पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५६१

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बोद्धधर्म कनिक। सम्मिलनके लिए राजाने एक विहार बनवाया जहां ५०० कनिष्कका राज्य भारतवर्षके इतिहासमें बड़ा ही भिक्षु इकट्ठे हुए थे। इस महाधर्मसभामै उत्तरमें प्रसिद्ध है। इन्हीं शकविजेतासे शकमवत्सरकी गणना तिब्बत, सिक्किम, भूटान, नेपाल, लादक, चीन, मङ्गोलिया, 'शुरू हुई है। खोतन, कामगार, गान्धार, सिन्धु, उत्तर- । तातार, यहां तक कि जापानसे और दक्षिणमें सिहल, पश्चिम भारत, काश्मीर, मध्यदेश, यहां तक कि पूर्वा ब्रा, श्याम आदि स्थानोंसे बौद्धप्रतिनिधि आये थे। भारतका अधिकांश इनके राज्यभुक्त हुआ था। ये भी ; मिहलके महावंशमे जाना जाता है, कि अठसह अशोकके जैसे महाप्रतापशाली राजा थे और इन्होंने ( अलेकसद्रियां )-से यहां तीन हजार भिक्ष आका आग- बौद्धधर्मकी खूब उन्नति की थी। . मन हुआ था। वसुमित्रके कत्तु त्वाधीनमे इस सभाका प्रवाद है, कि ये पहले बौद्धधर्मके अविश्वासी थे। कार्य सम्पन्न हुआ था। यहां सूतपिटा लक्षश्लोक- धार्मिकप्रवर सुदर्शनने इन्हें बौद्धधर्म में दीक्षित किया था। ममन्वित एक भाष्य, उतना ही लोकसमन्विन विनय किस समय इन्होंने यह धर्म ग्रहण किया, इसका निर्णय , विभास विनयका भाष्य ; और आमधमका विभाग करना मुश्किल है। तब उनके समयमें ( १०० ई० में ) जो : ( अभिधर्मका भाग्य ) रचा गया था। संघका अधिवेशन हुआ था, वह निश्चित है। कोई कोई यद्यपि इस तृतीय सङ्गीतिक सम्बन्ध अनेक विषय कहते हैं, कि जलन्धरके निकट कुवन विहारमें यह अंधकारमें पड़े हुए हैं; किंतु एक विषयका स्पष्ट सङ्गीति हुई थी। फिर किसी किसीका कहना है, कि प्रमाण मिलता है। सिहलसे प्रतिनिधिक आने पर काश्मीरके अन्तर्गत कुतलवनके विहारमें इसका अधि-: भा इस सङ्गीतिभ सम्भवतः उन्होंने योगदान नहीं दिया। वेशन हुआ था। भारतवर्षीय बौद्धोंके सभी संप्रदायक प्रनिनिधि इसमें इस तृतीय महासङ्गीतिके का विवरणमें नाना उपस्थित हुए थे और इस मङ्गोति द्वारा भी छोटे छोटे प्रकारके मतभेद हैं, यहां सबोंका उल्लेग्य करना अस- मचिगयको मीमांसा हुई थी, उसे ही पास लाश कहना म्भव है। तिब्बतदेशीय एक ग्रन्थमें देखा जाता है, कि चाहिये। एक सौ वर्ष से भी अधिक समयसे बौद्धोंके मध्य जा ! महायान सम्प्रदाय मतभेद चला आता था, उसकी मीमांसा करने के लिए एलेहो कहा जा चुका है, कि महायान सम्प्रदायके कनिष्कने यह सङ्गीति वैठाई थी। कुल मिला कर भा और चिन्ताने बहुत पहलेसे ही बद्ध समाजम अठारह संप्रदाय इस सभामें उपस्थित थे तथा सभी धमक प्रवेश किया था। किम समय इस संप्रदायका प्रथम मूलसूत्रकी रक्षामें लगे थे। इस सभा म विनय , आविर्भाव हुआ, इग्मका ठीक ठीक पता लगान! असम्भव और सूत्र तथा अभिधर्मके अलिखित अंग fair दुध त है। बहुतांका अनुमान है, कि बुंनिवांणक एक.मी वर्ष थे। उसी समय महायान सम्प्रदायका बहुत कुध वाद वैशालोको महामविक समान हा महायानमतका मत लिया गया था, किन्तु प्रात्रीन बौद्ध या पकाने । सूबपान और स्थविर अश्वाप द्वारा लो शताब्दीम उक्त उसमें कोई आपत्ति नहीं की। मत जनसाधारणमें प्रचारित हुआ। आदि नाधशास्त्र ___एक दूसरे तिब्बतीय ग्रन्थ में देखा जाता है, कि धम- : पालभाषामें लिखा था, सम्राट कान के आश्रयम महा प्रथसमूहको लिपिबद्ध करने के लिए पार्श्व के दलभुत यानके अभ्युदयके साथ संस्कृत भाषा बादशास्त्र पांच सौ अर्हत तथा वसुमित्रके दलभुक्त पांच सौ वौधि- चत और प्रचारित हुए। शकरराजा प्रधाननः मौर सत्व यहां इकठे हुए थे। थे. कनिकके बौद्धदीक्षा ग्रहण करने पर महायान मतमें यूएनचुअङ्गका कहना है, कि राजा कनिष्कने ही मत। मौरप्रभाव संक्रामित हुआ । महायागके प्रधान भेद और विरोध मिटाने के लिए यह सङ्गीति या सभा : उपास्य अमिताभको बहुतेरे सूर्यदेवताका प्रतिपमानते बैठाई । इसमें पावको भी अनुमति ली गई थी। अहंतोंके हैं। बौद्धग्रन्थमें लिखा है, कि बधिमान्य नागार्जुनने