पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५५१

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वौद्धधर्म विहारकी कथा सुनी जाती है; किन्तु उनका नामनिशान! उल्लेख अनेक बार देखनेमें आता है। वामियान नामक तक भी नहीं है। मध्ययुगमें मगधमें भी स्तूपको कमो स्थानमें वैसी हो एक मूर्तिकी कथा सुननेमें आती है जो न थी। लगभग १०० फीट ऊंची थी। यूएनचुअडका कहना सिंहलके सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन स्तूपका नाम है, कि उन्होंने कुशीनगर के शालवनमें निर्वाणप्राप्तिकी महाथूप था। दुट्ठगामनिके समयमें बुद्धदेवके पदचिह्नके अवस्थापरिचायक एक और बुद्धमूर्ति देखी थी। ऊपर यह स्तूप बनाया गया था। यह अनुरोधपुरके उत्तर बुद्धदेवकी चित्रित प्रतिकृतिकी संख्या भी मध्ययुगमें संस्थापित और तीन सौ हाथ ऊँचा था। इसके | एकदम कम न थी। यूएनचुअङ्गने पेशावरमें एक प्रति. समीप ही अभयगिरिका प्रसिद्ध सङ्काराम वत्त मान था। कृति देखी थी जिसके शिल्पचातुर्य और सौन्दर्य पर वे इसके अलावा अन्यान्य स्तूप, विहार और प्रासाद चकित हो गए थे। इसके समीप ही उन्होंने बुद्धदेवकी इत्यादिको संख्या सिंहलमें उतनी कम न थी। दो मूर्ति देखी थी जिनमेंसे एक छः फीट और दूसरी पार प्राचीन बौद्धधर्मग्रन्थमें बुद्धदेवकी मूर्ति पूजाका फीट लम्बी थी। विवरण नहीं देखा जाता। उनके पदचिह्न, आसन, । बौद्ध भक्तगण केवल शाक्यमुनिकी ही श्रद्धा भक्ति- वेदी या चक्र आदिके निकट ही मनुष्य बुद्धदेवकी उप-1 में नहीं लगे रहते, वरन् पूर्व बुद्धोंको मूर्ति भी पूजते थे। स्थितिकी कल्पना कर उनकी पूजा तथा भक्ति करते थे, अनेक स्थानोंमें शाक्यबुद्धमूर्ति के साथ तीन या छः गत- सिर्फ ऐसा हो विवरण मिलता है। बहुतोंका विश्वास बुद्धकी मूर्ति देखी जाती है। भविष्यवु द्धमैत्रेयके प्रति है, कि अशोकके राजत्वके वादसे मूर्तिपूजाको प्रथा उनकी और भी ज्यादा भक्ति थी। ये अभी बोधिसत्त्व प्रचलित हुई है। इस सम्बन्धमें कोई ऐतिहासिक तथ्य अवस्थामें वर्तमान हैं। इनकी अनेक मूर्ति नजर आती तो नहीं मिलता, पर नाना प्रकारके प्रवाद और उपन्यास हैं। सबसे प्रसिद्ध मूर्ति उद्यानको राजधानीके निकट अवश्य प्रचलित हैं। सब अर्चनाओंकी यथायथ आलोचना उपत्यकामें थो जो १० हाथ ऊँची और सुनहले काठकी और अनुसन्धान कर ऐतिहासिक तथ्य निर्णय करना बनी थी। बौद्धग्रन्थसे पता चलता है, कि बोधिसत्त्व इस प्रबन्धमें असम्भव है। यूरोपीय पुरातत्त्वविदोंका अब लों पृथिवी पर अवतीर्ण नहीं हुए हैं। सुतरां जिस सिद्धान्त है, कि ईसाजन्मके एक सौ वर्ष पहले या उसके शिल्पीने यह मूर्ति बनाई थी, वह अत् मध्यान्तिकके बाद मूर्तिपूजाकी प्रथा प्रचलित हुई है। किंतु अलेक- अनुग्रहसे तुषित स्वर्ग गया था और वह बोधिसत्त्वका सन्दरके समय प्राक-लिखित कहानी भी जाना जाता शारीरिक परिमाण और वर्ण इत्यादि देख कर पृथिवी पर है, कि इससे पहले भी मूर्तिपूजा प्रचलिन थी। जो आया और वैसी ही मूर्ति बनाई। कुछ हो, सम्राट कनिष्कके समयसे ही यह प्रथा समस्त उत्तर प्रदेशीय बौद्धगण केवल बोधिसत्त्व मैत्रेयकी भारतवर्ष में प्रसिद्ध थी। धर्मपिपासु चीनपरिव्राजकोंने मूर्तिपूजा कर परितृप्त न हो सके। वे अवलोकितेश्वर अपने भ्रमण-वृत्तान्तमें सैकड़ों बार बुद्धदेवकी मूर्ति का और मजुश्री बोधिसत्त्वका भी मूर्तिपूजन करते थे। उल्लेख किया है। फाहियानने ५वीं शताब्दीमें साङ्काश्य । फाहियानका कहना है, कि उन्होंने मथुराफे महायान नामक स्थानमें बुद्धदेवकी दश हाथ लम्बी खड़ी मूर्ति सम्प्रदायको प्रज्ञापारमिता, मञ्जुश्री और अवलोकि देखी थी और यूएनचुअङ्ग भी ७वीं शताब्दीमें उक्त मूर्ति तेश्वरकी पूजा करते देखा था। इसके दो शताब्दी बाद देख गए थे। इन्होंने पेशावरमें बारह हाथ लम्बी श्वेत यूएनचुअङ्गने परिभ्रमणकालमें अवलोकितेश्वर की असंख्य प्रस्तरकी बनी बुद्धमूर्तिका दर्शन और पूजन किया था। मूर्ति देखी थी। कपिश, उद्यान, काश्मीर, कन्नौज, गया यह मूर्ति कनिष्कस्तूपके समीप ही थी और रातको इस और महाराष्ट्रके कपोतसङ्घाराममें इस बोधिसत्व के मूर्ति- स्तपके चारों ओर घूमती थी। पृजनकी कथा उनके लिखे विवरणसे मिलती है। किन्तु निर्वाणप्राप्तिके समय बुद्धदेवको उपविष्ट प्रतिमूर्तिका लोन परिव्राजकोंने कहीं पर अवलोकितेश्वरके बहुमुखकी Vol. XV. 137