पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५३३

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बौछाड़-बौद्धधर्म ५२७ बौछाड़ (हि. स्त्री० ) १ वायुके झोंकेसे तिरछी आती स्वीकार नहीं करते, किन्तु वे कर्मफलको अपने धर्मतत्त्व- हुई बूदोंक समूह, झटास । २ लगासार बात पर बात जो का सार मानते हैं। जीव या आत्माका यह धर्म बौद्ध. किसीसे व ही जाय। ३ वर्षाको बूंदोंके समान किसी मनोविज्ञानका सम्पूर्ण विरोधी होने पर भी उम समय- वस्तुका बहुत अधिक संख्यामें कहीं भा कर पड़ना। ४ के वेदान्त और योगतस्वके प्रचारविषयके निदर्शन स्वरूप- बहुत-सा देते जाना या सामने रखते जाना। ५ व्यंग्य- . में बौद्धोंको धर्म नोतिमें स्थान मिला था। पूर्ण वाक्य जो किसीको लक्ष्य करके कहा जाय, ताना। बौद्धधर्म के आविर्भावके समय शिक्षित और चिन्ता- बौछार ( हि स्त्री०) बौछाड़ देखो। शील भारतवासोकी पारलौकिक मुक्तिचिन्ता गभीर बौड़हा ( हिं० वि० ) पागल, बावला। दुश्चिन्ता ( बौद्धमतसे सम्वेग ) में परिणत हुई। तब घे बौता (हिं० पु० ) समुद्रमें तैरता हुआ निशान, तिरौंदा। किम आदर्शका लक्ष्य कर धर्म और नीनिके पथ पर अग्र बौद्ध (स' क्ली) बुद्ध न प्रणीतं बुद्ध-अण। १ बुद्धकृत मर हुए थे, उमकी आलाचना करनेसे जान पड़ता है, निरोश्वर शास्त्र। मत्स्यपुराणमें लिखा है, कि वृहस्पति कि उस समय सभी कष्टमय जीवनको यन्त्रणा, वाई क्य इस शास्त्रके प्रवत्तक थे। ( मत्स्यपु० २४ अ.)२ बुद्ध. तथा मृत्युको आशङ्कासे उर गए थे। बारम्बार जन्म- मतावलम्बी धर्मसम्प्रदाय । बुद्धशास्त्र वेत्ति अधोते . परिग्रहके भयने उनको इस पीडादायक चिन्ताको और वा अण्। (वि० ) ३ बुद्धशास्त्राध्यायी। ४ बुद्धशास्त्र. भो भयानक बना दिया था। सभी सम्प्रदायकं मनुष्य वेत्ता। पर्याय -भिन्नक, क्षपण, अहोक, वैनासिक। उस समय जीवन को अत्यन्त गुरुभार समझते और इसी बौद्धधर्म --भगवान बुद्ध द्वारा प्रवर्तित धर्म। भगवान : को ही मानवजीवनके एकमात्र अविमिश्र दुःश्वका कारण शाक्यबुद्धके भक्त जिस धर्म के अनुसार चलते हैं, वही . मानने थे। इसीलिए सभी पुनर्जन्म या 'संसारयन्त्रणा' बौद्धधर्म है। __ से मुक्तिलाभ करने में व्यतिव्यस्त थे। सवोंका या दृढ़ बौद्धधर्मकी उत्पनि । विश्वास था, कि पुनर्जन्मनिवारणके विभिन्न उपाय हैं भारतवर्ष में बौद्धधर्म का आविर्भाव कबसे हुआ, उमका और उनका अनुष्ठान करनेसे ही मुक्ति लाभका पथ प्रशस्त ठोक ठोक पता लगाना कठिन है। पर हां, इतना स्थिर होता है। अज्ञान या अविद्याको पराजय और श्रेष्टतम हो चुका है, कि उपनिषद्युगके अवसानके साथ ही साथ सत्य । सम्बोधि ) का लाभ करना हो इम पथाश्रयका बौद्धधर्मका आविर्भाव हुआ। कारण, बौद्धधर्मके त्रिपिटक एकमात्र उपाय है। बैदान्तिकोंका कहना है, कि परमा और सूत्रको पर्यालोचना करनेसे साफ साफ: मालूम होता. त्मा और जीवात्माके एकान्त भावमें एक साथ है. कि उस समय उपनिषत् या वेदान्तमत उन्नतिको चरम. संश्रयका नाम सत्य या तत्त्वज्ञान है। सांख्य सीमा पर था। योगसाधना वेदान्तका अङ्ग नहीं होने : वादी कहते हैं, कि आत्मा अनन्त तथा विशुद्ध है और पर भी यथार्थमें वैदान्तिकोंने उसकी पूर्णाङता सम्पादन भूत या तत्त्वसे सम्पूर्ण विच्छिन्न है। आत्मा देहावच्छिन्न करनेमें विरुद्धमत प्रकाश नहीं किया है। योगसूत्रकार रहने पर भी कदापि पवित्रता नष्ट नहीं करती । बौद्धगण पतञ्जलिके समयमें योगधर्मकी जितनी उन्नति तथा पुष्टि आत्मा या परमात्मारूप किसी पदार्थका अस्तित्व हुई थी, बुद्धदेवके आविर्भावकालमें उतना जनसमाजमें स्वीकार नहीं करते। प्रचार न रहने पर भी योगचर्या जो भिक्षु या आर्यसत्य । संन्यासिसमाजमें विशेष भागत और अनुष्ठित थीं, यह सम्बोधि लाभके बाद महात्मा शाक्यबुद्धने आय- प्राचीन बौद्वप्रन्थादिकी आलोचना करनेसे स्पष्टतः प्रतीत सत्य और प्रतीत्यसमुत्पादका प्रचार किया । बुद्धदेव शब्द होता है। बुद्ध-प्रवर्तित कर्मबाद और आत्माका देहा- देखो। यही दो उनके प्रचारित धर्मको मूलभित्ति है; न्तरबाद उस समय जनसाधारणमें प्रचारित था, इसमें यथा--दुःख, समुदय, निरोध तथा प्रतिपद या मार्ग सन्देह नहीं। बौद्धगण यद्यपि आत्माका अस्तित्व ! ही चार सत्य भार्यसत्य हैं। दुःख है, यह बात कोई