पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५१

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फणिचम्पक-फतवा पल्ला होता है। इसमें भिन्न भिन्न स्थानों पर नक्षत्रोंके नाम फणिफेन ( स० पु० ) फणिनां फेन-इव उप्रगुणत्वात् । लिखे रहते हैं। इन सब नक्षत्रोंका वेध देख कर विवाह- अहिफेन, अफीम। का शुभाशुभ निर्णय किया जाता है। इस चक्रके पृष्ठमें फणिभारिका ( म० स्त्री० ) कृष्णोदुम्बरवृक्ष, काले गूलर- १, ६, ७, १२, १३, १८, १९, २४, २५ नक्षत्र और मध्यमें का पेड़ । २, ५, ८, ११, १४, १७, २०, २३ और २६ नक्षत्र तथा फणिभुज ( म० पु० ) फणिमं भुन भुज-क्विप् । पन्न- क्रोडमें ३, ४, ६१०, १५, १६, २१, २२, २३ नक्षत्र संस्थित गासन, गरुड़। है। इस चक्रसे विवाहके समय वर और कन्याकी नाड़ी- फणिमुक्ता (म० स्त्री० ) मुक्ताभेद, मांपकी मणि । का मिलान किया जाता है। पर यदि वर और कन्या __ मुक्ता देखो। दोनों एक ही राशिके हों, तो इस चक्रका मिलान नहीं फणिमुग्व ( स० क्ली० ) फणिन इव मुग्वमस्य । प्राचीन होता। कालका चोरोंका एक प्रकारका औजार जिससे वे सेध फणिचम्पक ( सं० पु० । वनचम्पकवृक्ष, जंगली चम्पा। लगानेके समय मट्टी खोद कर फेकते थे । फणिजा ( स० स्त्री० ) फणीव जायते जन-छ। फणि- ' फणिलता ( म० स्त्री० ) नागवल्लीलता, पान । मनसावृक्ष, एक प्रकारको तुलसी जिसकी पत्तियां बहुत फणिवल्ली ( सं स्त्री० ) फणीव दीर्घा वल्ली। नाग- छोटी होती हैं। वल्ली। फणिजिह्वा ( स० स्त्री० ) फणिजिन आकृतिरस्त्यस्य फणिसम्भारा ( स० स्त्री० ) कृष्ण उदुम्बर, काला गूलर । इति अच। १ महाशतावरी, बड़ो सतावर। २ महास- फणिहन्त्री (स० स्त्री०) फणिनो हन्त्रीति हन् तृच, ङोप । मङ्गा, कंगहिया नामक ओषधि ।। गन्धनाकुली, नेउरकंद। फणिजिलिका ( स० स्त्री० ) १ श्वेत शारिवा, कंगहिया फणिहारी ( म० पु० ) कपिकच्छु । नामक ओषधि। २ महाशतावरी, बड़ी सतावर। फणिहत् ( स० स्त्री० ) फणिना हति स्यगन्धेन अप- फणिज्झक ( सं० पु०) फणिनामुझकः, वहिष्कारक । सरायनीति ह-किप तुगागमश्च । क्षद्र दुगलमा, जवासा । उत्पादक इति यावत् पृषोदरादित्वात् साधु, फणितुल्य फणी ( सं पु० । फणिन् देग्यो। बहुपत्रपुष्पवत्त्वात् यथात्व। १ क्षु द्रपल तुलसी, छोटे फणीन्द्र (सं० पु.) फणिनां इन्द्रः । १ शेष । २ वासुकि । पत्तेकी तुलसी। २ श्यामा तुलसो। ३मधुर जम्बीर, ३ बड़ा माप । मीठा नीबू। ४ पलाशवृक्ष । ... फणीयम् ( सं क्ली० ) पद्मकाष्ठ । फणित ( सं० वि०) फण-गतौ-क्त। १ गत । २ निःस्ने- फणीश ( स० पु० ) फणिनामीशः। सर्वेश्वर । फणीन्द्र देखो। फणितल्पग (सं० पु. ) फणी शेष इव तल्प फणितल्पं फण्ड ( स० पु० ) फणति फण-गतौ उ (नमन्तात् ड । तस्मिन् गच्छतीति गम-उ। विष्णु। भगवान् विष्णु। उण १।११३ ) जठर ।। कल्पान्तमें अनन्तशय्या पर सोते हैं, इसीसे इनका फणि- फतनाराज गुजरोंका एक प्रसिद्ध दलपति। सिपाही- तल्पग नाम पड़ा है। विद्रोहके समय शाहरानपुर अञ्चलमें इन्होंने अङ्गारेजोंको फणिन् (सं०पु०) फणास्त्यस्येति फणा (बोहादिभ्यश्च । तंग तंग कर डाला था। आखिर १८५७ ई०के जनमास- पा ५।२।१३) इति इनि। १ सर्प, सांप। २ सर्पिणी में ये अङ्रेजोंसे अच्छी तरह परास्त हुए। नामक ओषधि । ३ केतु नामक ग्रह । ४ सीसक, सीसा। फतवा (अ० पु०) मुसलमानोंके धर्मशास्त्रानुसार व्यवस्था ५मरुवक नामक ओषधि, मरुवा। जो उस धर्मके आचार्य वा मौलवी आदि किसी कर्मके फणिपति ( स० पु. ) फणीन्द्र देखो। अनुकूल वा प्रतिकूल होनेके विषयमें देते हैं। फणिप्रिय (सं००) वायु, हवा । फतवा--फतुआ देखो। Vol. XV. 12