पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५६०

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बौद्धधर्म दोनों व्यक्ति शोनोत्तर या उत्तर नामके एक ही व्यक्ति थे, । गया था। इन सब ग्रन्थों में जो समय निर्देश किया गया यह निर्णय करना दुरूह है। है, वह विश्वासयोग्य नहीं है और न उसके ऊपर निभर अगोकसे ले कर कमिष्क तक बौद्धप्रभाव । करना ही निरापद है। अशोकको मृत्युके बादसे कनिएकके सिंहासनारोहण माहित्यिक प्रमाण छोड़ कर यदि केवल प्राचीन पर्यन्त तीन शताब्दी तक बौद्धधर्म का प्रभाव उसरोत्तर सङ्घाराम, विहार, अनुशासन प्रभृतिके ऊपर निर्भर किया बढ़ता ही गया। यद्यपि शुङ्गवंशीय राजाओंने बौद्धधर्म- जाय, तो निःसन्देह प्रमाणित होगा, कि खष्ट पूर्व ३०० के प्रति उतना सुदृष्टिपात नहीं किया, तो भी बौद्धधर्म- और १०० ई०के बीच बौद्धधर्म ने विशेष विख्याति पाई का प्रभाव उत्तरमें हिमालयको भेद कर चीनदेश तक थी। इस मूल धर्मसे अनेक प्रकारके सम्प्रदायोंकी भी फैला हुआ था और दक्षिणमें सिंहल देशमें इसने जो । सृष्टि हुई थी। कनिकके राजस्वके पूर्व काल तक अठारह प्रभाव विस्तृत किया था, वह आज भी वर्तमान है। प्रकार के विभिन्न सम्प्रदायका विवरण मिलता है । मालूम ___ मौर्यवंशीय शेष राजा पुष्यमित्रके द्वारा राज्यच्युत होता है, फिरी शताब्दीमें ही महायान सम्प्रदायको हुए थे। पुष्यमित्र ब्राह्मण्यधर्मके विश्वासी थे। इन्होंने पुष्टि, उन्नत भाव तथा चिन्नाने बौद्धसमाजमें प्रवेश बौद्धधर्मके प्रति कितना अत्याचार किया था, उसका किया था। ऐतिहासिक तथ्य संग्रह करना सहज नहीं है। तब इस विषयमें अनेक किंवदन्ती प्रचलित है :-एक विव. सिंहलमें बौद्धधर्मका प्रभाव एक-सा बना रहा । रणमें देखा जाता है, कि इन्होंने मध्यदेशसे ले कर जलं- देवानाप्रिय राजाने चालीस वर्ष तक राजा किया, दाद धर तक बहुत से वौद्धसंघाराम जला दिये और अनेक उनके भाई सिहासन पर अधिरूढ़ हुए। देवानाम्प्रियके मठधारो शिक्षित वैौद्ध भिक्षओंको मार डाला। फिर १६ या १०६ वर्ष वाद अभयदुगामनीका राजा आरम्भ भो एक दूसरे विवरणमें लिखा है, कि इन्होंने देशले हुआ। ये बौद्धधर्मके बड़े हो अनुरागी थे। इन्होंने बहुत से स्तूप, विहार और लौहप्रासाद बनवाये थे। कहते वादधधर्म हटानेको इच्छासे पाटलिपुत्रका कुक्कुटागर हैं, कि महाविहार इन्हीं का बनाया हुआ था। फिर ध्यम कर डाला तथा शाकल प्रदेशके निकटवत्तों भिक्षुओं- किमा किसोका कहना है कि तिससके समयमें महा- का विनाश किया। तीसरे विवरणसे पता चलता है, कि नागार्जुनके ममयसे ले कर असङ्गाके समय तक विहारको प्रतिष्ठा हुई थी। महास्तृपके पाददेशमें बुद्ध, बौद्धों के प्रति तीन बार घोरतर अत्याचार किया धर्म, सङ्घ और धर्मप्रचारक महादेव, उत्तर तथा धर्मरक्षित- को प्रतिमूत्ति संस्थापित है। गया था। सीताली में मध्यदेश बौद्धधर्मको गोभी जान पड़ता है, कि अभयवट्टगामनीके राजत्वकाल- क्यों न हो, उत्तर पश्चिम भारतवर्ष में यवन राजाओंके में अभयगिरि सङ्घारामकी स्थापना हुई थी। उसी अधिकारमें बौद्धधर्मका प्रबल प्रभाव उस समय भी वर्त- समय सिहलमें त्रिपिटक ओर अत्थकथा (बौद्धधर्मनीति) मान था। उनमें मिलिन्द ( IIcn naler ) नामक नरपति लिखी गई थी। बौद्ध धर्मानुरक्त थे। ऐसा विवरण भी मिलता है, कि इसके बाद और भी अनेक राजाओंने बौद्धसड़के पे स्थविर नसेन द्वारा बौद्धधर्म में दीक्षित हुए थे। महदुपदेशका साधन किया था जिनमेंसे वसभ (ऋषभ)- ___नागसेनके सम्बन्ध विशेष विवरण नहीं मिलता। का नाम हो श्रेष्ठ था। इन्होंने बहुत-से स्तूप बनवाये तिब्बत देशोय एक प्रन्थमें देखा जाता है, कि सोलह : थे। इसके अलावा एक विहार और एक उपासनागृह, महापुरुषों मेंसे एक पुरुष काश्यपको मृत्युके बाद धर्मप्रचार- अनेक भग्नारामका संस्कार किया तथा ४४ बार वैशाखो- में निकले। एक और तिब्बतीय पुस्तकसे पता चलता त्सव मनाया था। और भी अन्यान्य प्रकारके सत्कार्य है, कि नागसेन और मनोरथ इन दोनोंमें मतभेद हो . द्वारा ये यशस्वी हुए थे।