पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५५२

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बौद्धधर्म कथाका उल्लेख नहीं किया है। मालूम होता है, कि । देखा जाता है। इस वृनके ऊपर दो छत्र और शाखा अन्तों उनका नाम समन्तमुग्व हुआ है और नामकी सार्थ- प्रशाखामें पताका चित्रित है। सबसे ऊपर दो कताके लिए बहुतसे मुम्ब पीछे संलग्न हुए हैं। कोनेमें दो अप्सराए हाथमें फूलको माला लिए मथुरामें मजु गोका खूब सम्मान था । वहां एक खड़ी हैं। उनके नीचे दो पुरुषमूर्ति भी देखो स्तृप में उनका स्मृतिचिन्ह परिरक्षित था, किन्तु किसी जाती हैं, किन्तु इनके पैर पृथिवीसे नहीं छूते। गृक्षका मूर्तिका विवरण नहीं मिलता । अभी मजुश्री चतु स्कन्ध बहुतसे स्तम्भ द्वारा परिवेष्टित है, पादमें एक भुजके रूपमें देखे जाते हैं। किन्तु यवद्वीपमें १२६५ ई०- आसन और आसनके सामने घुटना टेक दो मनुष्यमूर्ति को आदित्य वर्माने जब उनको मूर्तिप्रतिष्ठा की, उस समय हाथ जोड़ी । ड़ी हैं। इनमेंसे एकके पीछे एक रमणीकी उनके दो हाथसे अधिक नहीं थे। मूर्ति और दूसरेके पीछे नागराज विराजमान हैं। बोधि- ___ ध्यानोबुद्धोंकी मूर्ति प्रचलित होनेके समयसे उत्तर मण्ड या आसन समचुतुष्कोण प्रस्तरवेदिका है। एक प्रदेशमें बौद्धगण उनको पूजा करते आये हैं। मूर्ति और चित्रमें चार गत बुद्धके चार आसन चित्रित हैं। चित्रित प्रतिकृति द्वारा ध्यानीबुद्धगण, उनको शक्ति या गयाधामके बोधिवृक्षके नीचे जिस आसन पर बैठ तारागण और सन्तान मानवसमाजमें प्रचारित तथा कर शाक्यमुनिने सिद्धिलाभ किया था, जिस आसन पर अर्चित होती हैं। नेपाल, तिब्वत और मङ्गोलियामें उक्त समस्त विगत वुद्धोंने बुद्धत्त्व प्राप्त किया है, भविष्यत्के बुद्ध बोधिसत्त्व तथा शक्तियोंकी अर्चना अधिक परिमाण युद्धगण भी वहीं बुद्धत्त्व लाभ करेंगे, ऐसा यूएनचुअङ्गका में देखी जाती है। इन बुद्धोंका मुख और अवयव बुद्धा मत है। उनके समयमें यह आसन चारों ओर दीवारसे कृतिकी तरहका है, आसन तो पद्मासन है ; किन्तु वाहन घिरा था। में कुछ पार्थक्य है, वैरोचनका वाहनसिंह, अक्षोभ्यका सम्प्रति जो बोधिवृक्ष देखा जाता है, उसका पाददेश हस्ती, रत्नसम्भयका अश्व, अमिताभका हंस और अमोघ लगभग ३० फीट ऊँचा और चारों ओर सोपानावली सिद्धिका वाहन गरुड़ है। उक्त पांच मनुष्य विभिन्न है। बौद्धोंका विश्वास है, कि बोधिमण्ड या नरसिंहासन पांच प्रकारकी मुद्रा द्वारा परिचित हैं। चित्रित करने पृथिवीके ठीक बीचमें अवस्थित है। प्रवाद है, कि के समय इन्हें विभिन्न रंगोंसे चित्रित करते हैं। जिस अशोकको कन्या इस बोधिवृक्षका दक्षिण ओरको शास्त्रा बुद्धकी जो तारा या शक्ति और जो बोधिसत्त्व है, वे सिंहल ले गई थी और महामेघवाहनने इले रोपा था। उसी वर्णमें चित्रित होते हैं। तारा तथा नोधिसत्त्वोंकी उससे अत्यन्त आश्चर्यजनक आठ शाखाएं निकली और खड़ी और बैठो दोनों अवस्थाको मूर्ति देखी जाती है। सिंहलके विभिन्न स्थानमें लगाई गई । उक्त आठ शाखा- बाधिद्रम। से पुनः बत्तीस प्रशाखाएं हुई। महाबोधिवंश नामक पवित्र बोधिवृक्षको परिभोग चैत्य कहते हैं : किन्तु | प्रन्थमे इस बोधिवृक्षका इतिहास सविस्तार वर्णित है। यथार्थमे इसे उद्देशक कहना चाहिए । अति प्राचीन ____बुद्धका पदचिह्न। कालसे ही बौद्धगण इस पवित्र वृक्षकी पूजा तथा भक्ति महाबोधिवृक्षके जितने प्रकारके चित्र देखे जाते हैं, करते आये। जिस समय मूर्तिपूजा भी आरम्भ नहीं पदचिह्नके उतने नहीं देखे जाते। सबोंका विश्वास है, हुई थी, उसी समयसे बोधिवृक्ष पूजा जाता है। कि तथागत जो सब पदचिह्न रख गए हैं, उनमेंसे सुमना- छः विगत बुद्धके बोधिवृक्षका चित्र हम लोग देख पर्वतके ऊपर स्थित श्रीपद' हो सबोंकी अपेक्षा प्रसिद्ध सकते हैं जिनके नाम ये हैं -विपस्सि, कश्यप, कोण है। प्रवाद है, कि जिन जव सिंहल आये थे, तब उन्हों- गमन, ककुसन्ध, वेससभू और शाक्यमुनि । शाक्यमुनिका ने अनुराधपुरके दक्षिण एक पैर और १५ योजनकी दूरी बोधिवृक्ष तथा उसके नीचे बोधिखण्ड (जिस आसन पर पर एक पर्वतके ऊपर दूसरा पैर रखा था। इस उन्होंने सिद्धि लाभ की थो) बहुत-से स्थानोंमें चिलित "श्रीपाद" को नाना धर्मावलम्बी मनुष्य मानारूप