पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५४२

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बौद्धधर्म भागों में विभक्त हो सकते हैं जिनमेसे प्रथम दो भाग । सम्प्रदाय था जिसकी अनेक कुक्रियायोंकी कथा सुनी जाती प्रायः उपयुक्त दशशिक्षावादके समान हैं। किंतु तृतीय है। एक दिन एक भादमीने बुद्धदेवसे पूछा, 'क्या कोई अवस्था इससे कहीं उच्चनर है। इस अवस्थामें पशु.. आजोवक मृत्युके बाद स्वर्ग जा सकता है ?' इस पर चलि, भविष्यवाणी या ज्योतिषशास्त्रमें विश्वास प्रति उन्होंने उत्तर दिया, मुझे ६१ कल्पको कथा याद है , निषिद्ध है। ग्राह्मण्यधर्म के चौथे आश्रम में यति या मुक्त इसके मध्य केवल एक हो आजोवकको स्वर्ग में देखा है ब्राह्मणों को जो अवस्था है, श्रमणोंकी तीसरी अवस्था : जो 'कर्मवादिन' और 'किरियवाद' (क्रियावाद) समझता वैसी ही है। था। बौद्धधम में प्रशंसाका विषय यह है, कि कुसंस्कार ___ बौद्धधम को व्यवहारिक नोतिका विशेषत्व निर्देश और घृणित धर्म मत इसमें स्थानन हो पा सकता। करना दुरूह हैं। इसके दो कारण हैं। प्रथमतः बौद्ध- ___बौद्धगण विरुद्ध धम वादियोंके माथ कदापि तर्क धर्म नोतिके आदर्श और भारतवर्ष के अन्यान्य धर्म के वितर्क नहीं करने और आकारण ही उन्हें किसी प्रकार आदर्श में कोई विशेष पार्थक्य दिखलाई नहीं पता। असन्तुष्ट करना नहीं चाहते हैं। बुद्ध स्वयं भी जनसाधारण द्वितीयतः विभिन्न बौद्धसम्प्रदायका भिन्न भिन्न मत है। के मतका सम्मान करते थे। यदि किसो शिष्यका अपराध बौद्धधर्म प्रधानतः भिक्षु या संन्यासीका धर्म है। क्रमशः उनके निकट विचार्य विषय होता था, तो वे इस प्रकार इसने जब गृहस्थाश्रममें प्रवेश किया, तर स्थान, काल विचार कर देते थे, कि जनसाधारणमेसे कोई भी उनके और पाविशेषमें अनेक नियमादि कार छाँट कर वे प्रति असन्तुष्ट नहीं हो सकता था। वे कोई ऐसा उप. गृहस्थके व्यवहारोपयोगो कर लिये गए हैं। देश या आदेश नहीं देते थे, जो अत्यन्त कठोर सा : दक्षिण और उत्तरदेशीय बौद्धसम्प्रदायको जैसी मत- प्रतोत हो । जब देवदत्तने बुद्धदेवसे अनुरोध किया था, विभन्नता देखी जाती है, वैसा ही महायान और हीनयान कि श्रमणगण कदापि मत्स्य या मांसाहार न कर सके, इन दो सम्प्रदायमे भीमतविरोध है । महायानोंके धर्म- ऐसा नियम किया जाय, तब देवदत्तके इम अनुरोध पर ग्रन्थमें अहिंसा और दयाको जितना श्रेष्ठत्व दिया गया उन्होंने ध्यान नहीं दिया था। (१) है, दुसरे सम्प्रदायके ग्रन्थमें उतना नहीं देखा जाता । ऐमी गल्प प्रवलित है, कि एक जैनने बुद्धदेवका इसीलिए ये दोनों ही बौद्धधर्मके विशेषत्व से जान शिष्यत्व ग्रहण किया। बुद्धने उसे उपदेश दिया था, : पड़ते हैं। 'सुनो ! निग्रन्थों ( जैनाचार्य ने बहुत दिन तक तुम्हारे महायानबौद्धोंका आदर्श उच्च होने पर भी, उनमें एक घरमें आश्रय लिया है, अतएव जब वे तुम्हारे पास आवे बड़ा दोष शा। वे अपनी दया और उदारता जनसाधा- तब उनको भिक्षाप्रदान करना तुम्हारा कर्तव्य है।' इससे रणमें विशेषरूपसे प्रकाशित कर अन्य सम्प्रदायोंमें इन जाना जाता है, कि अन्य धर्मावलम्बियोंके प्रति बुद्धदेवको सब गुणोंकी त्रुटि दिखलाते हुए सादा उन पर तोत्र हिंसा या द्वेष न था। किन्तु जो धर्म के बहाने अक्रिया आक्रमण करते थे। यहां तक, कि स्वधर्मावलम्बी हीन- या कुक्रिया करते थे वे कदापि बुद्धदेवके श्रद्धास्पद यान सम्प्रदायके प्रति भी उनका व्यवहार उतना उदार न हो सके। उस समय आजीवक नामक एक नहीं था। यथार्थमें बौद्धोंने भारतके अन्यान्य धर्मसम्प्रदायको (१) महावग्ग ६।३१।१४, मझिमनिका ( ११३६८ ) अपेक्षा अनेक उदारता दिखलाई है, इसमें सन्देह नहीं। प्रभृति प्राचीन बौद्धधर्मशास्त्रमें अदृष्ट, अश्रुत या असन्दिग्ध ऐसे बौद्धधर्मका प्रचार करने में वे वौद्धसमाजके मनुष्योंको मत्स्य और मांस ग्रहणकी ब्यवस्था है। महावग्गमें मनुष्य, हिन्दूसमाजकी नाई सङ्कीर्ण गण्डीके मध्य रखने में प्रयासी हस्ती, अश्व, कुक्कुर, सर्प, सिंह, व्याध, शूकर और तरक्षुका मांस नहीं होते। इसीलिए बौद्धधर्म संसारमें एक सार्वाजनीन खाना निषिद्ध बतलाया है। भसके जैसा प्रसिद्ध हुआ है।