पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५५९

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बौद्धधर्म ५५३ वर्ष बाद महेन्द्र नामक एक व्यक्ति सिंहलमें बौद्धधर्मका दोनों प्रदेशके बौद्धोंने धर्मप्रचार सम्बन्धमें मध्यान्तिक आलोक प्रज्वलित करेंगे। जिस वर्ष पाटलिपुत्र में नामक एक साधुको खूब प्रशंसा की है। सिंहलवासियोंका अधिवेशन हुआ था, उसी वर्ष महेन्द्रने सिंहलमें धर्म- कहना है, कि मध्यान्तिकसे महेन्द्रने उपसम्पदा प्राप्त की प्रचारका भार ग्रहण किया और चार श्रमणोंको साथ ले । थो और मध्यान्तिकने गान्धार प्रदेशमें एक कद्ध तथा वे चल दिये। पहले उन्होंने विदिशगिरि जा कर अपनी ! भयावह नागराजका दमन कर बहुत से मनुष्योंको उसके माताको दीक्षित किया। प्रवाद है, कि उसी स्थान पर दासत्वसे मुक्त किया था। केवल नागलोक ही नहीं, स्वर्गसे देवराज इन्द्र उनकी मुलाकातमें आये थे और उन्होंने नरलोकमें भी बहुतोंको बौद्धधर्मका आभास दिया मिहल में कुसंस्काराच्छन्न मनुष्योंके निकट बौद्धधर्म का था। उत्तरप्रदेशीय बौद्धोंके विवरणसे मालूम होता है, सत्यालोक प्रकाश करनेका उन्हें आदेश दिया। महेन्द्र कि मध्यान्तिक आनन्दके शिष्य थे। उन्होंने काश्मीरमें अपने साथियों के साथ शून्य मार्गसे सिंहलकी ओर चले हुलुण्ड नामक नागको शासन कर उसे वौद्धधर्ममें और मिस्सक नामक पर्वतके ऊपर उतरे। वहां सिंहलके! दीक्षित किया। काश्मीरमें उनके द्वारा बौद्धधर्मका राजा देवानास्त्रिय शिकार करते थे। कालक्रमसे राजाके इतना अधिक प्रचार हुआ, कि थोड़े दिनोंमे ही वहां साथ उनको भेंट हो गई और उन्होंने राजाको हत्तिपदसुत्त' नागगण कत्तुं क पांच सौ मठ प्रतिष्टित हुए। होनेके लिये उपदेश दिया । राजा वहीं पर ४० हजार अनु मझिम नामक एक दूसरे स्थविरने हिमालयके चरोंके साथ बौद्धधर्ममें दीक्षित हुए । बाद वे राजधानी गए। यक्षीको बौद्धधर्ममे दीक्षित किया था, ऐसा भी वर्णन और वहां राजकुमार, राजपुत्री तथा सभासदोंने भी उनका मिलता है। धर्मोपदेश सुन कर वही धर्म ग्रहण किया। धीरे धोरे महादेव नामक एक और विख्यात धर्मप्रचारकका मनुष्योंकी संख्या इतनी बढ़ गई, कि नगरके बाहर विवरण देखा जाता है। उन्होंसे महेन्द्रने: : ग्रहण की नन्दन उद्यानमें धर्मोपदेश प्रदान करनेका स्थान निर्दिष्ट थो । इन्होंने महीन्तल प्रदेशमें जा कर वहुतीका बंधनमुक्त हुआ। यहां भी बहुतसे सिंहलवासियोंने बौद्धधर्मका आश्रय किया था। उत्तरदेशीय बौद्धधर्मग्रन्थमें भी इनका नाम लिया। राजाने मेघवन नामक उद्यानमे कपड़े का घर बनावा मिलता है ; किन्तु इन २.व प्रन्थोंमें वे सन्द हवादीके जैसे कर प्रचारकोंके रहनेका स्थान निर्दिष्ट कर दिया। दूसरे वर्णित हुए हैं। इनके कृटतर्क द्वारा वौद्धोंमें अनेक प्रकार दिन राजाने वहां जा कर जब देखा, कि श्रमणगण उनके के मतभेद तथा वादविवाद हुए थे। हिन्दू-देवता निर्दिष्ट आवासस्थल में अत्यन्त आराम तथा सन्तोषके महादेवकी वर्णनाके साथ इस महादेवका अनेक सादृश्य साथ रहते हैं, तब उन्होंने यह मेघवन उद्यान सके देखा जाता है। काश्मीरमें इनका बड़ा ही प्रभाव था नामसे उत्सग किया। यहो मेघवन अन्तमें तिस्साराम और इनसे बौद्ध-धर्मप्रचारमें बहुत ही विघ्नबाधाएं हुई यो महाविहार में परिणत हुआ। थी। किसी किसी बौद्ध-पण्डितका कहना है, कि ____ महाविहारके श्रमणोंने सिहलमें बौद्धधर्मप्रचारके शैवेराव भी काश्मीरमें बौद्ध धर्मप्रचार के प्रतिबन्धक हुए सम्बन्धमें यद्यपि अनेक अलौकिक तथा महेन्द्रको क्षमता थे और वही दूसरे भावमें महादेवके मत्थे मढ़ा गया है। प्रभृतिका खूब बढ़ा चढ़ा कर वर्णन किया है, तो भो इसे सिंहलदेशीय विवरणमें और भी अनेक धर्मप्रचारक- एकबारगी अमूलक नहीं कह सकते। क्योंकि, उसरा के नाम मिलते हैं,-रक्षित, महारक्षित, धर्मरक्षित और श्चलके बौद्धगण भी स्वीकार करते हैं, कि महेन्द्र द्वारा महाधर्मरक्षित । इनके नामोंमें नितान्त सौसादृश्य रहने हो पहले पहल सिंहल में बौद्धधर्मका प्रचार हुआ। प्रभेद पर भी इनमेंसे कोई भी छोड़ देने लायक नहीं हैं। शोन इतना ही देखा जाता है, कि महाविहारके भिक्षुओंने महे- और उत्तर नामक भौर भी दो मनुष्यों के नाम मिलते हैं। न्द्रको अशोकका पुल कहा था, किन्तु उत्तरप्रदेशीयगण वे स्वर्णभूमि नामक स्थानमें गये और वहांसे पिशाचोंको उन्हें अशोकके भाई बतलाते हैं। भगा कर बहुतोंको मुक्तिपथ पर लाये। यथार्थमें ये Vol. xv 189