पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५२६

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बाधगया द्रम' नामसे प्रसिद्ध है। ललितविस्तर पढ़नेसे जाना किनारे यह प्राचीन ग्राम उस समय गुल्मलतादिसे परि- जाता है, कि सम्राट अशोक (प्रियदशों )के बुद्धदेवका पूण था । शाक्यमुनि जिस समय जगत्क्लेशको दूर स्मृतिचिह्नसमूह संस्थापन करनेमें यत्नवान होने पर उप- करनेकी इच्छासे प्रगाढ़ चिन्तामें मग्न थे, उस समय दुष्टः गुप्तने उन्हें शाक्यसिंहका समाधिस्थान निरूपण कर बुद्धि ग्राम्य बालकगण उनके पवित्र गान पर धूलिवर्षण दिया। अशोकने भी इस महाबोधिमन्दिर-स्थापनके लिये करते थे। एक लाख स्वर्णमुद्रा प्रदान की। उरुबिल्वा (वर्तमान । बोधिसतत्त्व गयाशीर्ष पर्वत पर आ कर घूमते घूमते उरेल) प्रामके सीमान्त पर यह महामन्दिर स्थापित हुआ : उमविल्या ग्राम पहुंचे। वे इस स्थानकी रमणीयता पर था। शाक्यसिह वानप्रस्थाश्रमका अवलम्बन कर इस मुग्ध हा गये और मुक्ति-साधनका प्रकृतस्थान जान कर उरुबिल्बाके अन्य बनप्रदेश में रहते थे । ललितविस्तरमें वहां रहने लगे। नन्दिक नामक एक सेनापति उस समय इसका विशेष विवरण मिलता है। नैराशना नदोके इस ग्राम पर आधिपत्य करते थे। उनकी धर्मपरायणा- कन्या सुजाता प्रतिदिन शाक्यसिहको पायसान दिया उल्लिखित होने पर भी यह प्राचीन नहीं जान पड़ता । कारण किसी करती थी। भी प्राचीन बौद्ध या हिन्दूग्रन्थमें बुद्धगयाका नाम नहीं है। प्राचीन यह स्थान बुद्धदेवका प्रोतिकर रमणीय और बाल. शिलालिपि और चीन-परिव्राजकोंक भ्रमणावृतान्तमें यह स्थान जनपरिशाभित होने पर भी कालक्रमसे यह पवित्र तीर्थ 'महाबोधि' नामसे प्रसिद्ध है। आईन-इ-अकबरी पढ़नसे जाना नष्टप्राय हो गया था। राजपुत्र शाक्यसिंह यहां आ कर जाता है, कि हिन्दूका पवित्र तीर्थ गयाक्षेत्र उस समय ब्रह्मगया | उरुबिल्व-काश्यपके आश्रममें पधारे + | सिहलदेशीय नामसे विख्यात था। बौद्धधर्मका लोप और ब्राह्मण्यधर्मकी पुनः प्रतिष्ठा होनेसे हिन्दुओंने ( बुद्धका अवतारत्व स्वीकार कर )

  • "रमणीयान्यरण्यानि बनगुल्माश्च वीरुधः।

ध्वंसप्राय इस बौद्धतीर्थका पङ्कोद्धार कर धीरे धीरे उसे जनसमाज प्राचीन उरुविल्बायां यत्र नैरञ्जना नदी॥" में प्रचार किया और ब्रह्मगयासे इसका भेद निरुपणार्थ बुद्धगया. (ललितविस्तर) नाम रख दिया। महाबोधि मंदिर और बाधित उरेन ग्रामके • "ये ग्रामदारकाच गापानाः काष्ठहारतृणहाराः। उत्तर ही अवस्थित है। किंतु गयाधाममें दक्षिणाभिमग्व इमको पांशु पिशाचकमिति मन्यनते पांशुना च म्रक्षन्ति ॥" दूरी प्रायः छः मील है। ( ललितविस्तर) वीं शताब्दीमें चीनपरिव्राजक यूएनचुअङ्गने महावाधि बिहार "इति हि भिक्षवा बोधिसत्त्वा यथाभिप्रेतं गयायां विहृत्य और महाबाधि-सद्धाराम शब्दसे मंदिर तथा मठकी स्वतंत्रता निरु . गयाशीर्षपर्वते जंघाविहारमनुचंक्रम्यमाणो येनारुविल्वासेनापतिक- पणा की है। उक्त शताब्दीमें अपगपर चीन परिव्राजकगण भी ग्रामकस्तुदनुन तस्तदनुप्राप्ताऽभूत् । तत्राद्राक्षीनदी नरजनाम- यही नाम लिख गये हैं। (Ind. Ant, X, 190-92) राजा कछोदका सूपतीर्थ्यां प्रासादिकञ्च द्रमगुल्मैरनंकृता समंतरञ्च गोचर- धर्मपालके ८५० ई० में, राजा अशोकवल्लके ११५७ ई०में और ग्रामाम् । तत्र खल्वपि बोधिसत्त्वस्य मनोनीऽव प्रसन्नमभूत् ॥ १३०२से १३३१ ई० में उत्कीर्ण शिनाफनकसमूहमें शाक्यमुनिका । समां बतायं भूमिप्रदेशो रमणीयः प्रतिसंलयनानुरूपःपर्याप्तमिदं बुद्धत्वप्राप्तिस्थान 'महाबोथि' नाममे ही उलिखित हुआ है। । प्रहाणार्थिककुन पुत्रस्याहश्च प्रहाराणार्थ यन्न वहमिहेव तिष्टेयम् ॥" बुद्धदेव अश्वत्थ ज्ञके नीचे बैट बोधिमार्ग पर चढ़े थे इसीलिये यह (नलितविस्तर) वृत्त बोधि वा महाबोधि नामसे वित्र्यात है। ___ + Manual of Buddhism, p. 159, तोनों भाई __* ईस्वी सन् १५०के पहले उत्कीर्ण भर्तुत शिनाफलकमें काश्यपके मध्य ये उरुविल्वामें वास करनेके कारण उरुविल्व भी यह वृक्ष 'बोधि' नामसे उल्लिखित है। यूएनचुअङ्गसे ही कहनाय । बुद्धदेवके आगमनके समय ये अमिके उपासक थे। महाबोधि, बाधिद्रुम और बाधिमण्ड तथा राजा धर्मपालकी शिमा.। इनके और दो भाइयोंकी गया और सरित् आख्या थी। सुजाता- लिपिमें 'महाबोधि-निवासिना' ऐसा प्रयोग देग्वनेमें आता है। की एक सखीका नाम भी उलुबिल्लिका था।