पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५०३

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४६७ बेम-पीर जातिका पहाडी बांस।' यह प्रायः लताके समान होता | बेनीपान (हिं० पु. ) बेंदी देखो। है। इसकी टहनियोंसे लोग छप्परोंकी लकड़ियां आदि बेनीप्रवीण-लखनऊके रहनेवाले एक भाषा कधि। पे बांधते हैं। जातिके कान्यकुब्ज वाजपेयी ब्राह्मण थे। इनका जन्म वन ( हिं० पु०) १ बंशी, मुरली । २ सपेरोंके बजानेकी सम्वत् १८७६में हुआ था। इनकी कविता बहुत ही तूमड़ी, महुवर। ३ बाँस। ४ एक प्रकारका वृक्ष । अच्छी होती थी। इनका बनाया नायिका विषयक बेन (अं० पु०) १ जहाजके मस्तूल पर लगानेकी एक ग्रन्थ देखने योग्य है। प्रकारको झंडी। इसके फहरानेसे यह पता चलता बेनीसिंह-एक प्रन्य-रचयिता। इनका जन्म सम्वत् है, कि हवा किस रुखकी है। २वायु, हवा । १८७६में हुआ था। ये हिन्दी साहित्यके अच्छे मर्म बेनजीर ( फा०वि०) जिसकी कोई समता न कर सके। थे। ये कविजनोंकी खूब खातिर करते थे। इनका अनुपम । देहान्त १९४१ संवत्में हुआ। बेनट ( हि० स्त्री० ) लोहेकी वह छोटो किर्च जो सैनिकों- बेनु ( हिं० पु० ) १ वेणु देखा । २ बशो, मुरली । ३ वंश, की बदूकके अगले सिरे पर लगी रहती है, संगीन। बांस। बेनसेढ़ (अ० पु० ) जहाजके काममें आनेवाला एक बेनुली ( हिं० स्रो० ) जाते या चक्कीमें वह छोटी-सी प्रकारका बड़ा थैला । यह टाट आदिका बना हुआ नलके लकड़ी जो किल्लेके ऊपर रखी जाती है और जिसके माकारका होता है। इसकी सहायतासे जहाजके नोचेके दोनों सिरों पर जोती रहती है। भागोंमें ऊपरको ताजी हवा पहुंचाई जाती है। बनौटी (हिं० वि०) १ कपासके फूलकी तरह हलके पोले बना ( हि० पु.) १ एक प्रकारका छोटा पंखा जो रंगका, कपासी। (९०) २ एक प्रकारका रंग जो कपासके बांसका बना होता है। २ उशीर, खस। ३ वश, बांस। फूलके रङ्गका-सा हलका पीला होता है, कपासी। ४ माथे पर बदीके बीचमें पहननेका एक प्रकारका बे परद (फा० वि० ) १ अनावृत, जिसके ऊपर कोई परदा गहना। न हो। २ नग्न, नंगा। बेनागा (हिं० क्रि० वि० ) नित्य, लगातार । बेपरवा ( फा० वि०) १ जिसे कोई परवा न हो, बेफिक । बोनिमून (फा०वि०) अद्वितीय, अनुपम । २ जो किसीके हानि-लाभका विचार न करे और केवल बेनी (हिं० स्त्री० ) १ त्रियोंको चोटी। २ भादोंके अन्त अपने इच्छानुसार काम करे, मनमौजी। ३ उदार । या कुवारके आरम्भमें होनेवाला एक प्रकारका धान । बेपरवाही (फा० स्त्री० ) १बेपरवाह होनेका भाव ३ गङ्गा, सरस्वती और यमुनाका संगम, त्रिवेणी। ४ बेफिकरी। २ अपने मनके अनुसार काम करना। किवाडीकी वह छोटो लकड़ी जो उसके किसी पल्लेमें | बेपर्द (हिं० वि०) बेपरद देखो। लगी रहती है। यह दूसरे पल्लेको खुलनेसे रोकती है। बेपार ( हिं० पु०) हिमालयकी तराईमें ६०००से ११००० बेनी-१ एक भाषा-कवि। ये असनी जिला फतेहपुरके फुटको ऊचाई तक अधिकताले मिलनेवाला एक प्रकार- निवासी थे। इन्होंने संवत् १६६० में जन्मग्रहण किया का बहुत ऊंचा वृक्ष। इसकी लकड़ी यदि सीडसे बची था। इनकी कविता बहुत ही सरस, सरल, मधुर और रहे, तो बहुत दिनों तक ज्योंकी त्यों रहती है और प्रायः ललित है । स्फुटकवित्त तथा इनका रचा नायिका भेदका इमारतमें काम आती है। इस लकड़ीका कोयला बहुत एक अत्युत्तम प्रन्थ पाया जाता है। तेज होता है और लोहा गलानेके लिये बहुत अच्छा २ रायबरेली जिलेके निवासी एक कवि। इनका समझा जाता है। इसको छालमें जंगलोंसे झोपड़ियाँ जन्म सं० १८४४में हुआ था। ये लखनऊके नवाबके | भी छाई जाती हैं। दीवान महाराज टिकैतरायके यहां रहते थे। सम्बत् बेपारी (हिं० पु० ) व्यापारी देखो। १८६२में ये परलोक सिधारे। | बेपीर (फा० वि० ) १ जिसके हृदयमें किसीके दासाके Vol. xv. 125