पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५३९

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बौद्धधर्म ५३३ भविष्यत् और वनमान सभी घटना देखने की क्षमता प्रभृतिः अमोघसिद्धि। इनके फिर पञ्चशक्ति या पक्षतारा महा अठारह आवेणिक धर्म हैं। निम्नलिखित चार वैश्या- योगिनी हैं। रद्यको कथा देखा जाता है, यथा । १ ) तथागतका पाश्चात्य पण्डितोंके मतसे शाक्यमुनि ही एकमात्र सर्वदशन क्षमतालाभ, (२) पापहानता, ३) निर्वाण- ऐतिहासिक बुद्ध हैं । इनके पहले जिनके नामका उल्लेख प्राप्तकी अन्तराओंका ज्ञानलाभ और । ४) प्रकृत मुक्ति मिलता है, वह कल्पित है। पथ दिखानेकी क्षमता। हम लाग बुद्धके वाह्यलक्षण और आभ्यन्तरोण गुणा- बुद्धके अन्य नाम जिन, सुगत, तथागत, अहंन्, वलोको समालोचना कर बुद्ध कैसे व्यक्ति थे इसकी जो शास्ता, भागवत, दशवल, लाकोच, सर्वज्ञ, निभय, निर-: मीमांसा करना चाहते हैं, उसे बुद्ध स्वयं ही इस प्रश्नका वद्य, पुरुषदम्यसारथि, पडभिज्ञ. अनश. नरोत्तम. देवाति-! उत्तर दे गा है। बुद्धका एक वृक्षके नीचे बैठा हुआ देव, त्रिकालज्ञ, त्रिप्रातिहार्यसम्पन्न, इत्यादि । ये सब नाम देख कर एक ब्राह्मणने पूछा, “क्या आप देवता हैं ?” सभो समयके वुद्धोंके प्रति प्रयाज्य हैं। वर्तमान समयके । बुद्धने उत्तर दिया, “नहीं।" "क्या आप गन्धवं हैं ?" बुद्ध के और भो कितने विशेष नाम हैं, शाक्यसि , शाक्य उत्तर मिला 'नहीं।' ब्राह्मण बोले "क्या आप यक्ष हैं ?" मुनि, शाक्य, शाक्यपुङ्गव, सिद्धार्थ, सर्वाथसिद्ध,शौद्धानि, बुद्धने कहा, 'नहीं ।' ब्राह्मणने फिर पूछा “च्या आदित्यबन्धु, सूर्यवंश, आङ्गिरस और गौतम इत्यादि। आप मनुष्य हैं ?" बुद्ध बोले, "मैं मनुष्य भी नहीं हूं।" प्राचीन बौद्ध-शास्त्रग्रन्थके मतानुसार वर्तमान युग, इस पर ब्राह्मणने बड़े ही आश्चर्यान्वित हो पूछा "तब के बुद्धके पूर्व और भी २४ बुद्ध हो गये हैं जिनके आप कौन हैं ?' बुद्धने उत्तर दिया, "हे ब्राह्मण ! मैं बुद्ध नाम ये हैं, दोपंकर, कौण्डिन्य, मङ्गल, सुमना, रेवत, : हूं।" अतएव देखा जाता है, कि बुद्ध मनुष्यकी आकृति शोभित, अनोमदर्शी, पद्म, नारद, पद्मोत्तर, सुमेध, सुजात, धारण करके भी प्रकृति और गुणमें मनुष्य नहीं थे। प्रियदर्शी, अष्टदशी, वर्मदशा, सिद्धार्थ, पुष्य, विपश्य, वे बुद्ध थे---किन्तु मनुष्य, देवना, यक्ष या गन्धर्व नहीं थे। शिखो, विश्वभू, ककुच्छन्द, कोणागमन और काश्यप।। अनेक अवस्थाका अतिक्रम करनेसे बुद्धत्व प्राप्त होता है। भूतकालमें जैसे बुद्ध थे, भविष्यत्में भी वैसे ही बुद्ध बाधिमत्त्व । अवतोर्ण होंगे। उनका नाम मैत्र य होगा और अजित जो बुद्ध होने के अधिकारी हैं, वे वोधिसत्त्व कहलाते उनको उपाधि होगी। वर्तमानमें ये तुषितस्वर्गमें बांधि-: हैं। बोधिसत्त्व शब्दका साधारण अर्थ 'बुद्धिमान जीव' सत्त्वरूपमें बास करते हैं। है। जिनके बोधि है; वहो बोधिसत्त्व हैं। किन्तु यह समस्त तथागत हो प्रायः समतुल्य हैं, पर सामान्य : 'वोधि' सम्यक् सम्बोधिमं पारणत नहीं होती। वह विषयमें परस्परमें थोड़ा प्रभेद देखा जाता है। शारीरिक अवस्था प्राप्त करनेसे बुद्ध हो जाता है। आकृति और आयुपरिभाणमें कुछ विशेषता है। किसोने बोधिसत्यको तीन अवस्था है - अभिनोहार ( अर्थात् क्षत्रियवंशमें और किसाने ब्राह्मणकुलमें जन्मग्रहण किया : बुद्धत्वप्रामिको उच्च आकांक्षा , व्याकरण (तथागत कत्तुक है। सभी बुद्धोंने एक ही प्रकारको नातिका प्रचार किया भविष्यद्वाणी कि ये बुद्ध हांगे) और हलाहल (बुद्धत्व प्राप्त था। कालक्रमसे जब प्रचारित सत्य अन्तर्हित हो गया तब होनेसे पुनः जन्म न होगा, इसके लिये आनन्दध्वनि । यही एकबद्धने जन्मग्रहण कर अपनी क्षमताके बलसे बिना! उसका शेष जन्म है, पुनः जन्मग्रहणरूप क्लेश भोगना किसी गुरुको सहायताके ही पूर्व प्रचारित नीति और । नहीं पड़ेगा) कोई कोई वाधिसत्वके जीवन कार्यको चार सत्यका पुनः आविष्कार किया। भागोंमें बांटते हैं, यथा -मानम ( अभिप्राय ), प्रणिधान महायन-सम्प्रदायगण और भी एक प्रकारके बुद्ध (दृढ़-संकल्प ), वाकप्रणिधान ( बाक्य द्वारा संकल्पका बतलाते हैं जो ध्यानोबुद्धके नामले प्रसिद्ध हैं। इनके नाम प्रकाश) और विवरण ( अभिव्यक्ति । हैं-वैरोचन, अक्षोभ्य, रत्नसम्भव, अमिताभ और वुद्धकी तरह बोधिसत्त्वके भी अनेक नाम है। उनमेंसे Vol. xv, 134