पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५४५

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बौद्धधर्म था। इस समयका नाम है परिवास। चूड़ाधारी होता था। संघातिका प्रकृत व्यवहार क्या था, इसका अग्नि-उपासक जटिल तथा शाक्यवंशके सिवा और निश्चित निर्धारण करना कठिन है। भिन्न भिन्न खण्डोंमें किसीको भी ( परिवास भिन्न ) उपसम्पदा लाभ करनेमें मिला कर परिधेय प्रस्तुत किया जाता था। मगधके नहीं देखा जाता। शस्यक्षेत्रका अनुकरण ही इसका उद्देश्य कहा जाता था। भिक्षपदप्राथों व्यक्तिको दश अथवा समयानुसार . भिक्षु ओंको वस्त्र देना गृहीके लिए पुरण्यकर्म है। पांच भिक्ष ओंके समक्ष एक परीक्षा देनी पड़ती थी। प्रत्येक वर्षे वर्षाके अन्तमें परिधेय वितरण करनेका नियम इस परोक्षाके पहले पदप्राथीको कमण्डलु और काषाय है। इस वितरणकार्य का नाम "कठिन" है। इसके वस्त्रग्रहण तथा एक उपाध्याय या गुरु चुन लेना पड़ता अनेक प्रकारके नियम और प्रणाली हैं। शरीरका था। भिक्ष ओंके मध्य एक मनुष्य सभापतिरूपमें आच्छादन करनेके लिए किसी वस्त्रका व्यवहार करना दीक्षाप्रार्थीकी परीक्षा लेते थे। यदि वे सन्तुष्ट होते भिक्षु ओंको विलासिता समझी जाती थी। बौद्धग्रन्थमें तब वे वहांके समबेत भिक्षु ओंको उपस्थित व्यक्तिकी विलास द्रव्यका व्यवहार निषिद्ध है । काष्ठपादुका प्रार्थना तथा उसकी उपयुक्तता सुना देते थे। उन्हें दो (खड़ाऊँ और चट्टोजूतेके व्यवहार में उतना निषेध नहीं बार अपना नाम प्रकाश करना पड़ता था। भिक्षु गण! है; छाताका व्यवहार विशेष कारणके सिवा अनावश्य- जब उसे उपयुक्त समझते थे, तब वे मौन द्वारा अपनो कीय है, पर पखेके व्यवहारको अनुमति है। सम्मति देते थे। बाद सभापति महाशय भिक्षु पदनाथी __ ( महावग्ग २-४ और चुलबग्ग ५।२२।२३ ) को भिक्ष मण्डलमें ग्रहण कर उसे आजोधन केवल चार उक्त प्रकारके परिच्छदके अलावा निम्नलिखित द्रव्य प्रकारके आवश्यकीय द्रक्ष्यका भोग और चार प्रकारके भी भिक्ष ओंके नित्य व्यवहारमें गिने जाते हैं-एक पापका परिहार करने के लिये उपदेश देते थे। चार प्रकार भिक्षापात्र, कमरबन्ध, एक सूई ( जान पड़ता है, कि फटे आवश्यकीय द्रव्यके अलावा अन्यान्य द्रव्य एकवारगी . कपड़े सीनेके लिए ), क्षौर कार्य के लिए एक सुर निषिद्ध न था, पर वह आवश्यकीय गिना जाता था। । (अस्तूरा) और एक जलपान । रमणियोंमेंसे जो सन्यासधर्म ग्रहण करती थी, उत्तराञ्चलमें भिक्षु गण एक लाठीका व्यवहार करते उन्हें भी पुरुषको नाई सभी नियमोंका पालन करना थे जिसका नाम खक्खर था। दक्षिणाञ्चलमें यह 'कत्तर' पड़ता था । (चुल्लवग्ग १०१७) कहलाता था। ____ उपसम्पदा या दीक्षाप्रणालीके सम्बन्धमें उत्तर और | ____जपकी माला बौद्धोंके मध्य अब सभी जगह प्रचलित दक्षिण प्रदेशोय बौद्धोंमें सामान्य कुछ कुछ मतभेद रहने देखी जाती है ; किंतु मालूम होता है, कि इसका व्यव- पर भी मूल विषयमें कोई पृथक्ता नहीं देखी हार बहुत थोड़े दिनसे आरम्भ हुआ है। जपमालाकी जाती। (१) व्यवहारप्रथाकी भारतवर्ष में उत्पत्ति हुई है या नहीं परिधेय। इसमें भी घोर सन्देह है। भिक्षु ओंका परिधेय तीन भागमें विभक्त था,- वर्षावास। अन्तरवासक, उत्तरासङ्ग और संघाति। अन्तरवासक। वर्षाकालमें किसी एक स्थानमें वास कमरसे ले कर पैर तक लटका रहता और कमर में काय- करनेकी विधि थी। उस समय भ्रमण करना निषिद्ध बन्धन या पेटीसे बधा रहता था। इसका दूसरा था। आषाढ़ी पूर्णिमासे ले कर कार्तिकीपूर्णिमा तक के नाम है, निवासन। उत्तरासङ्ग उत्तरीयका काम करता । घरमें रहा करते तथा कोई कोई एक महीनेके बाद किसी था , यह वक्ष और स्कन्धदेशके भावरणके लिये व्यवहृत : पर्णशालामें आश्रय लेते थे। उत्तर प्रदेशीय भिक्ष गण (१) Waddell's Buddhism of Tibet p. 178, श्रावणके प्रथम दिनसे ले कर कार्तिकके प्रथम दिन तक 145, Hodgson's Nepal, p. 139.145 देखो। गृहवास करते थे।