्च के लिये दोनों कायेलके मध्यभागमें ताड़ित-अपरिचालक स्फुलिङ्गकी जरूरत हो सकती है, पर यथार्थमें उतने दीर्घ इबोनाइटकी चुंगी दी हुई रहती है। इसी सेकेण्डरी स्फुलिङ्गकी जरूरत नहीं होती । ६ इञ्च स्फुलिङ्गके कायेलके दोनों छोरोंसे पूर्वकथित ताड़ित स्फुलिङ्ग निक- द्वारा २० मील तक संवाद भेजा जा सकता है। यहां लते हैं। पर यह भी कह देना आवश्यक है, कि केवल स्फुलिङ्गकी इनडाकसन कायेलमें एक जगह पीतलका स्प्रिंग और दीर्घताके ऊपर दूरीका परिमाण निर्भर नहीं करता, दूसरी जगह पीतलका स्तम्भ रहता है। स्प्रिंगके अग्र- यन्त्रके भिन्न भिन्न अंशक निर्माण-कौशलके ऊपर भी भागमें लोहेका एक खण्ड और स्तम्भके अग्रभागमें आंशिक परिमाणमें निर्भर करता है-फिर स्थानके ऊपर स्क्र बैठाया हुआ रहता है। स्क्र बड़ी होशि- भी बहुत कुछ निर्भर करता है। सामनेमें राधा पड़नसे यारोमे स्प्रिंगके साथ मिला होता है। इस यन्त्रमें एक इथर-तरङ्ग बहुत दूर तक नहीं जा सकती । यही कारण अंगका नाम कनडेंसर (Conclenscr) है जिससे ताडित- है, कि समुद्रकी जलराशिके ऊपर जितनी दूर तक संवाद शक्तिकी अधिक परिमाणमें वृद्धि होती है। कुछ टीन- भेजा जा सकता है, पर्वतादि समाकीर्ण स्थलभूमिमें उतनी के पत्तर ( Tin soil ) और पैरेफिनयुक्त कागज इस दूर तक भेजने की आशा कभी नहीं की जा सकती। यहां प्रकार सजे रहते हैं जिससे प्रत्येक पत्तरके बाद ही एक पर एक मील पर्यन्त संवाद भेजनके उपयोगी यन्त्रादिका एक कागज पड़े। फिर जोड़ और बेजोड़ नम्वरके पत्तर विषय वर्णन किया जाता है। एक माथ पृथक् पृथक् संयुक्त किये रहते हैं । इस कारण एक मील दूर संवाद भेजनेमें एक इञ्च ताडित स्फु- जोड़ नम्बरके पत्तरके साथ बेजोड़का स्पर्श नहीं होता। लिङ्ग उत्पादनकारी इनडाकसमकायेलकी जरूरत है। कनडेन्सर साधारणतः इनडाकसन कायेलके बकसके तारविहीन टेलिग्राफके यन्त्रों से यह अधिकतर निम्नभागमें रहता है। मूल्यवान है। इसका संग्रह कर सकनेसे अन्यान्य अंश उक्त अंशोंके अलावा 'की' (Key) और बैटरी भी रहती आसानीसे संग्रह किया जा सकता है अथवा अपने हाथ- है। 'की'के ऊपर दबाव डालनेसे इसके दोनों अंश मिल से उन्हें थोड़े ही खर्चमें बना भी सकते हैं। जाते हैं जिससे ताड़ित बैटरीसे इनकसन कायेल में इनडाकसम कालके भिन्न भिन्न अंश इस प्रकार प्रवेश करतो है।