पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५३८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


५३२ बौद्धधर्म निम्नलिखित रूपसे श्रेणीविभाग किया गया है,--(१ प्रन्थमें इन्ही' तोन यानका उल्लेख है। इस प्रन्यके बुद्ध, (२) प्रत्येकवुद्ध, (३) अह , (४) देव, (५) ब्रह्म, (६) मतसे स्थविर अर्थात् पूर्वमतावलम्बिगण श्रावक, निर्जन- गन्धर्व, (७) गरुड़, (८) नाग, (६) यक्ष, (१०) कुम्भाण्ड, ' में चिन्तापरायण दार्शनिकगण प्रत्येकबुद्ध और सिद्ध, (११) असुर, (१२) राक्षस, (१३) प्रेत, (१४) नरक- गुरु तथा धर्मप्रचारकगण बोधिसत्त्व कहलाते हैं.। यासी। यद्यपि बौद्ध धर्मावलम्वियों में श्रेणाविभाग तथा मन- उक्त श्रेणीविभागके मध्य केवल प्रथमोक्त तोन हो विरोध होता है, तो भो अन्तमें सबोंको वरम गति एक आलोच्य विषय हैं। . है। इसलिए तथागतने कहा है, "मैं सभी जीवोंको अहं त । निर्वाणके पथ पर ले जाऊंगा। समस्त जीव मेरो ही निर्वाणप्राप्तिके पूर्व चार मोपानका उल्लेख किया सन्तान हैं।" गया है। मच्चि सोपान पर अह लगण अवस्थित प्राचीन प्रत्येकबुद्धयान और महायान बौद्धोंका कहना है। सामान्य मनुष्यको अपेक्षा इनको मानसिक शनि है, कि अह की अपेक्षा प्रत्येकवुद्ध कहाँ श्रेष्ठ हैं। कहाँ श्रेष्ठ है। ये अर्थ, धर्म, निरुनि और प्रतिभान प्रत्येकबुद्ध भी बुद्धकी तरह अपनी क्षमता द्वारा निर्वाण. यही चार प्रकारको प्रतिसम्भिदासे सम्पन्न हैं। इसके प्राप्तिके उपयोगी ज्ञानलाभ करनेमें समर्थ हैं; किन्तु मिवा इनके पांच प्रकारकी अभिज्ञा है। अभिज्ञा द्वारा वे धर्म प्रचार करना उनका कत्तव्य नहीं है। व समस्त अमानुषिक और आश्चर्यजनक कार्य करनेमें, पूर्व जन्मको विषय के दर्शन नहीं कर सकने और सभी विषय बुद्धके कथा स्मरण रखने, पृथिवीके सभी शब्द सुनने तथा निम्न आसनके अधिकारो हैं । प्राकृतिक नियमके बलसे उनके अर्थ ममझने, पृथिवीको समस्त घटनाएं देखने बुद्ध और प्रत्येकबुद्ध एक समय वास नहीं कर सकते। और जीवोंको मृत्यु तथा पुनर्जन्म किस प्रकार होता बुद्ध । हैं, उसे समझने में समर्थ हैं। इनके और एक प्रकारकी बुद्ध कौन हैं, इसे जाननेमें उनके वाय और आभ्य अभिशा है जिसके द्वारा मभो नीच प्रवृत्ति समूल विनष्ट न्तरिक सभी लक्षणोंकी आलोचना करना आवश्यक है। हो जाती हैं। अहतगण इन्ही' आठ प्रकारकी विद्यासे वाह्यलक्षणके मध्य प्रथम उल्लेखयो य ३२ महापुरुषलक्षण विशिष्ट है। इनका सर्व प्रधान गुण प्रज्ञा है। इस हैं; बाद ८० प्रकारके अनुष्यश्चन। इनके अलावा २१६ प्रज्ञाके वलसे ही वे भवसमुद्र पार हो जात और इसी माहुल्य लक्षणको कथा वर्णित है। बद्धके प्रत्येक पैरमें लिए वे प्रशाविमुक्त कहलाते हैं । अहंतोंके निम्नश्रेणीस्थ १०८ करके ये लक्षण या चिह्न वर्तमान रहते हैं । वुद्धगण अनागामी प्रभृति इस अवस्थाको लाभ नहीं कर सकते। अपने देवचक्षु द्वारा प्रतिदिन छः वार पृथ्वीको देखते हैं। ___ जो आय सभा पाने के अधिकारी हैं, उनमेंसे अहेत्. कोई कोई कहते हैं, कि गौतम बुद्धके १२ हाथ थे और गण ही सर्वश्रेष्ठ हैं। बहुत जगह आय, अर्हन् तथा फिर कोई उनके १८ हाथ बताते हैं। सिंहल श्रावक ये तीन शब्द एक ही अर्थ में व्यवहन देग्ये जाते प्रदेशके आदम-शैलशृङ्ग पर उनका जो श्रीपदचिह्न देखा जाता है, वह ५ फूटसे अधिक लम्बा और १२॥ फूट परवर्तिकालमें महायान सम्प्रदायिगण प्रत्येक शब्द- चौड़ा है। से पूर्वतन बडोको समझाते और उन : विरुद्धवादी बुद्धको मानसिक गुणावली तीन भागोंमें विभक्त है- हीनयान सम्प्रदायके प्रति भी उसी शब्दका प्रयोग करते (१) दश वल, (२) अठारह आवेणिकधर्म और (३) चार वैशारद्य। दश बल रहनेके कारण बुद्धका दूसरा ___ महायानगण समस्त बौद्धसन्तानको यान या सम्प्र- नाम दशबल भी है। उपयुक्त या अनुपयुक्तताका शान, दायमें विभक्त करते हैं--(१) श्रावकयान, (२) प्रत्येक-! कर्मका अवश्यम्भाविफल, उद्देश्यलाभका प्रकृतपथ, बुद्धयान और (३) बेधिसत्वयान। सद्धर्म पुण्डरीक विभिन्न भूतका मान प्रभृति दश बलका उल्लेख है। भूत