पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५५३

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पौधर्म समभाते हैं। शैवाका विश्वास है, कि यह महादेवका । बुद्धदेव बैठे थे। इसी प्रकार नानास्थानमें अमेक पदचिह है. मुसलमान लोग इसे आदमका पदचिह्न बत- तीर्थप्रवाद है। धर्म ग्रन्थमे जिस तीर्थका उल्लेख नहीं .लाते हैं और बौद्धोंका कहना है, कि यह बुद्धका पद है, प्रवादवाक्यने उसे तीर्थ में परिणत किया है। चिह्न है। इसकी लम्बाई पांच फीटसे ज्यादा और धर्मचक्र । चौड़ाई २॥ फीट है। धर्म चक्रकी उत्पत्ति कहांसे हुई, इसका निर्णय करना विगत चार बुद्धोंके जो पदचिह्न मृगदाव या सार- सहज नहीं है। विष्णुचक्रसे यह धमचक्र आया है, या नाथमें दिखाये जाते थे, वे उक्त पदचिहकी अपेक्षा और नहीं इसका भी क्या ठीक है ? धर्मचक्रकी प्रतिमूर्ति भी बड़े थे। यूएनचुअङ्गका कहना है, कि यह पांच सौ निम्नलिखितरूपसे प्रदर्शित हुई है। एक मन्दिरमें एक फीट लम्बा और ७ फीट गहरा था। उक्त चीनपरि छलके नीचे यह धर्मचक्र सुन्दर वस्त्रमें सुसजित रखा बाजकने पाटलिपुत्र में बुद्धदेवका जो पदचिह्न देखा था, हुआ है। दोनों वगलमें दो पुरुषमूर्ति खड़ी हैं। नीचे वह उससे बहुत छोटा है । यह एक फूट आठ इञ्च लम्वा | चार घोड़े के रथ पर एक गजा बैठे हैं। खोदित लिपि- और छः इश्च चौड़ा है। पाठसे जाना जाता है, कि इस राजाका नाम था प्रसेन- ___ अन्यान्य बहुत-से स्थानों में भी पदचिह्नप्रदर्शनकी जित् । ये कौशल के अधिपति थे। कथा प्रचलित है । उद्यानमें सुयात नदीके उत्तरी किनारे अन्य एक फलक पर चक्रको जो प्रतिकृति देखो जाती एक बड़े प्रस्तरखण्ड पर एक पदचिह्न था जो दर्शकके है, उसमें वह एक अति उच्च स्तम्भके ऊपर संस्थापित मनोभावानुसार छोटा और बड़ा दिखलाई पड़ता था। नेपाली बौद्धगण पादचिह्नको 'पादुका' कहते हैं। साच्चि, गया और श्रावस्तीमें ऐसे ही ढंगके धर्म- वे लोग बुद्धके पदचिह्नको वृक्षको सी और मञ्जुश्रीको चक्रको प्रतिकृति पाई गई हैं। चन्द्र की-सी आकृति द्वारा चित्रित करते हैं। पर्वदिन। पादचिह्नपूजाकी प्रथा कहांसे चली है, इसका यथार्थ ___ चर्चा के लिए निर्दिष्ट दिनका नाम 'उपोसथ' आज तक निरूपित नहीं हुआ है। मालूम होता है, कि है। प्रत्येक पक्षको अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और हिन्दुओंके अनुष्ठित विष्णु की पादचिह्नपूजासे ही इस अमावस्याका दिन पर्नामें गिना जाता था। जान पड़ता प्रथाकी उत्पत्ति होनेको विशेष सम्भावना है। है, कि बौद्धों ने इस प्रथाका अनुकरण अन्यान्य धर्म- बौद्धतीर्थ । सम्प्रदायसे किया है। मालूम होता है, कि जनसाधारण- गयाधाममें जिस प्रकार पवित्रस्थानकी संख्या अधिक | के मतके प्रति लक्ष्य और सम्मान रख कर तथागत ऐसा है, वाराणसीमें भी उससे नितान्त कम नहीं है। शाक्य- विधान किया करते थे। मुनिने बुद्धत्वलाभके पहले वोधिसत्त्व अवस्थामें वारा- साप्ताहिक उपोसथका क्या गृही और या भिक्षु णासीक जिस स्थान पर भविष्यद् बुद्धत्वलाभकी भवि- दोनों सम्प्रदाय ही पालन करते थे। प्रतिमासमें चार ज्यद्वाणी सुनी थी, वह स्थान मनुष्योंको दिखलाया दिनके मध्य दो दिन भिक्ष गण प्रातिमोक्षका आकृति जाता है। भविष्यद्कालके बुद्ध जो अभी वोधिसत्त्व करते थे। यदि श्रमणों में किमीके साथ किसीका अवस्था में वर्तमान हैं, इस मैत्र यने भी इसी वाराणसी विरोध होता, तो उस विरोधभजन और पुनः मैत्री क्षेत्रमें शाक्यमुनिके समीप अपनी (मैत्र यको) भविष्यद्- संस्थापनके दिनको भी ये पवित्र दिन समझते थे। बुद्धत्वप्राप्तिको कथा सुनी थी। इसका पालि माम है 'सामगगी उपोसथ ।' बौद्धर्मप्रन्थमें उल्लिखित प्रसिद्ध चार तीर्थक्षेत्रके सिवा सिंहल, ब्रह्मदेश और नेपाल में प्रतिमास धर्मचर्चा के लिए और भी अनेकानेक तीर्थीका उल्लेख है। सिंहलद्वीपमें ये चार दिन निर्दिष्ट हैं; यथा-अमावस्या, पूर्णिमा और एक स्थान ऐसा दिखाया जाता है, जहां एक वृक्षके नीचे | प्रतिपक्षको अष्टमी तिथि । तिब्बतमें चतुर्दशी, अमावाल्या